उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की खूबी है यहां की शस्यश्यामला धरती. दूरदूर तक फैले खेत. हरियाली से घिरे गांव. गांवों से जुड़े खेतखलिहान. मानो बड़े हरेभरे मैदान में किसी ने जिंदगी की चादर बिछा दी हो. आज से 45-46 वर्ष पहले, जिन दिनों को मैं याद करने को प्रयत्नरत हूं, गांवों की यही स्थिति थी. मुंहअंधेरे चक्की की घरघराहट, सिलबट्टे की रगड़न, दूध बिलोवन की झलमल, चूल्हे की गरमाहट से रागप्रभातीसा जीवननाद उठाता हुआ धुंआ….ऊपर से शांत दिखने वाले गांवों की ये चिरपरिचित आंतरिक हलचलें थीं. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पूरा गांव सादगी की मिसाल होता था. घड़ियां नहीं थीं, न सही. मुर्गे की बांग अलार्म काम करती. ‘चार बज गए’ कहते हुए लोग चारपाई छोड़ देते. गली में जूतियों की चरमराहट, ‘रामराम….जी रामराम’ की ध्वनि के साथ बैलों के गलों में टनटनाती घंटियां, भोर का संदेश ले आतीं. खेत दूर तक फैले होते. इसलिए जंगल का एक हिस्सा, या कहो कि बहुत कीमती हिस्सा उठकर गांवों तक चला आता था. यहां तक कि शहरों में भी कहीं न कहीं गांव की बसावट रहती थी. अनाज बेचकर सौदासुल्फा या नकदी जुटाने के लिए किसान शहरकस्बे तक आतेजाते रहते. कभीकभी बैलगाड़ी पर पूरा परिवार भी होता. शोर मचाते, हंसतेखिलखिलाते बच्चे, मन की उमंग को छिपाने की कोशिश करतीं, घूंघट से मुस्कराती स्त्रियां.

आजकल गांव और शहर के बीच की दूरियां घटने लगी हैं. जिस हवा में कभी पीली सरसों, गैहूं, धान, मटर, ईख और चने की गंध महका करती थी, अब उसमें डीजल और पैट्रोल का धुंआ भसभसाता है. तब इतनी मारामारी न थी. धरती को आराम देने के लिए किसान फसल काटकर खेत खाली छोड़ देते. जेठ का महीना आतेआते उनमें कंटीली झाड़ियां उग आतीं. बरसात से पहले वहां देशी खाद बिखेर दिया जाता. इन दिनों अव्वल तो खेत खाली दिखते नहीं, यदि दिखें तो उनमें प्लास्टिक की थैलियां, पुराने टायर और मुंहछिपाती खाली बोतलें नजर आएंगी. आधुनिकता के नाम पर निकली विकृतियों की फौज पूरे पर्यावरण का बिगाड़ कर रही हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक जिला है―बुलंदशहर. कहते हैं राजा अहिबरन ने बसाया था. उसी के नाम पर इसे ‘बरन’ कहा जाने लगा. मुगल आए तो उनके साथ उनकी भाषा भी आई. बरन ऊंचे टीले पर बसा था. इस कारण नई भाषा ने नाम दिया― बुलंद! कालांतर में वह बुलंदशहर कहा जाने लगा. इस शहर के उत्तरी छोर से पचास किलोमीटर लंबी सड़क निकलती है, जो उसे गढ़मुक्तेश्वर से मिलाती है. महाभारत की यादों, पुराकथाओं, अनेकानेक किवदंतियों और दंतकथाओं से जुड़ा छोटासा कस्बा. गंगा यहां आतेआते मंथर गति धारण कर लेती है.

बुलंदशहर और गढ़ के बीच, सड़क के आजूबाजू एक गांव बसा है―बरौलीवासदेवपुर. गांव से जुड़े लोग जानते हैं कि एक नाम के दो गांवों की पहचान के लिए प्रायः उसके निकटवर्ती गांव का नाम जोड़कर, शब्दयुग्म बना लिया जाता है. अगर कोई ‘गट्ठाचिरौली’ कहता है तो हम यह समझ जाते हैं कि ‘गट्ठा’ गांव जो ‘चिरौली’ के पास बसा है. अब आप यदि यह सोचने लगे हैं कि ‘बरौली’ और ‘वासदेवपुर’ दो अगलबगल बसे गांव हैं. तो आपका अनुमान गलत है. ‘बरौली’ के आसपास ‘वासदेवपुर’ जैसा कोई गांव नहीं है. न ही यह सुनने में आता है कि गांव में पहले वासदेव या वसुदेव जैसा कोई व्यक्ति था. फिर नामकरण की वजह? ग्रामीण मेधा की खासियत होती है कि वह लंबे और जटिल नामों के सरलीकृत रूप अपनेआप खोज लेती है. अपनी बोलीबानी में ढालकर उन्हें ऐसा रूप दे देती है, जिससे वे छोटेबड़े सबकी जुबान पर फिसलने लगें. ऐसी सहज मेधा ने ‘बरौलीवासदेवपुर’ जैसा लंबा नाम क्यों चुना! कहा जाता है कि पहले ‘बरौली’ और ‘वासदेवपुर’ नाम के दो अलगअलग गांव थे. कालांतर में बढ़तेबढ़ते वे एकदूसरे में समा गए. गांव का आकार देश के सामान्य गांवों से बहुत बड़ा है. इतना कि आसपास के कुछ गांव तो उसके एक मुहल्ले में समा जाएं. और वह सड़क जो पूरब से पश्चिम तक गांव के आरपार निकलती हुई उसे ठीक दो हिस्सों में बांट देती है, उससे तो इस कहानी पर अखंड विश्वास होने लगता है. इसके बावजूद दो गांवों के एक बन जाने की कहानी के बारे में विश्वास के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता. यूं भी इस पर विश्वास करने वाले इक्कादुक्का लोग ही गांव में होंगे. वे भी यह बताने में असमर्थ रहते हैं कि दोनों में से कौनसी पट्टी ‘बरौली’ है, कौनसी ‘वासदेवपुर’. आजकल की पीढ़ी में आजकल बरौली जुबान पर चढ़ा हुआ नाम है. वासदेवपुर या तो यादों में बसा है अथवा सरकारी रिकार्ड में, वह भी कहींकहीं.

इसी बरौलीवासदेवपुर की उत्तरी पट्टी में मेरा जन्म हुआ. घर से चालीसपचास कदम की दूर एक चौराहा था. वहां कभी नीम और बरगद के दो जंगी पेड़ हुआ करते थे. उनमें कौन ज्यादा उम्रदराज है, यह किसी को मालूम नहीं था. बरगद के चारों ओर चबूतरा बना था, उसपर बैठ गांववाले हुक्का गुड़गुड़ाते, बच्चे छुपाछुपी का खेल खेलते थे. नीम के करीब नुकीले बलुआ पत्थरों से बना कुआं था, जिसमें उन दिनों रहट चला करती थी. छोटीसी हौद को पार कर, पक्की नालियों में बहता उसका पानी अमृतप्रवाह की प्रतीति कराता था. कुआं खुला था, बरगद और नीम के पत्ते उसमें गोता लगाते रहते. फिर भी उसका पानी चांदनी जैसी पवित्रता और हिमजल की शीतलता का एहसास लिए होता था. पानी की तरावट, ठंडी बयार, गांववालों का मानसम्मान, प्यारदुलार पाकर नीम और बरगद खूब फलेफैले थे. आबादी बढ़ी तो कुंए से सटे खेतों में बस्ती अंगड़ाई लेने लगी. रहट का उपयोग घटने लगा. कुंए की उपयोगिता बनाए रखने के गांववालों ने रहट हटाकर वहां चरखी लगा दी. मिट्टी के घड़े सिर पर उठाए औरतें वहां आतीं. बातचीत और चुहल करती हुईं अपनीअपनी गागर भरतीं. लौटते समय उनके चेहरे पर जो अनूठी तृप्ति और उल्लास होता, उसकी मिसाल ढूंढना शहर की बनावटी आवोहवा में असंभव है. बाद में जब घरों में हेंडपंप लगने लगे तो चरखी की कद्र घटने लगी. कुआं भी वीरानी में डूबने लगा. उसकी याद ब्याहशादी के समय या उस समय आती जब सद्यः प्रसूता नवजात बच्चे को जन्म देने के बाद गातेबजाते महिलामंडली के साथ कुआं पूजने वहां आती. उस समय कुआं छेलछबीले की तरह इतराने लगता.

लोग कुंए के पानी का उपयोग भले न करें, आसपास खड़े नीम और बरगद को तो उसी का सहारा था. और उनके लिए कुंए के कंठ में भरपूर तरावट थी. सो वे दोनों एकदूसरे के अस्तित्व को स्वीकारते अपनी भुजाएं फैलाते ही जा रहे थे. गरमी आते ही बरगद की शाखाएं लालपीले गूलरों से लद जातीं, वहीं नीम पर पीलीहरी निबौलियों की बहार आ जाती. बड़गूलरों पर तो पक्षियों का अधिकार था. उनके लालच में वे दूरदूर से आकर बरगद पर डेरा डालते थे. किंतु नीम की मोटीताजी, सौंधी सुगंध से युक्त निबौलियों को हम सब बच्चे खूब प्यार से खाते थे.

फिर अचानक बरगद अकेला रह गया. एक बार गांव में काली आंधी आई. उसने नीम और बरगद दोनों को बुरी तरह हिला दिया. काली आंधी से बरगद तो चबूतरे की वजह से खुद को बचा ले गया, लेकिन नीम जिसकी जड़ों के नीचे कंकरीली मिट्टी और ढलान था, धराशायी हो गया. भारीभरकम नीम जब गिरा तो लगा मानो दसों दिशाओं में हाथी एक साथ चिंघाड़ उठे हों. उसके साथ उस बुढ़िया की चीख भी दबकर रह गई जो आनगांव से गांव से अपने रिश्तेदारों से मिलने आ रही थी. बुढ़ापे का शरीर, गुम चोट सह नहीं पाया. कुछ ही दिनों में बुढ़िया दिवंगतों की सूची में शामिल हो गई. नीम के जाते ही कुंए की वीरानी बढ़ने लगी. उसके शीतल, अमृत जैसे पानी का अब पहले जैसा महत्त्व नहीं रह गया था. कुएं से निकटवर्ती खेत में कुछ दिन बाड़ा जरूर रहा, बाद में वहां भी बस्तियां उग आईं.

कुआंं एक कंकरीले टीले पर बना था. बताते हैं गांव में ऐसे कुल चार टीले थे. उनमें से तीन के अवशेष बाकी थे. बाकी दो में से एक कुंए से छहसात सौ मीटर दूर बना था. उसके आसपास भी वैसा ही चौराहा. साथ में एक कुआं और रहट भी थी. उस रहट का पानी लंबी हौद से होकर जाता था, जिसे जानवरों के पानी के लिए बनाया गया था. कुआं चलता तो हौद ताजे, शीतल पानी से लबालब भर जाता. जिस प्रदूषण और जलसंकट के नाम पर आज बड़ेबड़े सेमीनार होते हैं, विशेषज्ञ चिंता करतेकरते मुटियाते जाते हैं, उसका उन दिनों नाम तक नहीं सुना गया था. उस कुएं के पास एक मंदिर था. वैसे ही बलुआ पत्थरों से चिना हुआ. गांवभर की आस्था का केंद्र.

पत्थरों के तीसरे टीले पर बस्ती आकार ले चुकी थी. उसे गांववाले खेड़ा कहते थे. बुर्जुगों का कहना था कि पत्थर के वे टीले किसी किले के बुर्ज थे. इस कहावत में कितनी सचाई है, इसका तो पता नहीं, मगर जिस स्थान को खेड़ा कहा जाता था, वहां घर बनाने के लिए जब नींव रखी जाती या किसी ओर कारण उसकी खुदाई होती तो मिट्टी के पुराने बर्तन, मूर्तियां आदि निकलने लगती थीं, जिससे यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता था कि वहां कोई जिंदगी अवश्य अंगड़ाई लेती होगी. ऐसी ही कुछ मूर्तियां कुछ गृहस्वामियों ने अपने घर के दरवाजे के आगे लगा छोड़ी थीं. मूर्तियों की संरचना वहां कम से कम 1500 वर्ष पुरानी बस्ती का संकेत देती थी.

गांव की चारों दिशाओं में तालाब थे. बरसात आती तो उनमें पानी उछाह मारने लगता. टरटर करते हुए मोटे, पीले मेडक देहरी लांघ घर में घुसे चले आते. बच्चे उनसे खेलते. उनके पांव में धागा बांधकर दूसरे बच्चों को परेशान करते. बरसात में कभीकभी वे तालाब आसपास रहने वालों के लिए आफत का सबब भी बन जाते. मगर गर्मी में उनके पानी को छूकर आती ठंडी हवा मेहनतकश जिंदगी को सहलाने का काम करती. उन्हीं तालाबों का पानी पशुओं की प्यास बुझाता. तेज गरमी में जब तालाब सूखने लगते तब भी उनकी उपयोगिता कम न होती थी. गांव के औरतमरद तालाब की चिकनी मिट्टी को निकालकर घरों की मरम्मत करने लगते थे. उसमें भूसा मिलाकर ईंटें थाप ली जातीं. गांव के अधिकांश घर कच्चे थे. सौंधी मिट्टी से घरों में चिनाई के काम आती थीं.

गांव के बारे में यदि में आपको इतने विस्तार से बता रहा हूं तो इसका एकमात्र कारण है कि यह सब मेरे स्मृति संसार का अभिन्न हिस्सा हैं. मेरा व्यक्तित्व, जिसमें रचनाकर्म भी सम्मिलित है, बगैर इसके उल्लेख के पूरा नहीं होता. गांव का जीवन साधारण था. सुविधाएं कम, दुश्वारियां अधिक थीं. इसके बावजूद मन में उसके प्रति गहरा अनुराग था. उसी के रहते दुश्वारियों का एहसास तक नहीं होता था. इसके कुछ व्यावहारिक कारण भी थे. बचपन में शादीविवाह, पर्वउत्सव या किसी ओर बहाने दूसरे गांवों में जाना होता था. अधिकांश गांव सड़क से दूर बसे थे. उन तक पहुंचने के लिए मीलों लंबा रास्ता पैदल ही काटना पड़ता था. अपने गांव में ऐसा कोई संकट न था. गांव को चीरती हुई सड़क पर हर दसबारह मिनट में बस आती थी. बैठो और झप से जहां जाना है पहुंच जाओ. खूब अच्छी तरह याद है. पहले वह कंकर की खुरदरी सड़क हुआ करती थी. जिसपर घोड़ातांगे दौड़ा करते थे. बीचबीच में बस भी दनदनाती हुई दौड़ी चली आती. जल्दी ही कंकर की जगह कोलतार ने ले ली. चिकनी सड़क. सवारी न हो तो भी मीलों तक दौड़ते हुए निकल जाओ. बसों की संख्या भी बढ़ गई. पुराने वक्त को याद करने वाले बुजुर्ग बताया करते थे कि पहले उस सड़क पर ट्राम चलते थे. उनकी तीखी आवाज दूर से ही आने का संदेश दे देती थी. ट्राम की सवारी विलायती बाबुओं के लिए थी, या उनके आगे चारणकर्म करने वाले नवाबनक्काशों के लिए. देश आजाद हुआ तभी जनता के लिए मोटरगाड़ी में बैठना संभव हो सका. गांव से सात किलोमीटर दूर दक्षिण में सड़क से सटा लखावटी गांव था. शिक्षाकेंद्र के रूप में दूरदूर तक प्रसिद्ध. वहां प्रदेश का जानामाना कृषि महाविद्यालय था. वर्षों पहले आर्य समाज से प्रभावित स्थानीय किसान अमर सिंह ने अपनी सारी जमीन शिक्षा संस्थान के लिए समर्पित कर दी थी. उन्हीं के नाम से कालेज दूरदूर तक जाना जाता था.

परिवार में हम चार भाई थे. एक बहन. बहन सबसे बड़ी थीं. मातापिता के बजाय हम दादी के ज्यादा करीब थे. कैसी भी जरूरत हो, घर या स्कूल की. दादी हमेशा हमारे और पिताजी के बीच संवादी का काम करतीं. यह जिम्मेदारी वे सांस रहते उठाती रहीं. वही बताया करती थीं, दादा जी की बुलंदशहर के पास सिकंद्राबाद कस्बे में हलवाई की दुकान थी. उनके असमय निधन से दादी के भाई उन्हें बरौली लिवा गए. दादा जी के रहते पिताजी बहुत शरारती थी. उनके जाते ही एकाएक गंभीर हो गए. परिवार की जिम्मेदारी सिर पर आन पड़ी थी. कुछ दिन उन्होंने दिल्ली में काम किया. बाद में दादी के पास गांव आ गए. दादी के भाइयों ने उनके रहने का ठिकाना कर दिया था. एक तेली अपना घर बेचकर कहीं जा रहा था, पिताजी ने वह घर खरीद लिया. उसके सामने एक और जगह खरीदकर दुकान चलाने लगे.

पुस्तकों से लगाव बचपन से था. इस बारे में गहन स्मृतिकुंड को खंगालता हूं तो यादों के एकदम आरंभिक छोर पर खुद को चांदनी रात में छत पर एक पुरानी कुर्सी पर बैठे हुए अक्षर चीन्हने की कोशिश करते हुए पाता हूं. उस समय तक स्कूल जाना शुरू नहीं हुआ था. इस लगाव की भनक घरवालों को लग चुकी थी. इसलिए मात्र चार वर्ष की अवस्था में स्कूल में नाम लिखा दिया गया. जबकि उन दिनों बच्चे आमतौर पर पांचछह साल पूरी कर लेने के बाद ही पाठशाला का मुंह देखते थे. इसका मतलब यह नहीं कि मैं बहुत तेज विद्यार्थी रहा हूं. किताब देखकर बैठेबैठे अक्षर सहलाना अलग बात है, उन्हें सही मायने में पढ़नासमझना अलग.

एक घटना स्मृति पटल पर अटल है. उन दिनों कहकरा अखबारी कागज पर होता था, काली इंक में एक ही रंग में छपी पांच या छह पैसे की पुस्तक आती थी. जो मास्टर ककहरा पढ़ाते थे, वे अपनी मार के लिए बहुत जाने जाते थे. मैं चित्रों देखकर अक्षर तो रट चुका था. मगर चित्रों के बगैर अक्षरों की पहचान दिमाग में बैठ ही नहीं रही थी. ककहरे में एक पृष्ठ बगैर चित्रों के अक्षरमाला का था, काली पृष्ठभूमि पर उभरे सफेद अक्षर. इस कारण उस ककहरा को ‘काले बरखा वाली किताब’ भी कहा जाता था. यह मान्यता थी कि यदि ‘काला बरखा’ पढ़ लिया तो मानो पूरा ककहरा आ गया. लेकिन अपने ठस दिमाग में ‘काला बरखा’ बैठ ही नहीं रहा था. एक दिन सचमुच आफत आ गई. उन अध्यापक महोदय ने मुझे कहकरा सुनाने के लिए खड़ा कर दिया. मैं चुप. मानो ऐवरेस्ट पर चढ़ने का आदेश मिला हो. मास्टरजी हाथ में लंबी संटी रखा करते थे. मुझे चुप देख उनका चेहरा तमतमाया. हाथ उठा. संटी चली और मेरी चीख निकल गए. जिस जगह संटी पड़ी थी, वहां फुंसियां निकली हुई थीं. मार पड़ने से फुंसी छिल गई. निक्कर खून से लाल हो गया. मारे दर्द के आंखों में आंसू छलक आए. कहते हैं गुरु की मार ज्ञानचक्षु खोल देती है. वास्तविकता पता नहीं. किंतु मेरे बारे में यह कहावत एकदम सच निकली. उसके बाद ‘काला बरखा’ तो क्या कोई बरखा पहाड़ नहीं बना. अगली कक्षा में पहुंचा तो अक्षर तेजी से जोड़ने लगा था.

उन दिनों गांव में अखबार नहीं आते थे. दुकान पर पुड़िया बांधने के लिए कागज की जरूरत पड़ती थी. उसके लिए पिताजी कस्बे से रद्दी खरीद लाते थे. मैं हमेशा इस प्रयास में रहता कि पिताजी रद्दी कब लाने वाले हैं. जब भी पुराने अखबार और कापीकिताबें घर आतीं, मैं देखते ही उनपर टूट पड़ता था. उन दिनों रविवार के अंक में बच्चों के लिए विशेष सामग्री होती थी. इसलिए अखबार देखते ही मैं उनसे रविवारीय परिशिष्ट अलग कर लेता था. पुस्तकों में भी कुछ रोचक दिखता तो पढ़ने को रख लेता. बाजार जाने के लिए अथवा किसी और काम से पिताजी दुकान से अलग होते तो हम भाइयों को वहां बैठना पड़ता था. दुकान पर फुर्सत के समय वह सामग्री खूब काम आती. धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान के सैकड़ों अंक, प्रेमचंद के उपन्यास, रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएं पहली बार रद्दी से छांटकर पढ़े. उन्हें सहेजकर रखा और अवसर निकाल कर बारबार पढ़ा.

एक बात और पढ़ने का शौक पिताजी से विरासत में मिला था. घर में रामायण, महाभारत, गीता आदि अनेक पुस्तकें थीं. तुलसी की अवधी रामचरित मानस समझ में नहीं आती थी. इसलिए उससे दूर ही रहता था. राधेश्याम कथावाचक की रामायण और महाभारत के अंकों को पिताजी ने अलगअलग दो जिल्द में बंधवा लिया था. मुंहअंधेरे वे दुकान खोलते तो राधेश्याम कथावाचक की ऊंचे स्वर में गाया करते थे. संस्कृत गीता समझ में आती न थी. मगर गीता के प्रत्येक अध्याय के पीछे उसे पढ़ने का महत्म्य दिया होता था. सीधेसीधे ब्राह्मणवादी आयोजन. संस्कृतबोध के अभाव में गीता महत्म्य पढ़कर ही गीता पढ़ने का भ्रम पाल लेता

स्कूल में संटी की मार के कुछ ही महीने बाद की घटना है. उस समय तक न केवल अक्षर जोड़ना आ चुका था, बल्कि तेजी से पढ़ने लगा था. बड़े भाई दो वर्ष आगे थे. एक दिन की बात, पिताजी दुकान पर थे, मैं दुकान के चबूतरे पर बैठा था. बड़े भाई की पुस्तक हाथ में थी और मैं उसको पढ़े जा रहा था. रास्ता चलने वाले मेरी ओर देख रहे थे. तब पिताजी ने एक ग्राहक की ओर इशारा करके पूछा―

मामा देखो, सही पढ़ रहा है न!’ ननिहाल में रहने के कारण हर प्रौढ़ व्यक्ति पिताजी के लिए मामा और बूढ़ा आदमी नाना था.

वह आदमी मेरे ऊपर झुका, पुस्तक देखकर शिनाख्त की. बताया कि सही पढ़ रहा हूं. पिताजी ने कुछ नहीं कहा. पर मन में उनके कुछ बैठसा गया. उसके बाद वे मुझे पढ़ते हुए नहीं टोकते थे. पिताजी की तीन बहन थीं. उनमें से एक विधवा होने के बाद हमारे ही घर रहती थीं. उन दिनों मनोरंजन का साधन स्वांग, तमाशे, रामलीला, ढोला, आल्हागायन वगैरह हुआ करते थे. सर्दियों के दिनों में जब किसानों के पास समय की अफरात होती, कलाकारों की मंडलियां गांव आने लगती थीं. उसी मौसम में नट भी गांव आकर डेरा डाल लेते. उसके बाद तो कभी इस मुहल्ले तो कभी उस बस्ती में, उनका कार्यक्रम चलता ही रहता. एक बार एक नटमंडली गांव में आकर रुकी. उसका मुखिया न केवल बढ़िया नट था, बल्कि आल्हा का भी अच्छा गायक था. एक हाथ में छह उंगलियां होने के कारण सब उसे छंगा कहा करते थे. वह आया तो गांव में उससे आल्हा गंवाने की होड़ सी लग गई. कभी इस चौपाल पर तो कभी उस चौराहे पर. महीनों बीतते. हम रातभर जागजागकर आल्हा सुनते. आल्हा सुनने का शौक बुआ को भी था. उन्होंने बाजार से आल्हा की पुस्तकें मंगवा लीं. खुद तो वे अनपढ़ थीं. मैं उन्हें बड़े चाव से पढ़ता. बुआ को आल्हा की पुस्तक पढ़कर सुनाने का काम भी मेरा था.

दादी के दो भाई थे. हम उन्हें बाबा कहा करते. उनका घर खेड़े पर था. जिन बुर्जों का जिक्र किया है, उनमें से एक के ठीक ऊपर. उनके घर जाने के लिए काफी चढ़ाई करनी पड़ती. पत्थरों को एकदूसरे से सटाकर सीढ़ियां बनाई हुई थीं. एक बार उन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मेरा पांव फिसल गया. बांह में चोट आई. कुहनी की हड्डी अपने स्थान से हिल गई थी. उन दिनों पट्टी बंधवाने के लिए भी आनगांव जाना पड़ता था. महीनों की मरहमपट्टी के बाद हड्डी तो जुड़ गई, किंतु मामूली हटकर. वह फर्क करीब से देखने पर आज भी नजर आता है. खेड़े पर ऊंचाई पर एक और कंकरीला कुआं था. उसका चैड़ा पाट बताता था कि कभी वहां भी रहट चलती होगी, किंतु अब वह सिर्फ पीने के पानी के काम आता था. बताते हैं मेरी दादी के भाई भी अपनी ननिहाल में रहते थे. किसी जमाने में उनके पूर्वज ने आकर अपनी ससुराल में ठिकाना बनाया था. वहां कुल बीसपचीस घर थे. एक ही दादापरदादा की औलाद. दादी चूंकि अपने मायके आकर बसीं थीं, इसलिए सब उनका सम्मान करते थे. अमावस्या और पूर्णिमा के दिन उनके यहां खीर बनती तो एक ‘बेला’ खीर, जिसके ऊपर देशी घी, शक्कर या गुड़ बिखरा होता था, सबसे पहले निकालकर ‘मान’ यानी दादी के वास्ते हमारे घर पहुंचा दी जाती, उदारमना लोगों का अपने कुनबे की बेटी के प्रति विशेषानुराग. हम एकएक करके उन कटोरों में झांकते और जो खीर अच्छी लगे, खा लिया करते थे. पिताजी को उस खीर को खाते हमने कभी नहीं देखा था.

वर्ष में एक या दो बार नानाजी चले आते. मां उनकी इकलौती संतान थीं. सो आने के बाद पंद्रहबीस दिन, महीनाभर रहना हो ही जाता था. उन्हें ढेर सारी कहानियां याद थीं. सुनाते भी बहुत अच्छी तरह से. हम बच्चे उनके आने का इंतजार करते रहे. वे आते तो तत्काल उन्हें घेर लेते. उसके बाद शुरू हो जाता किस्सेकहानियों का देर रात तक चलने वाला सिलसिला. नलदमयंती का किस्सा वे बहुत अच्छी तरह सुनाते थे. वह किस्सा एक बार शुरू होता तो दसपंद्रह दिन की छुट्टी हो जाती. कोई जरूरी नहीं था कि किस्सा शुरू से आखिर तक पूरा ही सुनाया जाए. हम अपनी पसंद के प्रसंग को सुनाने का आग्रह करते. जादूई प्रसंगों को तो कईकई बार सुना जाता. आजकल यह मान लिया गया है कि बच्चे लंबी रचनाएं कम पढ़ना पसंद करते हैं. मैं उन्हें क्या कहूं. चाहे आल्हा हो या ढोलामारूं का किस्सा, मैंने तो शुरुआत ही लंबे किस्से सुनते हुए की है. नलदमयंती का किस्सा इसलिए भी बारबार सुना जाता, क्योंकि दादाजी उसे डूबकर सुनाते थे. इस किस्से में उनका किस्सागोई का हुनर खिलकर सामने आता था. उनकी कहानियों का असर इतना था कि पांचछह की उम्र में ही मुझे नलदमयंती का किस्सा याद हो चुका था. उसके कई प्रसंग तो गुनगुना भी लेता था. फिर एक शौक चढ़ा, गांव में गलियों में किस्से को जोरजोर गाते, एक पांव पर उछलते हुए सड़क की ओर निकल जाता था. ‘आल्हा’ और नलदमयंती के किस्से तब लोगों की कल्पना पर छाए रहते थे. उन्हें गाना छोटी बात न थी. इसलिए लोग मेरी प्रशंसा करते. हालांकि मेरी नजरों में उसकी कोई अहमियत न थी. जिन्हें मेरी कहानियों में किस्सागोई की तलाश करनी है, वे उन किस्सेकहानियों को सुनकर मिलने वाले आनंद की कल्पना कर सकते हैं.

गांव से गुजरने वाली पक्की सड़क का योगदान जीवन में बस इतना नहीं था कि वह हमें आसानी से गंतव्य तक पहुंचा देती है. बल्कि वह हमारे खेलों का भी अहम् हिस्सा थी. भीड़ में मैं आज भी सहज नहीं पाता. बचपन में भी वही खेल पसंद थे, जिनका अकेले आनंद लिया जा सके. यूं शुरुआती दिनों की याद करूं तो समूह में या दूसरे बच्चों के साथ खेले जाने वाले कंचे, गोटी, गेंदतड़ी और न जाने कौनकौन से खेल याद आ जाते हैं. परंतु सर्वाधिक आनंद अकेले खेले जा सकने वाले खेलों में ही आता था. छहसात की उम्र तक पसंदीदा खेल था, पहिए के पीछे डंडा लगाकर उसको दौड़ाते हुए दूर तक ले जाना. गांव में अपने खेत भी घर से डेढ़दो किलोमीटर दूर थे. इसलिए इतनी दूर तक दौड़ जाना आदत में शामिल हो चुका था. पहिया घुमाने में मैं अपनी महारत मानता था.

आजकल ज्यादा चटपटा भोजन नहीं रुचता. लेकिन बचपन में खूब चटपटा खाता था. खासकर दहीबड़े. गांव में हर शनिवार सड़क पर पैंठ लगा करती थी. उन दिनों पांच पैसे के कई पकौड़े आते थे. खट्टी दही और मसालों के साथ. दुकान से पैसे चुराकर मैं खोमचेवाले के पास पहुंच जाता और उससे खूब मिर्च डालने का आग्रह करता. एक दिन बातोंबातों में खोमचेवाले ने वह राज घरवालों पर खोल दिया. मेरा दहीबड़े खाना छूटा, खोमचेवाले वाले ने भी अपना स्थायी ग्राहक गंवा दिया. चोरी की आदत छूटने में कुछ दिन और लगे. पिताजी दुकान के लिए खरीदारी करने निकटवर्ती कस्बे स्याना जाया करते थे. कभीकभी हम भी उनके साथ होते. वे हमें एक जगह बिठाकर सामान खरीदते रहते थे. ऐसे ही एक बार मैं पिताजी के साथ था. मुझे एक जगह बिठाकर वे सामान खरीदने में लगे थे. गरमी के दिन थे. मंडी में ठेलियों पर लाललाल ‘विलायती गाजर’ देखकर मन ललचा उठा. चोरी के दस पैसे अंटी में थे. मैं उनसे गाजर खरीदकर खाने लगा. उसी समय पीठ पर सामान लादे पिताजी वहां पहुँच गए. मुझे सामान से दूर देख उनका चेहरा तमतमा उठा. उनका हाथ घूमा और एक झन्नाटेदार तमाचा मुंह पर पड़ा. पिताजी हमें कभी डांटते तक नहीं थे. उनका जोर से बोलना भी हमारे लिए काफी होता था. वह चांटा कई सबक एक साथ दे गया.

छुटपन में सिर का पिछला हिस्सा थोड़ा लंबा था. इसके लिए लोग अक्सर मजाक उड़ाते. मुझे भी अजीब लगता. हालांकि वह शायद ही कभी कुंठा का कारण बना हो. अप्रिय स्थितियों में सहारा अपने ही भीतर से मिलता था. मन तब भी बेहद कल्पनाशील था, आज भी है. शाम के झुटपुटे में सड़क पर अपनी ही धुन में पांव बढ़ाता हुआ घर की ओर लौटता तो कल्पना मुझसे कहीं आगेआगे दौड़ रही होती. कभी वह आसमान में ऊंची उड़ान भरती, तो कभी दुनिया के सतरंगी सपने सजाती. उस समय यदि लगता कि देश पर संकट है. या झगड़ा हुआ है और किसी अपने को मेरी जरूरत है, तो दिमागी सूरमा सक्रिय हो जाता था. ‘स्पाइडरमैन’, ‘हीमैन’ और ‘शक्तिमान’ जैसे परामानवी चरित्रें के बारे में तो बहुत बाद में पढ़ा सुना, खुद को लेकर वैसे की करतब की कल्पना छहसात की उम्र में करने लगा था. हां, उसमें राक्षस की कल्पना नहीं होती थी. मनुष्य के भीतर अच्छाई और आदर्श की पराकाष्ठा की कल्पना करना तो मेरे लिए संभव है, लेकिन मैं यह हरगिज नहीं मानता कि ऐसे आदमी भी हो सकते हैं, जो केवल बुरे हों, जिनमें अच्छाई का जराभी अंश न हो. वह कल्पना इतनी मनमोहक होती थी कि डेढ़दो किलोमीटर का रास्ता पता भी नहीं चलता था. कल्पना का अधिकतम आनंद लेने के लिए मैं जानबूझकर चाल को धीमी कर देता था.

दादी के सभी मायके वालों पर जमीन थी. पिताजी बाहर आकर बसे थे. फिर भी उन्होंने थोड़ीथोड़ी करके अच्छीखासी जमीन खरीद ली थी. उसपर बंटाई पर कराते थे. बचपन में मेरा और बड़े भाई का झगड़ा अकसर हो जाया करता था. संभवतः मेरे मन में पढ़ाई में उनसे तेज होने का गुमान रहा हो, सो उनके बड़प्पन का लिहाज किए बिना ही उनसे झगड़ पड़ता था. पहलीदूसरी कक्षा में पहुंचते मेरी दोस्ती ‘छोटे’ से हो गई. वह नाम का ही छोटे था. कद में हमसे कहीं लंबा था. छोटे के पिता बुंदू खां घोड़ातांगा चलाते थे. उन दिनों गांव वाले खरीदारी के लिए अनाज का प्रयोग करते थे. सप्ताह में जब पर्याप्त अनाज जमा हो जाता तो पिताजी उसे बेचने स्याना मंडी में ले जाते. उस समय वे बुंदू का ही घोड़ातांगा बुलवाते थे. छोटे से दोस्ती के कारण मेरा उसके घर आनाजाना बढ़ गया. प्रसंग तो याद नहीं. एक बार न जाने किस बात पर वह मेरे लिए बड़े भाई से झगड़ पड़ा था. इसकी शिकायत घर पहुंची. तब मेरी खैर न थी. सब का इल्जाम था कि मैंने अपने भाई को एक ‘मुस्लिम’ से धमकवाया है. छोटे मुस्लिम था. गांव में मुस्लिमों की संख्या भी पर्याप्त थी. गांव में ठाकुरों की संख्या अधिक थी. मगर उसकी खूबी थी कि विभिन्न जातियों के घर, मुहल्ले आपस में मिलेजुले थे. गांव में यदाकदा जाति संबंधी झगड़े तो हो जाते थे, किंतु सांप्रदायिक नफरत जैसी वहां न कभी देखी न सुनी. अधिकांश मुस्लिम हाथ के दस्तकार थे. किसानों को उनकी प्रायः जरूरत पड़ती थी. मिलेजुले जीवन में नफरत के लिए कोई स्थान ही न था. बहरहाल, बड़े भाई से स्पर्धा या झगड़ा की भावना एक घटना के बाद हमेशा के लिए समाप्त हो गई. एक बार हम दोनों खेतों पर थे. जुताई चल रही थी. न जाने किस बात पर हम आपस में झगड़ पड़े. खूब गुत्थमगुत्था हुई. बड़े भाई ने मुझे गिरा दिया था. उसके बाद मैंने मान लिया बड़े को बड़ा मान लेने में ही बड़प्पन है और हमारे बीच लड़ाईझगड़ा हमेशाहमेशा के लिए समाप्त हो गया.

हमारे घर की दिनचर्या दूसरे लोगों से अलग थी. बुआ खेतों का काम देखती थीं. वे सवेरे उठकर चाय पीकर काम पर निकल जातीं. मां आम स्त्रियों की तरह मुंहअंधेरे उठतीं. भैंस को चारापानी के बाद सीधे चक्की पर जा बैठतीं. जब तक उजियारा हो, तब तक पूरे दिन की जरूरत के लायक आटा निमेट लेती थीं. हमारी आंख दूध बिलोवन की झल्लरमल्लर के साथ खुलतीं. हम सीधे उठकर उनके पास जाते. वे ताजा मक्खन हमारे हथेलियों पर रख देतीं. दूध बिलोने के बाद वे पिछले दिन दुकान पर आए अनाज की साजसफाई में लग जातीं. उसके बाद दुह दुहना. गांव में सभी मातापिता की लगभग ऐसी ही व्यस्त दिनचर्या थी. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने के लिए उनके पास समय न था. हम जैसेतैसे स्कूल के लिए तैयार होते तब तक वे रसोई से गरमागर्म रोटियों की सौंधी गंध उठने लगती.

हाई स्कूल तक पढ़ाई की सुविधा गांव में ही उपलब्ध थी. पांचवीं पास करने के बाद गांव के स्कूल में ही मेरा दाखिला करा दिया गया. स्कूल गांव के खेतों में बना था. घर से करीब दो किलोमीटर दूर. उसके लिए करीब एक किलोमीटर गांव के भीतर चलना पड़ता, बाकी सड़क पर. गर्मियों में तो स्कूल बंद रहता था. धूप में सड़क किनारे खड़े वृक्ष मददगार सिद्ध होते थे. मगर सर्दियों में वे सब खुद पीड़ा में होते थे. विशेषकर दिसंबर और जनवरी के महीने में जब सड़क पर कुहरा छाया होता. गजभर दूर का दिख पाना कठिन होता. तीखी सर्दी से दांत किटकिटा रहे होते, उस समय वृक्षों के पत्ते झड़ जाते और हमारी तरह वे भी सर्दी के बीत जाने की प्रतीक्षा में होते. आजकल बच्चों के पास ढेर सारे कपड़े होते हैं. उन दिनों हाफ बाजू का एक स्वेटर होता था. उसके अलावा एक या दो जोड़ी कमीजपाजामा. सर्दियों में रोज नहाना तो संभव न हो पाता था. लगातार पहनने से उसमें जूएं पड़ जाती थीं. कुहरे के दिनों में स्कूल तक दांत किटकिटाते हुए पहुंचना अलग. इसके बावजूद स्कूल पहुचने का संकल्प हल्का पड़ता था. बिना नागा हम समय से स्कूल पहुंचते थे.

उन दिनों सस्ते उपन्यास और रागनियों की चौबीस पृष्ठ की पुस्तकें गांवों में धड़ल्ले से खरीदी जाती थीं. पुस्तकों के शौकीन लोग आपस में अदलबदल कर पढ़ा करते थे. गांव में रागनियों के शौकीन एक सज्जन थे. एक बार उनके घर रागिनी गाने वालों की मंडली ठहरी. गांवमुहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. रागिनियां शुरू हुईं तो पूरा गांव चौंक पड़ा. जो रागिनियां मंडली गा रही थी, उनमें से अधिकांश उन्हीं सज्जन की लिखी हुई थीं, जिन्होंने वह आयोजन कराया था. फिर क्या था, पूरा गांव उनकी सराहना करने लगा. कुछ ही महीनों के बाद उन सज्जन की लिखी रागनियों की एक पुस्तक भी आ गई. उस समय तक मैं तुकबंदी करने लगा था, फिर भी लेखक बनने का ख्याल दूर तक नहीं था.

ओमप्रकाश कश्यप

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