बहुत कम लेखक होते हैं जो किसी एक विधा से आजीवन अनुराग बनाए रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो बच्चों के लिए लिखने के साथसाथ बालक जैसी निश्छलता रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना स्वयं लिखते हैं, उससे अधिक दूसरों से लिखवाते हैं : और बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना पढ़ते हैं, उससे कहीं अधिक समय साहित्य और साहित्यकारों को गुननेसमझने में खर्च करते रहते हैं. परंतु डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही थे : अपनी तरह के अकेले, विरल, निष्काम और वीतरागी, बालसाहित्य के संभवतः इकलौते यायावर. उन्होंने बालसाहित्य की बांह एक बार थामी तो कसकर थामे रहे. नौकरी की. परिवार चलाया. जीवन के लिए जरूरी सभी संघर्ष किए. साहित्य सृजन को समय भी दिया. परंतु इन सबसे कहीं ज्यादा समय उन्होंने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार और प्रोत्साहन में लगाया.

यह काम उन्होंने उस दौर में किया जब बालसाहित्य को एक विधा तक नहीं माना जाता था. लोग बच्चों के लेखन को बचकाना लेखन मानते थे. बालसाहित्यकार की हैसियत अदने लेखक जितनी ही थी. कुछ लोग तो बालसाहित्यकार को लेखक मानने तक को तैयार न थे. उस दौर में ‘डॉ. राष्ट्रबंधु’ आगे आए. निश्चय ही वे अकेले नहीं थे. मस्तराम कपूर, हरिकृष्ण देवसरे, श्रीप्रसाद जैसे साहित्यकार भी उनके साथ थे. सभी समान ऊर्जावान. जहूर बख्श, निरंकार देव सेवक, श्रीधर पाठक आदि पहले ही जमीन तैयार कर चुके थे. डॉ. राष्ट्रबंधु कानपुर में रहकर भी पूरे हिंदी प्रदेश में अपनी उपस्थिति बनाए रहे. बालसाहित्य की अस्मिता के संघर्ष में लेखकों को जोड़ने और तराशने का उनका प्रयास लगातार चलता रहा. इसके लिए उन्होंने ‘बालसाहित्य समीक्षा’ निकाली. श्रेष्ठ साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने हेतु ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ का गठन किया.

पत्रिका का मुख्य उद्देश्य बालसाहित्य समीक्षा की कमी को पूरा करना था. जबकि ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ बालसाहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष पुरस्कार बांटता था. ये सब काम उन्होंने बिना किसी दिखावे के, पूरी सादगी, विनम्रता और निष्पृहभाव से किए. ऐसे समय में जब लेखक बंधु अपने लिखे से ज्यादा गर्व मिले या जुटाए गए सम्मानपत्रों पर करते हैं. फेसबुक पर ‘सेल्फी’ चिपकाने को सर्जनात्मकता मानते हैं : डॉ. राष्ट्रबंधु उन सबसे अलग, निष्पृह भाव से बालसाहित्य के प्रचारप्रसार के काम में लगे रहते थे. कुर्तापाजामा पहन, ठेठ देहाती बाने में, झोला उठाए वे कहीं भी निकल जाते. फक्कड़ फकीर की निश्चिंत और निर्मैल्य. न पाने की खुशी, न खोने का गम. न आगत की चिंता, न विगत का क्लेश.

उनसे पहला परिचय कब हुआ था, पता नहीं. शायद 2002 के आसपास. बस इतना याद है कि ‘बालसाहित्य समीक्षा’ में मैं अपनी कहानियां भेजता था. छप भी जाती थीं. पत्रिका नियमित घर आती तो बालसाहित्य की समीक्षा विषयक कुछ आलेख पढ़ने को मिल जाते थे. आज जब बालसाहित्य समीक्षा पर सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सैकड़ों शोध प्रबंध लिखे जा चुके हों, तब ‘बालसाहित्य समीक्षा’ जैसी अखबारी कागज पर निकलने वाली पतलीसी पत्रिका के महत्त्व का आकलन करना शायद मुश्किल हो. करना चाहें तो शायद ही पूरी तरह कामयाब हो पाएं. लेकिन उन दिनों जब कोई बालसाहित्य को स्वतंत्र विधा मानने को तैयार न था, हिंदी में बाल साहित्य को लेकर समीक्षा दृष्टि का अभाव था. शोधपत्रों की संख्या दोचार से अधिक न थीं : तब साहित्य की किसी धारा को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने का स्वप्न देखना, फिर यह सोचकर कि बिना समीक्षा दृष्टि के यह असंभव होगा, बालसाहित्य की समीक्षा प्रधान पत्रिका निकालने का संकल्प लेना. उसे अकेले दम पर छतीससैंतीस वर्ष तक लगातार निकालते रहना. यह सब बगैर समर्पण, जिद्दी धुन और संकल्पसामथ्र्य के असंभव था.

पत्रिका निकली. कुछ उतारचढ़ाव भी आए. बावजूद इसके लगभग साढ़े तीन दशक तक वह बालसाहित्य समीक्षा को समर्पित इकलौती पत्रिका बनी रही. हालांकि पत्रिका के अंतिम वर्षाें में लेखों का स्तर घटा था. मैंने स्वयं रचनाएं भेजना बंद कर दिया था. इसमें डॉ. राष्ट्रबंधु का कोई दोष न था. तीनचौथाई शताब्दी जी चुका लेखक जैसेतैसे संसाधन उपलब्ध कराने के सिवाय और कर ही क्या सकता था! कमी हम लेखकों की थी, जो जहां से कुछ आमदनी न हो, वहां स्तरीय रचनाएं भेजने से कतराते हैं. बाजारवाद की आलोचना करतेकरते स्वयं बड़े व्यापारी बन जाते हैं.

सीधी मुलाकात गाजियाबाद में हुई थी. वे किसी कार्यक्रम में आए हुए थे. गाजियाबाद में पहली या शायद दूसरी मुलाकात में घर पर ठहराने का कार्यक्रम बना. यहां मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि किसी भी बाहरी व्यक्ति के साथ, मैं सहज नहीं हो पाता हूं. अपनी एकाग्रता में अनायास दखल मुझे स्वीकार्य नहीं. उस समय भी थोड़ा तनाव में था. पर रात को सोने से पहले बातचीत का जो सिलसिला चला, वह देर तक चलता रहा. वे मानते थे कि मैं लंबी बालकहानियां लिखता हूं. इसलिए वे उन्हें सामान्य बालकहानियों से हटकर देखते थे. चाहते थे कि उनपर उसी ‘लंबी कहानी’ मानकर विचार किया जाए. कुछ महीने पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यक्रम में आए तब भी उन्होंने लंबी बालकहानियों की चर्चा छेड़ी थी. मुझसे ‘बालसाहित्य में लंबी बालकहानियां’ विषय पर एक लेख लिखने का आग्रह भी किया था. उनकी इस राय से मैं शायद ही इत्तफाक रखता था. मैं गलत हो सकता हूं. परंतु व्यक्तिगत रूप से मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं ‘लंबी बालकहानियां’ लिखता हूं. ऐसे अवसर पर मुझे अपना बचपन अकसर याद आ जाता है. नानाजी अच्छे किस्सागो थे. वे घर आते तो हम बच्चे उन्हें घेर कर बैठ जाते. न केवल मैं बल्कि हम सब भाईबहन. आंखों में भले ही नींद भरी हो, परंतु छोटी कहानी शायद ही किसी को पसंद आती थी. लंबी कहानी, भले ही हम ‘हंुकारा’ भरतेभरते सो जाएं, प्रायः पसंद की जाती थी.

उन दिनों जो कहानियां अकसर सुनने को मिलती थीं, उन्हें ज्यों का त्यों लिखने को बैठो तो दोतीन हजार शब्दों से कम शायद ही कोई कहानी बन पाए. मैं मानता था और आज भी मेरा मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर अधिकांश जो कहानियां लिखी जाती हैं, वे पत्रपत्रिकाओं की मांग के अनुरूप होती हैं. पत्रपत्रिकाओं ने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार में में बड़ी भूमिका निभाई है. लेकिन नुकसान भी काफी किया है. इकीसवीं शताब्दी में भी अधिकांश संपादक मानते हैं कि बालक बड़ों का लघु संस्करण हैं. इसलिए वे बालक के व्यक्तित्व को छोटा मानकर बालसाहित्य को एक कोने से अधिक स्थान देने को तैयार नहीं होते. ‘बच्चों के लिए भी कुछ होना चाहिएइस नीयत के साथ वे बालसाहित्यकारों से लिखवाते हैं. लेखकों की मजबूरी हो जाती है कि वे उपलब्ध स्थान की सीमा को ध्यान में रखकर रचनाएं भेजें. चूंकि अखबारों में 1000-1500 से बड़ी बालकथा के लिए जगह नहीं होती, इसलिए यह धारणा बनी कि बालकहानी 1000-1500 शब्दों की होनी चाहिए. यही कारण है कि डॉ. राष्ट्रबंधु के दोतीन बार टोकने के बावजूद मैं उनके लिए लेख लिखने को तैयार न हो सका था.

बालसाहित्य समीक्षा’ की साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विशेषांक निकालने की परिपाटी बन चुकी थी. 2006 की घटना है. संभवतः मई या जून की. पत्रिका का अंक प्राप्त हुआ. उसमें कुछ विशेषांक निकालने की घोषणा थी. उनमें से एक विशेषांक ‘शिवकुमार गोयल’ के बालसाहित्य पर निकालने का प्रस्ताव था. घोषणा थी कि शिवकुमार गोयल के विशेषांक का संपादन ‘ओमप्रकाश कश्यप’ करेंगे. पढ़कर मैं बुरी तरह चैंका था. मैं बच्चों के लिए कहानीकविताएं लिख लेता था. हो सकता है इक्कादुक्का समीक्षात्मक लेख भी लिखा हो. बालकहानियां अवश्य छपी थीं, मगर ऐसा कुछ नहीं था कि मैं बालसाहित्य समीक्षा के विशेषांक का अतिथि संपादन कर सकूं. दूसरी समस्या शिवकुमार गोयल जी से अपरिचय की थी. हालांकि उनको पढ़ता अर्से से रहा था, मगर उनके बालसाहित्य से मेरा कोई परिचय नहीं था. तीसरी एक और समस्या थी. शिवकुमार जी की प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास में गहरी आस्था थी. उसी दृष्टि के साथ वे लेखन करते थे. जबकि मैं उसको संदेह की दृष्टि से देखता था. चैथे उम्र का अंतर. गोयल जी अग्रज पीढ़ी के रचनाकार थे. उनकी प्रतिष्ठा थी. ऐसे वरिष्ठ साहित्यकर्मी के बालसाहित्य पर मेरा जैसा अदना अनुभवहीन लेखक विशेषांक का संपादित करेयह उचित नहीं था. कोई संपादक ऐसा निर्णय कैसे ले सकता है? अवश्य कोई दूसरे ‘ओमप्रकाश कश्यप’ होंगे, यह सोचकर मैंने उस घोषणा को दिमागबाहर कर दिया था. लेकिन कुछ दिनों बाद ही डॉ. साहब का कानपुर से फोन आ गया. पता चला कि घंटी अपुन के गले में ही बांधी जानी है. बहरहाल मैंने उस विशेषांक का संपादन अपनी सोच के हिसाब से किया. राष्ट्रबंधु जी को लिख भी दिया कि वे जितना और जहां चाहें, संपादन कर सकते हैं. अंक आया और मैं देखकर हैरान था कि उसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई थी.

अंक का विमोचन गोयल जी के आवास पर पिलखुवा में हुआ था. आयोजन में उपस्थित गणमान्यों की उपस्थिति में डॉ. राष्ट्रबंधु ने अपनी एक बालकविता सुनाई थी. ‘काले मेघा पानी दे. पानी दे गुड़धानी दे’ पूरी तरह डूबकर, मस्ती में खुले गले से गाई गई, लोकमन से उपजी इस कविता को सुनकर पूरी सभा स्तब्ध थी. बाद में श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने दूसरी कविता भी सुनाई थी. लेकिन मेरे मन पर पहली कविता की जो छाप पड़ी, उसका असर आज तक बाकी है. ऐसा नहीं है कि दूसरी कविता कमजोर थी. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से परखा जाए तो दूसरी कविता को शायद अधिक अंक दिए जाते. लेकिन पहली कविता की जो जमीन है, वहां जो मिट्टी की सौंधी गंध और अपनापन है, वह कहीं न कहीं डॉ. राष्ट्रबंधु की अपनी भी जमीन थी. इसलिए उस कविता में वे अपना पूरा व्यक्तित्व उंडेल पाए थे. एक श्रोता के रूप में वह मेरे जीवन की तो वह एकमात्र अविस्मरणीय बालकविता है ही.

उनका जन्म 1913 में हुआ था. साधारण परिवार में. पारिवारिक नाम था, कृष्णचंद्र तिवारी. बाद में पढ़ने से लेकर नौकरी करने तक संघर्ष की लंबी गाथा है. बताते हैं पेट भरने के लिए उन्होंने बूट पालिश और मजदूरी तक कह1960 से लेकर 1976 तक छतीसगढ़ के विद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन किया. बच्चों के लिए दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा ‘बालसाहित्य समीक्षा’ का नियमित प्रकाशन. ‘बालसाहित्य कल्याण संस्थान’ द्वारा बालसाहित्य संवर्धन में निरंतर योगदान देते रहे. वे खूब यात्रापसंद थे. बालसाहित्य के लिए जीनेवाले उस चिर यायावर के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसकी अंतिम सांस भी उस समय निकले जब वह बालसाहित्य के संवर्धन के लिए सफर में हो. डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही विरले इंसान थे…..

ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com
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