बालकहानी

ओमप्रकाश कश्यप की बालकहानियां

डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर — मार्च 6, 2015

डॉ. राष्ट्रबंधु : बालसाहित्य का यायावर


बहुत कम लेखक होते हैं जो किसी एक विधा से आजीवन अनुराग बनाए रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो बच्चों के लिए लिखने के साथसाथ बालक जैसी निश्छलता रखते हैं, बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना स्वयं लिखते हैं, उससे अधिक दूसरों से लिखवाते हैं : और बहुत कम लेखक होते हैं जो जितना पढ़ते हैं, उससे कहीं अधिक समय साहित्य और साहित्यकारों को गुननेसमझने में खर्च करते रहते हैं. परंतु डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही थे : अपनी तरह के अकेले, विरल, निष्काम और वीतरागी, बालसाहित्य के संभवतः इकलौते यायावर. उन्होंने बालसाहित्य की बांह एक बार थामी तो कसकर थामे रहे. नौकरी की. परिवार चलाया. जीवन के लिए जरूरी सभी संघर्ष किए. साहित्य सृजन को समय भी दिया. परंतु इन सबसे कहीं ज्यादा समय उन्होंने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार और प्रोत्साहन में लगाया.

यह काम उन्होंने उस दौर में किया जब बालसाहित्य को एक विधा तक नहीं माना जाता था. लोग बच्चों के लेखन को बचकाना लेखन मानते थे. बालसाहित्यकार की हैसियत अदने लेखक जितनी ही थी. कुछ लोग तो बालसाहित्यकार को लेखक मानने तक को तैयार न थे. उस दौर में ‘डॉ. राष्ट्रबंधु’ आगे आए. निश्चय ही वे अकेले नहीं थे. मस्तराम कपूर, हरिकृष्ण देवसरे, श्रीप्रसाद जैसे साहित्यकार भी उनके साथ थे. सभी समान ऊर्जावान. जहूर बख्श, निरंकार देव सेवक, श्रीधर पाठक आदि पहले ही जमीन तैयार कर चुके थे. डॉ. राष्ट्रबंधु कानपुर में रहकर भी पूरे हिंदी प्रदेश में अपनी उपस्थिति बनाए रहे. बालसाहित्य की अस्मिता के संघर्ष में लेखकों को जोड़ने और तराशने का उनका प्रयास लगातार चलता रहा. इसके लिए उन्होंने ‘बालसाहित्य समीक्षा’ निकाली. श्रेष्ठ साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने हेतु ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ का गठन किया.

पत्रिका का मुख्य उद्देश्य बालसाहित्य समीक्षा की कमी को पूरा करना था. जबकि ‘भारतीय बालकल्याण संस्थान’ बालसाहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष पुरस्कार बांटता था. ये सब काम उन्होंने बिना किसी दिखावे के, पूरी सादगी, विनम्रता और निष्पृहभाव से किए. ऐसे समय में जब लेखक बंधु अपने लिखे से ज्यादा गर्व मिले या जुटाए गए सम्मानपत्रों पर करते हैं. फेसबुक पर ‘सेल्फी’ चिपकाने को सर्जनात्मकता मानते हैं : डॉ. राष्ट्रबंधु उन सबसे अलग, निष्पृह भाव से बालसाहित्य के प्रचारप्रसार के काम में लगे रहते थे. कुर्तापाजामा पहन, ठेठ देहाती बाने में, झोला उठाए वे कहीं भी निकल जाते. फक्कड़ फकीर की निश्चिंत और निर्मैल्य. न पाने की खुशी, न खोने का गम. न आगत की चिंता, न विगत का क्लेश.

उनसे पहला परिचय कब हुआ था, पता नहीं. शायद 2002 के आसपास. बस इतना याद है कि ‘बालसाहित्य समीक्षा’ में मैं अपनी कहानियां भेजता था. छप भी जाती थीं. पत्रिका नियमित घर आती तो बालसाहित्य की समीक्षा विषयक कुछ आलेख पढ़ने को मिल जाते थे. आज जब बालसाहित्य समीक्षा पर सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, सैकड़ों शोध प्रबंध लिखे जा चुके हों, तब ‘बालसाहित्य समीक्षा’ जैसी अखबारी कागज पर निकलने वाली पतलीसी पत्रिका के महत्त्व का आकलन करना शायद मुश्किल हो. करना चाहें तो शायद ही पूरी तरह कामयाब हो पाएं. लेकिन उन दिनों जब कोई बालसाहित्य को स्वतंत्र विधा मानने को तैयार न था, हिंदी में बाल साहित्य को लेकर समीक्षा दृष्टि का अभाव था. शोधपत्रों की संख्या दोचार से अधिक न थीं : तब साहित्य की किसी धारा को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने का स्वप्न देखना, फिर यह सोचकर कि बिना समीक्षा दृष्टि के यह असंभव होगा, बालसाहित्य की समीक्षा प्रधान पत्रिका निकालने का संकल्प लेना. उसे अकेले दम पर छतीससैंतीस वर्ष तक लगातार निकालते रहना. यह सब बगैर समर्पण, जिद्दी धुन और संकल्पसामथ्र्य के असंभव था.

पत्रिका निकली. कुछ उतारचढ़ाव भी आए. बावजूद इसके लगभग साढ़े तीन दशक तक वह बालसाहित्य समीक्षा को समर्पित इकलौती पत्रिका बनी रही. हालांकि पत्रिका के अंतिम वर्षाें में लेखों का स्तर घटा था. मैंने स्वयं रचनाएं भेजना बंद कर दिया था. इसमें डॉ. राष्ट्रबंधु का कोई दोष न था. तीनचौथाई शताब्दी जी चुका लेखक जैसेतैसे संसाधन उपलब्ध कराने के सिवाय और कर ही क्या सकता था! कमी हम लेखकों की थी, जो जहां से कुछ आमदनी न हो, वहां स्तरीय रचनाएं भेजने से कतराते हैं. बाजारवाद की आलोचना करतेकरते स्वयं बड़े व्यापारी बन जाते हैं.

सीधी मुलाकात गाजियाबाद में हुई थी. वे किसी कार्यक्रम में आए हुए थे. गाजियाबाद में पहली या शायद दूसरी मुलाकात में घर पर ठहराने का कार्यक्रम बना. यहां मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि किसी भी बाहरी व्यक्ति के साथ, मैं सहज नहीं हो पाता हूं. अपनी एकाग्रता में अनायास दखल मुझे स्वीकार्य नहीं. उस समय भी थोड़ा तनाव में था. पर रात को सोने से पहले बातचीत का जो सिलसिला चला, वह देर तक चलता रहा. वे मानते थे कि मैं लंबी बालकहानियां लिखता हूं. इसलिए वे उन्हें सामान्य बालकहानियों से हटकर देखते थे. चाहते थे कि उनपर उसी ‘लंबी कहानी’ मानकर विचार किया जाए. कुछ महीने पहले नेशनल बुक ट्रस्ट के कार्यक्रम में आए तब भी उन्होंने लंबी बालकहानियों की चर्चा छेड़ी थी. मुझसे ‘बालसाहित्य में लंबी बालकहानियां’ विषय पर एक लेख लिखने का आग्रह भी किया था. उनकी इस राय से मैं शायद ही इत्तफाक रखता था. मैं गलत हो सकता हूं. परंतु व्यक्तिगत रूप से मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं ‘लंबी बालकहानियां’ लिखता हूं. ऐसे अवसर पर मुझे अपना बचपन अकसर याद आ जाता है. नानाजी अच्छे किस्सागो थे. वे घर आते तो हम बच्चे उन्हें घेर कर बैठ जाते. न केवल मैं बल्कि हम सब भाईबहन. आंखों में भले ही नींद भरी हो, परंतु छोटी कहानी शायद ही किसी को पसंद आती थी. लंबी कहानी, भले ही हम ‘हंुकारा’ भरतेभरते सो जाएं, प्रायः पसंद की जाती थी.

उन दिनों जो कहानियां अकसर सुनने को मिलती थीं, उन्हें ज्यों का त्यों लिखने को बैठो तो दोतीन हजार शब्दों से कम शायद ही कोई कहानी बन पाए. मैं मानता था और आज भी मेरा मानना है कि बालसाहित्य के नाम पर अधिकांश जो कहानियां लिखी जाती हैं, वे पत्रपत्रिकाओं की मांग के अनुरूप होती हैं. पत्रपत्रिकाओं ने बालसाहित्य के प्रचारप्रसार में में बड़ी भूमिका निभाई है. लेकिन नुकसान भी काफी किया है. इकीसवीं शताब्दी में भी अधिकांश संपादक मानते हैं कि बालक बड़ों का लघु संस्करण हैं. इसलिए वे बालक के व्यक्तित्व को छोटा मानकर बालसाहित्य को एक कोने से अधिक स्थान देने को तैयार नहीं होते. ‘बच्चों के लिए भी कुछ होना चाहिएइस नीयत के साथ वे बालसाहित्यकारों से लिखवाते हैं. लेखकों की मजबूरी हो जाती है कि वे उपलब्ध स्थान की सीमा को ध्यान में रखकर रचनाएं भेजें. चूंकि अखबारों में 1000-1500 से बड़ी बालकथा के लिए जगह नहीं होती, इसलिए यह धारणा बनी कि बालकहानी 1000-1500 शब्दों की होनी चाहिए. यही कारण है कि डॉ. राष्ट्रबंधु के दोतीन बार टोकने के बावजूद मैं उनके लिए लेख लिखने को तैयार न हो सका था.

बालसाहित्य समीक्षा’ की साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विशेषांक निकालने की परिपाटी बन चुकी थी. 2006 की घटना है. संभवतः मई या जून की. पत्रिका का अंक प्राप्त हुआ. उसमें कुछ विशेषांक निकालने की घोषणा थी. उनमें से एक विशेषांक ‘शिवकुमार गोयल’ के बालसाहित्य पर निकालने का प्रस्ताव था. घोषणा थी कि शिवकुमार गोयल के विशेषांक का संपादन ‘ओमप्रकाश कश्यप’ करेंगे. पढ़कर मैं बुरी तरह चैंका था. मैं बच्चों के लिए कहानीकविताएं लिख लेता था. हो सकता है इक्कादुक्का समीक्षात्मक लेख भी लिखा हो. बालकहानियां अवश्य छपी थीं, मगर ऐसा कुछ नहीं था कि मैं बालसाहित्य समीक्षा के विशेषांक का अतिथि संपादन कर सकूं. दूसरी समस्या शिवकुमार गोयल जी से अपरिचय की थी. हालांकि उनको पढ़ता अर्से से रहा था, मगर उनके बालसाहित्य से मेरा कोई परिचय नहीं था. तीसरी एक और समस्या थी. शिवकुमार जी की प्राचीन भारतीय संस्कृति और इतिहास में गहरी आस्था थी. उसी दृष्टि के साथ वे लेखन करते थे. जबकि मैं उसको संदेह की दृष्टि से देखता था. चैथे उम्र का अंतर. गोयल जी अग्रज पीढ़ी के रचनाकार थे. उनकी प्रतिष्ठा थी. ऐसे वरिष्ठ साहित्यकर्मी के बालसाहित्य पर मेरा जैसा अदना अनुभवहीन लेखक विशेषांक का संपादित करेयह उचित नहीं था. कोई संपादक ऐसा निर्णय कैसे ले सकता है? अवश्य कोई दूसरे ‘ओमप्रकाश कश्यप’ होंगे, यह सोचकर मैंने उस घोषणा को दिमागबाहर कर दिया था. लेकिन कुछ दिनों बाद ही डॉ. साहब का कानपुर से फोन आ गया. पता चला कि घंटी अपुन के गले में ही बांधी जानी है. बहरहाल मैंने उस विशेषांक का संपादन अपनी सोच के हिसाब से किया. राष्ट्रबंधु जी को लिख भी दिया कि वे जितना और जहां चाहें, संपादन कर सकते हैं. अंक आया और मैं देखकर हैरान था कि उसमें किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की गई थी.

अंक का विमोचन गोयल जी के आवास पर पिलखुवा में हुआ था. आयोजन में उपस्थित गणमान्यों की उपस्थिति में डॉ. राष्ट्रबंधु ने अपनी एक बालकविता सुनाई थी. ‘काले मेघा पानी दे. पानी दे गुड़धानी दे’ पूरी तरह डूबकर, मस्ती में खुले गले से गाई गई, लोकमन से उपजी इस कविता को सुनकर पूरी सभा स्तब्ध थी. बाद में श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने दूसरी कविता भी सुनाई थी. लेकिन मेरे मन पर पहली कविता की जो छाप पड़ी, उसका असर आज तक बाकी है. ऐसा नहीं है कि दूसरी कविता कमजोर थी. यदि साहित्यिक दृष्टिकोण से परखा जाए तो दूसरी कविता को शायद अधिक अंक दिए जाते. लेकिन पहली कविता की जो जमीन है, वहां जो मिट्टी की सौंधी गंध और अपनापन है, वह कहीं न कहीं डॉ. राष्ट्रबंधु की अपनी भी जमीन थी. इसलिए उस कविता में वे अपना पूरा व्यक्तित्व उंडेल पाए थे. एक श्रोता के रूप में वह मेरे जीवन की तो वह एकमात्र अविस्मरणीय बालकविता है ही.

उनका जन्म 1913 में हुआ था. साधारण परिवार में. पारिवारिक नाम था, कृष्णचंद्र तिवारी. बाद में पढ़ने से लेकर नौकरी करने तक संघर्ष की लंबी गाथा है. बताते हैं पेट भरने के लिए उन्होंने बूट पालिश और मजदूरी तक कह1960 से लेकर 1976 तक छतीसगढ़ के विद्यालयों में अंग्रेजी का अध्यापन किया. बच्चों के लिए दो दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं. इसके अलावा ‘बालसाहित्य समीक्षा’ का नियमित प्रकाशन. ‘बालसाहित्य कल्याण संस्थान’ द्वारा बालसाहित्य संवर्धन में निरंतर योगदान देते रहे. वे खूब यात्रापसंद थे. बालसाहित्य के लिए जीनेवाले उस चिर यायावर के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है कि उसकी अंतिम सांस भी उस समय निकले जब वह बालसाहित्य के संवर्धन के लिए सफर में हो. डॉ. राष्ट्रबंधु ऐसे ही विरले इंसान थे…..

ओमप्रकाश कश्यप

opkaashyap@gmail.com
कुछ बातें बचपन की — अगस्त 16, 2016

कुछ बातें बचपन की


उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की खूबी है यहां की शस्यश्यामला धरती. दूरदूर तक फैले खेत. हरियाली से घिरे गांव. गांवों से जुड़े खेतखलिहान. मानो बड़े हरेभरे मैदान में किसी ने जिंदगी की चादर बिछा दी हो. आज से 45-46 वर्ष पहले, जिन दिनों को मैं याद करने को प्रयत्नरत हूं, गांवों की यही स्थिति थी. मुंहअंधेरे चक्की की घरघराहट, सिलबट्टे की रगड़न, दूध बिलोवन की झलमल, चूल्हे की गरमाहट से रागप्रभातीसा जीवननाद उठाता हुआ धुंआ….ऊपर से शांत दिखने वाले गांवों की ये चिरपरिचित आंतरिक हलचलें थीं. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो पूरा गांव सादगी की मिसाल होता था. घड़ियां नहीं थीं, न सही. मुर्गे की बांग अलार्म काम करती. ‘चार बज गए’ कहते हुए लोग चारपाई छोड़ देते. गली में जूतियों की चरमराहट, ‘रामराम….जी रामराम’ की ध्वनि के साथ बैलों के गलों में टनटनाती घंटियां, भोर का संदेश ले आतीं. खेत दूर तक फैले होते. इसलिए जंगल का एक हिस्सा, या कहो कि बहुत कीमती हिस्सा उठकर गांवों तक चला आता था. यहां तक कि शहरों में भी कहीं न कहीं गांव की बसावट रहती थी. अनाज बेचकर सौदासुल्फा या नकदी जुटाने के लिए किसान शहरकस्बे तक आतेजाते रहते. कभीकभी बैलगाड़ी पर पूरा परिवार भी होता. शोर मचाते, हंसतेखिलखिलाते बच्चे, मन की उमंग को छिपाने की कोशिश करतीं, घूंघट से मुस्कराती स्त्रियां.

आजकल गांव और शहर के बीच की दूरियां घटने लगी हैं. जिस हवा में कभी पीली सरसों, गैहूं, धान, मटर, ईख और चने की गंध महका करती थी, अब उसमें डीजल और पैट्रोल का धुंआ भसभसाता है. तब इतनी मारामारी न थी. धरती को आराम देने के लिए किसान फसल काटकर खेत खाली छोड़ देते. जेठ का महीना आतेआते उनमें कंटीली झाड़ियां उग आतीं. बरसात से पहले वहां देशी खाद बिखेर दिया जाता. इन दिनों अव्वल तो खेत खाली दिखते नहीं, यदि दिखें तो उनमें प्लास्टिक की थैलियां, पुराने टायर और मुंहछिपाती खाली बोतलें नजर आएंगी. आधुनिकता के नाम पर निकली विकृतियों की फौज पूरे पर्यावरण का बिगाड़ कर रही हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक जिला है―बुलंदशहर. कहते हैं राजा अहिबरन ने बसाया था. उसी के नाम पर इसे ‘बरन’ कहा जाने लगा. मुगल आए तो उनके साथ उनकी भाषा भी आई. बरन ऊंचे टीले पर बसा था. इस कारण नई भाषा ने नाम दिया― बुलंद! कालांतर में वह बुलंदशहर कहा जाने लगा. इस शहर के उत्तरी छोर से पचास किलोमीटर लंबी सड़क निकलती है, जो उसे गढ़मुक्तेश्वर से मिलाती है. महाभारत की यादों, पुराकथाओं, अनेकानेक किवदंतियों और दंतकथाओं से जुड़ा छोटासा कस्बा. गंगा यहां आतेआते मंथर गति धारण कर लेती है.

बुलंदशहर और गढ़ के बीच, सड़क के आजूबाजू एक गांव बसा है―बरौलीवासदेवपुर. गांव से जुड़े लोग जानते हैं कि एक नाम के दो गांवों की पहचान के लिए प्रायः उसके निकटवर्ती गांव का नाम जोड़कर, शब्दयुग्म बना लिया जाता है. अगर कोई ‘गट्ठाचिरौली’ कहता है तो हम यह समझ जाते हैं कि ‘गट्ठा’ गांव जो ‘चिरौली’ के पास बसा है. अब आप यदि यह सोचने लगे हैं कि ‘बरौली’ और ‘वासदेवपुर’ दो अगलबगल बसे गांव हैं. तो आपका अनुमान गलत है. ‘बरौली’ के आसपास ‘वासदेवपुर’ जैसा कोई गांव नहीं है. न ही यह सुनने में आता है कि गांव में पहले वासदेव या वसुदेव जैसा कोई व्यक्ति था. फिर नामकरण की वजह? ग्रामीण मेधा की खासियत होती है कि वह लंबे और जटिल नामों के सरलीकृत रूप अपनेआप खोज लेती है. अपनी बोलीबानी में ढालकर उन्हें ऐसा रूप दे देती है, जिससे वे छोटेबड़े सबकी जुबान पर फिसलने लगें. ऐसी सहज मेधा ने ‘बरौलीवासदेवपुर’ जैसा लंबा नाम क्यों चुना! कहा जाता है कि पहले ‘बरौली’ और ‘वासदेवपुर’ नाम के दो अलगअलग गांव थे. कालांतर में बढ़तेबढ़ते वे एकदूसरे में समा गए. गांव का आकार देश के सामान्य गांवों से बहुत बड़ा है. इतना कि आसपास के कुछ गांव तो उसके एक मुहल्ले में समा जाएं. और वह सड़क जो पूरब से पश्चिम तक गांव के आरपार निकलती हुई उसे ठीक दो हिस्सों में बांट देती है, उससे तो इस कहानी पर अखंड विश्वास होने लगता है. इसके बावजूद दो गांवों के एक बन जाने की कहानी के बारे में विश्वास के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता. यूं भी इस पर विश्वास करने वाले इक्कादुक्का लोग ही गांव में होंगे. वे भी यह बताने में असमर्थ रहते हैं कि दोनों में से कौनसी पट्टी ‘बरौली’ है, कौनसी ‘वासदेवपुर’. आजकल की पीढ़ी में आजकल बरौली जुबान पर चढ़ा हुआ नाम है. वासदेवपुर या तो यादों में बसा है अथवा सरकारी रिकार्ड में, वह भी कहींकहीं.

इसी बरौलीवासदेवपुर की उत्तरी पट्टी में मेरा जन्म हुआ. घर से चालीसपचास कदम की दूर एक चौराहा था. वहां कभी नीम और बरगद के दो जंगी पेड़ हुआ करते थे. उनमें कौन ज्यादा उम्रदराज है, यह किसी को मालूम नहीं था. बरगद के चारों ओर चबूतरा बना था, उसपर बैठ गांववाले हुक्का गुड़गुड़ाते, बच्चे छुपाछुपी का खेल खेलते थे. नीम के करीब नुकीले बलुआ पत्थरों से बना कुआं था, जिसमें उन दिनों रहट चला करती थी. छोटीसी हौद को पार कर, पक्की नालियों में बहता उसका पानी अमृतप्रवाह की प्रतीति कराता था. कुआं खुला था, बरगद और नीम के पत्ते उसमें गोता लगाते रहते. फिर भी उसका पानी चांदनी जैसी पवित्रता और हिमजल की शीतलता का एहसास लिए होता था. पानी की तरावट, ठंडी बयार, गांववालों का मानसम्मान, प्यारदुलार पाकर नीम और बरगद खूब फलेफैले थे. आबादी बढ़ी तो कुंए से सटे खेतों में बस्ती अंगड़ाई लेने लगी. रहट का उपयोग घटने लगा. कुंए की उपयोगिता बनाए रखने के गांववालों ने रहट हटाकर वहां चरखी लगा दी. मिट्टी के घड़े सिर पर उठाए औरतें वहां आतीं. बातचीत और चुहल करती हुईं अपनीअपनी गागर भरतीं. लौटते समय उनके चेहरे पर जो अनूठी तृप्ति और उल्लास होता, उसकी मिसाल ढूंढना शहर की बनावटी आवोहवा में असंभव है. बाद में जब घरों में हेंडपंप लगने लगे तो चरखी की कद्र घटने लगी. कुआं भी वीरानी में डूबने लगा. उसकी याद ब्याहशादी के समय या उस समय आती जब सद्यः प्रसूता नवजात बच्चे को जन्म देने के बाद गातेबजाते महिलामंडली के साथ कुआं पूजने वहां आती. उस समय कुआं छेलछबीले की तरह इतराने लगता.

लोग कुंए के पानी का उपयोग भले न करें, आसपास खड़े नीम और बरगद को तो उसी का सहारा था. और उनके लिए कुंए के कंठ में भरपूर तरावट थी. सो वे दोनों एकदूसरे के अस्तित्व को स्वीकारते अपनी भुजाएं फैलाते ही जा रहे थे. गरमी आते ही बरगद की शाखाएं लालपीले गूलरों से लद जातीं, वहीं नीम पर पीलीहरी निबौलियों की बहार आ जाती. बड़गूलरों पर तो पक्षियों का अधिकार था. उनके लालच में वे दूरदूर से आकर बरगद पर डेरा डालते थे. किंतु नीम की मोटीताजी, सौंधी सुगंध से युक्त निबौलियों को हम सब बच्चे खूब प्यार से खाते थे.

फिर अचानक बरगद अकेला रह गया. एक बार गांव में काली आंधी आई. उसने नीम और बरगद दोनों को बुरी तरह हिला दिया. काली आंधी से बरगद तो चबूतरे की वजह से खुद को बचा ले गया, लेकिन नीम जिसकी जड़ों के नीचे कंकरीली मिट्टी और ढलान था, धराशायी हो गया. भारीभरकम नीम जब गिरा तो लगा मानो दसों दिशाओं में हाथी एक साथ चिंघाड़ उठे हों. उसके साथ उस बुढ़िया की चीख भी दबकर रह गई जो आनगांव से गांव से अपने रिश्तेदारों से मिलने आ रही थी. बुढ़ापे का शरीर, गुम चोट सह नहीं पाया. कुछ ही दिनों में बुढ़िया दिवंगतों की सूची में शामिल हो गई. नीम के जाते ही कुंए की वीरानी बढ़ने लगी. उसके शीतल, अमृत जैसे पानी का अब पहले जैसा महत्त्व नहीं रह गया था. कुएं से निकटवर्ती खेत में कुछ दिन बाड़ा जरूर रहा, बाद में वहां भी बस्तियां उग आईं.

कुआंं एक कंकरीले टीले पर बना था. बताते हैं गांव में ऐसे कुल चार टीले थे. उनमें से तीन के अवशेष बाकी थे. बाकी दो में से एक कुंए से छहसात सौ मीटर दूर बना था. उसके आसपास भी वैसा ही चौराहा. साथ में एक कुआं और रहट भी थी. उस रहट का पानी लंबी हौद से होकर जाता था, जिसे जानवरों के पानी के लिए बनाया गया था. कुआं चलता तो हौद ताजे, शीतल पानी से लबालब भर जाता. जिस प्रदूषण और जलसंकट के नाम पर आज बड़ेबड़े सेमीनार होते हैं, विशेषज्ञ चिंता करतेकरते मुटियाते जाते हैं, उसका उन दिनों नाम तक नहीं सुना गया था. उस कुएं के पास एक मंदिर था. वैसे ही बलुआ पत्थरों से चिना हुआ. गांवभर की आस्था का केंद्र.

पत्थरों के तीसरे टीले पर बस्ती आकार ले चुकी थी. उसे गांववाले खेड़ा कहते थे. बुर्जुगों का कहना था कि पत्थर के वे टीले किसी किले के बुर्ज थे. इस कहावत में कितनी सचाई है, इसका तो पता नहीं, मगर जिस स्थान को खेड़ा कहा जाता था, वहां घर बनाने के लिए जब नींव रखी जाती या किसी ओर कारण उसकी खुदाई होती तो मिट्टी के पुराने बर्तन, मूर्तियां आदि निकलने लगती थीं, जिससे यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता था कि वहां कोई जिंदगी अवश्य अंगड़ाई लेती होगी. ऐसी ही कुछ मूर्तियां कुछ गृहस्वामियों ने अपने घर के दरवाजे के आगे लगा छोड़ी थीं. मूर्तियों की संरचना वहां कम से कम 1500 वर्ष पुरानी बस्ती का संकेत देती थी.

गांव की चारों दिशाओं में तालाब थे. बरसात आती तो उनमें पानी उछाह मारने लगता. टरटर करते हुए मोटे, पीले मेडक देहरी लांघ घर में घुसे चले आते. बच्चे उनसे खेलते. उनके पांव में धागा बांधकर दूसरे बच्चों को परेशान करते. बरसात में कभीकभी वे तालाब आसपास रहने वालों के लिए आफत का सबब भी बन जाते. मगर गर्मी में उनके पानी को छूकर आती ठंडी हवा मेहनतकश जिंदगी को सहलाने का काम करती. उन्हीं तालाबों का पानी पशुओं की प्यास बुझाता. तेज गरमी में जब तालाब सूखने लगते तब भी उनकी उपयोगिता कम न होती थी. गांव के औरतमरद तालाब की चिकनी मिट्टी को निकालकर घरों की मरम्मत करने लगते थे. उसमें भूसा मिलाकर ईंटें थाप ली जातीं. गांव के अधिकांश घर कच्चे थे. सौंधी मिट्टी से घरों में चिनाई के काम आती थीं.

गांव के बारे में यदि में आपको इतने विस्तार से बता रहा हूं तो इसका एकमात्र कारण है कि यह सब मेरे स्मृति संसार का अभिन्न हिस्सा हैं. मेरा व्यक्तित्व, जिसमें रचनाकर्म भी सम्मिलित है, बगैर इसके उल्लेख के पूरा नहीं होता. गांव का जीवन साधारण था. सुविधाएं कम, दुश्वारियां अधिक थीं. इसके बावजूद मन में उसके प्रति गहरा अनुराग था. उसी के रहते दुश्वारियों का एहसास तक नहीं होता था. इसके कुछ व्यावहारिक कारण भी थे. बचपन में शादीविवाह, पर्वउत्सव या किसी ओर बहाने दूसरे गांवों में जाना होता था. अधिकांश गांव सड़क से दूर बसे थे. उन तक पहुंचने के लिए मीलों लंबा रास्ता पैदल ही काटना पड़ता था. अपने गांव में ऐसा कोई संकट न था. गांव को चीरती हुई सड़क पर हर दसबारह मिनट में बस आती थी. बैठो और झप से जहां जाना है पहुंच जाओ. खूब अच्छी तरह याद है. पहले वह कंकर की खुरदरी सड़क हुआ करती थी. जिसपर घोड़ातांगे दौड़ा करते थे. बीचबीच में बस भी दनदनाती हुई दौड़ी चली आती. जल्दी ही कंकर की जगह कोलतार ने ले ली. चिकनी सड़क. सवारी न हो तो भी मीलों तक दौड़ते हुए निकल जाओ. बसों की संख्या भी बढ़ गई. पुराने वक्त को याद करने वाले बुजुर्ग बताया करते थे कि पहले उस सड़क पर ट्राम चलते थे. उनकी तीखी आवाज दूर से ही आने का संदेश दे देती थी. ट्राम की सवारी विलायती बाबुओं के लिए थी, या उनके आगे चारणकर्म करने वाले नवाबनक्काशों के लिए. देश आजाद हुआ तभी जनता के लिए मोटरगाड़ी में बैठना संभव हो सका. गांव से सात किलोमीटर दूर दक्षिण में सड़क से सटा लखावटी गांव था. शिक्षाकेंद्र के रूप में दूरदूर तक प्रसिद्ध. वहां प्रदेश का जानामाना कृषि महाविद्यालय था. वर्षों पहले आर्य समाज से प्रभावित स्थानीय किसान अमर सिंह ने अपनी सारी जमीन शिक्षा संस्थान के लिए समर्पित कर दी थी. उन्हीं के नाम से कालेज दूरदूर तक जाना जाता था.

परिवार में हम चार भाई थे. एक बहन. बहन सबसे बड़ी थीं. मातापिता के बजाय हम दादी के ज्यादा करीब थे. कैसी भी जरूरत हो, घर या स्कूल की. दादी हमेशा हमारे और पिताजी के बीच संवादी का काम करतीं. यह जिम्मेदारी वे सांस रहते उठाती रहीं. वही बताया करती थीं, दादा जी की बुलंदशहर के पास सिकंद्राबाद कस्बे में हलवाई की दुकान थी. उनके असमय निधन से दादी के भाई उन्हें बरौली लिवा गए. दादा जी के रहते पिताजी बहुत शरारती थी. उनके जाते ही एकाएक गंभीर हो गए. परिवार की जिम्मेदारी सिर पर आन पड़ी थी. कुछ दिन उन्होंने दिल्ली में काम किया. बाद में दादी के पास गांव आ गए. दादी के भाइयों ने उनके रहने का ठिकाना कर दिया था. एक तेली अपना घर बेचकर कहीं जा रहा था, पिताजी ने वह घर खरीद लिया. उसके सामने एक और जगह खरीदकर दुकान चलाने लगे.

पुस्तकों से लगाव बचपन से था. इस बारे में गहन स्मृतिकुंड को खंगालता हूं तो यादों के एकदम आरंभिक छोर पर खुद को चांदनी रात में छत पर एक पुरानी कुर्सी पर बैठे हुए अक्षर चीन्हने की कोशिश करते हुए पाता हूं. उस समय तक स्कूल जाना शुरू नहीं हुआ था. इस लगाव की भनक घरवालों को लग चुकी थी. इसलिए मात्र चार वर्ष की अवस्था में स्कूल में नाम लिखा दिया गया. जबकि उन दिनों बच्चे आमतौर पर पांचछह साल पूरी कर लेने के बाद ही पाठशाला का मुंह देखते थे. इसका मतलब यह नहीं कि मैं बहुत तेज विद्यार्थी रहा हूं. किताब देखकर बैठेबैठे अक्षर सहलाना अलग बात है, उन्हें सही मायने में पढ़नासमझना अलग.

एक घटना स्मृति पटल पर अटल है. उन दिनों कहकरा अखबारी कागज पर होता था, काली इंक में एक ही रंग में छपी पांच या छह पैसे की पुस्तक आती थी. जो मास्टर ककहरा पढ़ाते थे, वे अपनी मार के लिए बहुत जाने जाते थे. मैं चित्रों देखकर अक्षर तो रट चुका था. मगर चित्रों के बगैर अक्षरों की पहचान दिमाग में बैठ ही नहीं रही थी. ककहरे में एक पृष्ठ बगैर चित्रों के अक्षरमाला का था, काली पृष्ठभूमि पर उभरे सफेद अक्षर. इस कारण उस ककहरा को ‘काले बरखा वाली किताब’ भी कहा जाता था. यह मान्यता थी कि यदि ‘काला बरखा’ पढ़ लिया तो मानो पूरा ककहरा आ गया. लेकिन अपने ठस दिमाग में ‘काला बरखा’ बैठ ही नहीं रहा था. एक दिन सचमुच आफत आ गई. उन अध्यापक महोदय ने मुझे कहकरा सुनाने के लिए खड़ा कर दिया. मैं चुप. मानो ऐवरेस्ट पर चढ़ने का आदेश मिला हो. मास्टरजी हाथ में लंबी संटी रखा करते थे. मुझे चुप देख उनका चेहरा तमतमाया. हाथ उठा. संटी चली और मेरी चीख निकल गए. जिस जगह संटी पड़ी थी, वहां फुंसियां निकली हुई थीं. मार पड़ने से फुंसी छिल गई. निक्कर खून से लाल हो गया. मारे दर्द के आंखों में आंसू छलक आए. कहते हैं गुरु की मार ज्ञानचक्षु खोल देती है. वास्तविकता पता नहीं. किंतु मेरे बारे में यह कहावत एकदम सच निकली. उसके बाद ‘काला बरखा’ तो क्या कोई बरखा पहाड़ नहीं बना. अगली कक्षा में पहुंचा तो अक्षर तेजी से जोड़ने लगा था.

उन दिनों गांव में अखबार नहीं आते थे. दुकान पर पुड़िया बांधने के लिए कागज की जरूरत पड़ती थी. उसके लिए पिताजी कस्बे से रद्दी खरीद लाते थे. मैं हमेशा इस प्रयास में रहता कि पिताजी रद्दी कब लाने वाले हैं. जब भी पुराने अखबार और कापीकिताबें घर आतीं, मैं देखते ही उनपर टूट पड़ता था. उन दिनों रविवार के अंक में बच्चों के लिए विशेष सामग्री होती थी. इसलिए अखबार देखते ही मैं उनसे रविवारीय परिशिष्ट अलग कर लेता था. पुस्तकों में भी कुछ रोचक दिखता तो पढ़ने को रख लेता. बाजार जाने के लिए अथवा किसी और काम से पिताजी दुकान से अलग होते तो हम भाइयों को वहां बैठना पड़ता था. दुकान पर फुर्सत के समय वह सामग्री खूब काम आती. धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान के सैकड़ों अंक, प्रेमचंद के उपन्यास, रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएं पहली बार रद्दी से छांटकर पढ़े. उन्हें सहेजकर रखा और अवसर निकाल कर बारबार पढ़ा.

एक बात और पढ़ने का शौक पिताजी से विरासत में मिला था. घर में रामायण, महाभारत, गीता आदि अनेक पुस्तकें थीं. तुलसी की अवधी रामचरित मानस समझ में नहीं आती थी. इसलिए उससे दूर ही रहता था. राधेश्याम कथावाचक की रामायण और महाभारत के अंकों को पिताजी ने अलगअलग दो जिल्द में बंधवा लिया था. मुंहअंधेरे वे दुकान खोलते तो राधेश्याम कथावाचक की ऊंचे स्वर में गाया करते थे. संस्कृत गीता समझ में आती न थी. मगर गीता के प्रत्येक अध्याय के पीछे उसे पढ़ने का महत्म्य दिया होता था. सीधेसीधे ब्राह्मणवादी आयोजन. संस्कृतबोध के अभाव में गीता महत्म्य पढ़कर ही गीता पढ़ने का भ्रम पाल लेता

स्कूल में संटी की मार के कुछ ही महीने बाद की घटना है. उस समय तक न केवल अक्षर जोड़ना आ चुका था, बल्कि तेजी से पढ़ने लगा था. बड़े भाई दो वर्ष आगे थे. एक दिन की बात, पिताजी दुकान पर थे, मैं दुकान के चबूतरे पर बैठा था. बड़े भाई की पुस्तक हाथ में थी और मैं उसको पढ़े जा रहा था. रास्ता चलने वाले मेरी ओर देख रहे थे. तब पिताजी ने एक ग्राहक की ओर इशारा करके पूछा―

मामा देखो, सही पढ़ रहा है न!’ ननिहाल में रहने के कारण हर प्रौढ़ व्यक्ति पिताजी के लिए मामा और बूढ़ा आदमी नाना था.

वह आदमी मेरे ऊपर झुका, पुस्तक देखकर शिनाख्त की. बताया कि सही पढ़ रहा हूं. पिताजी ने कुछ नहीं कहा. पर मन में उनके कुछ बैठसा गया. उसके बाद वे मुझे पढ़ते हुए नहीं टोकते थे. पिताजी की तीन बहन थीं. उनमें से एक विधवा होने के बाद हमारे ही घर रहती थीं. उन दिनों मनोरंजन का साधन स्वांग, तमाशे, रामलीला, ढोला, आल्हागायन वगैरह हुआ करते थे. सर्दियों के दिनों में जब किसानों के पास समय की अफरात होती, कलाकारों की मंडलियां गांव आने लगती थीं. उसी मौसम में नट भी गांव आकर डेरा डाल लेते. उसके बाद तो कभी इस मुहल्ले तो कभी उस बस्ती में, उनका कार्यक्रम चलता ही रहता. एक बार एक नटमंडली गांव में आकर रुकी. उसका मुखिया न केवल बढ़िया नट था, बल्कि आल्हा का भी अच्छा गायक था. एक हाथ में छह उंगलियां होने के कारण सब उसे छंगा कहा करते थे. वह आया तो गांव में उससे आल्हा गंवाने की होड़ सी लग गई. कभी इस चौपाल पर तो कभी उस चौराहे पर. महीनों बीतते. हम रातभर जागजागकर आल्हा सुनते. आल्हा सुनने का शौक बुआ को भी था. उन्होंने बाजार से आल्हा की पुस्तकें मंगवा लीं. खुद तो वे अनपढ़ थीं. मैं उन्हें बड़े चाव से पढ़ता. बुआ को आल्हा की पुस्तक पढ़कर सुनाने का काम भी मेरा था.

दादी के दो भाई थे. हम उन्हें बाबा कहा करते. उनका घर खेड़े पर था. जिन बुर्जों का जिक्र किया है, उनमें से एक के ठीक ऊपर. उनके घर जाने के लिए काफी चढ़ाई करनी पड़ती. पत्थरों को एकदूसरे से सटाकर सीढ़ियां बनाई हुई थीं. एक बार उन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मेरा पांव फिसल गया. बांह में चोट आई. कुहनी की हड्डी अपने स्थान से हिल गई थी. उन दिनों पट्टी बंधवाने के लिए भी आनगांव जाना पड़ता था. महीनों की मरहमपट्टी के बाद हड्डी तो जुड़ गई, किंतु मामूली हटकर. वह फर्क करीब से देखने पर आज भी नजर आता है. खेड़े पर ऊंचाई पर एक और कंकरीला कुआं था. उसका चैड़ा पाट बताता था कि कभी वहां भी रहट चलती होगी, किंतु अब वह सिर्फ पीने के पानी के काम आता था. बताते हैं मेरी दादी के भाई भी अपनी ननिहाल में रहते थे. किसी जमाने में उनके पूर्वज ने आकर अपनी ससुराल में ठिकाना बनाया था. वहां कुल बीसपचीस घर थे. एक ही दादापरदादा की औलाद. दादी चूंकि अपने मायके आकर बसीं थीं, इसलिए सब उनका सम्मान करते थे. अमावस्या और पूर्णिमा के दिन उनके यहां खीर बनती तो एक ‘बेला’ खीर, जिसके ऊपर देशी घी, शक्कर या गुड़ बिखरा होता था, सबसे पहले निकालकर ‘मान’ यानी दादी के वास्ते हमारे घर पहुंचा दी जाती, उदारमना लोगों का अपने कुनबे की बेटी के प्रति विशेषानुराग. हम एकएक करके उन कटोरों में झांकते और जो खीर अच्छी लगे, खा लिया करते थे. पिताजी को उस खीर को खाते हमने कभी नहीं देखा था.

वर्ष में एक या दो बार नानाजी चले आते. मां उनकी इकलौती संतान थीं. सो आने के बाद पंद्रहबीस दिन, महीनाभर रहना हो ही जाता था. उन्हें ढेर सारी कहानियां याद थीं. सुनाते भी बहुत अच्छी तरह से. हम बच्चे उनके आने का इंतजार करते रहे. वे आते तो तत्काल उन्हें घेर लेते. उसके बाद शुरू हो जाता किस्सेकहानियों का देर रात तक चलने वाला सिलसिला. नलदमयंती का किस्सा वे बहुत अच्छी तरह सुनाते थे. वह किस्सा एक बार शुरू होता तो दसपंद्रह दिन की छुट्टी हो जाती. कोई जरूरी नहीं था कि किस्सा शुरू से आखिर तक पूरा ही सुनाया जाए. हम अपनी पसंद के प्रसंग को सुनाने का आग्रह करते. जादूई प्रसंगों को तो कईकई बार सुना जाता. आजकल यह मान लिया गया है कि बच्चे लंबी रचनाएं कम पढ़ना पसंद करते हैं. मैं उन्हें क्या कहूं. चाहे आल्हा हो या ढोलामारूं का किस्सा, मैंने तो शुरुआत ही लंबे किस्से सुनते हुए की है. नलदमयंती का किस्सा इसलिए भी बारबार सुना जाता, क्योंकि दादाजी उसे डूबकर सुनाते थे. इस किस्से में उनका किस्सागोई का हुनर खिलकर सामने आता था. उनकी कहानियों का असर इतना था कि पांचछह की उम्र में ही मुझे नलदमयंती का किस्सा याद हो चुका था. उसके कई प्रसंग तो गुनगुना भी लेता था. फिर एक शौक चढ़ा, गांव में गलियों में किस्से को जोरजोर गाते, एक पांव पर उछलते हुए सड़क की ओर निकल जाता था. ‘आल्हा’ और नलदमयंती के किस्से तब लोगों की कल्पना पर छाए रहते थे. उन्हें गाना छोटी बात न थी. इसलिए लोग मेरी प्रशंसा करते. हालांकि मेरी नजरों में उसकी कोई अहमियत न थी. जिन्हें मेरी कहानियों में किस्सागोई की तलाश करनी है, वे उन किस्सेकहानियों को सुनकर मिलने वाले आनंद की कल्पना कर सकते हैं.

गांव से गुजरने वाली पक्की सड़क का योगदान जीवन में बस इतना नहीं था कि वह हमें आसानी से गंतव्य तक पहुंचा देती है. बल्कि वह हमारे खेलों का भी अहम् हिस्सा थी. भीड़ में मैं आज भी सहज नहीं पाता. बचपन में भी वही खेल पसंद थे, जिनका अकेले आनंद लिया जा सके. यूं शुरुआती दिनों की याद करूं तो समूह में या दूसरे बच्चों के साथ खेले जाने वाले कंचे, गोटी, गेंदतड़ी और न जाने कौनकौन से खेल याद आ जाते हैं. परंतु सर्वाधिक आनंद अकेले खेले जा सकने वाले खेलों में ही आता था. छहसात की उम्र तक पसंदीदा खेल था, पहिए के पीछे डंडा लगाकर उसको दौड़ाते हुए दूर तक ले जाना. गांव में अपने खेत भी घर से डेढ़दो किलोमीटर दूर थे. इसलिए इतनी दूर तक दौड़ जाना आदत में शामिल हो चुका था. पहिया घुमाने में मैं अपनी महारत मानता था.

आजकल ज्यादा चटपटा भोजन नहीं रुचता. लेकिन बचपन में खूब चटपटा खाता था. खासकर दहीबड़े. गांव में हर शनिवार सड़क पर पैंठ लगा करती थी. उन दिनों पांच पैसे के कई पकौड़े आते थे. खट्टी दही और मसालों के साथ. दुकान से पैसे चुराकर मैं खोमचेवाले के पास पहुंच जाता और उससे खूब मिर्च डालने का आग्रह करता. एक दिन बातोंबातों में खोमचेवाले ने वह राज घरवालों पर खोल दिया. मेरा दहीबड़े खाना छूटा, खोमचेवाले वाले ने भी अपना स्थायी ग्राहक गंवा दिया. चोरी की आदत छूटने में कुछ दिन और लगे. पिताजी दुकान के लिए खरीदारी करने निकटवर्ती कस्बे स्याना जाया करते थे. कभीकभी हम भी उनके साथ होते. वे हमें एक जगह बिठाकर सामान खरीदते रहते थे. ऐसे ही एक बार मैं पिताजी के साथ था. मुझे एक जगह बिठाकर वे सामान खरीदने में लगे थे. गरमी के दिन थे. मंडी में ठेलियों पर लाललाल ‘विलायती गाजर’ देखकर मन ललचा उठा. चोरी के दस पैसे अंटी में थे. मैं उनसे गाजर खरीदकर खाने लगा. उसी समय पीठ पर सामान लादे पिताजी वहां पहुँच गए. मुझे सामान से दूर देख उनका चेहरा तमतमा उठा. उनका हाथ घूमा और एक झन्नाटेदार तमाचा मुंह पर पड़ा. पिताजी हमें कभी डांटते तक नहीं थे. उनका जोर से बोलना भी हमारे लिए काफी होता था. वह चांटा कई सबक एक साथ दे गया.

छुटपन में सिर का पिछला हिस्सा थोड़ा लंबा था. इसके लिए लोग अक्सर मजाक उड़ाते. मुझे भी अजीब लगता. हालांकि वह शायद ही कभी कुंठा का कारण बना हो. अप्रिय स्थितियों में सहारा अपने ही भीतर से मिलता था. मन तब भी बेहद कल्पनाशील था, आज भी है. शाम के झुटपुटे में सड़क पर अपनी ही धुन में पांव बढ़ाता हुआ घर की ओर लौटता तो कल्पना मुझसे कहीं आगेआगे दौड़ रही होती. कभी वह आसमान में ऊंची उड़ान भरती, तो कभी दुनिया के सतरंगी सपने सजाती. उस समय यदि लगता कि देश पर संकट है. या झगड़ा हुआ है और किसी अपने को मेरी जरूरत है, तो दिमागी सूरमा सक्रिय हो जाता था. ‘स्पाइडरमैन’, ‘हीमैन’ और ‘शक्तिमान’ जैसे परामानवी चरित्रें के बारे में तो बहुत बाद में पढ़ा सुना, खुद को लेकर वैसे की करतब की कल्पना छहसात की उम्र में करने लगा था. हां, उसमें राक्षस की कल्पना नहीं होती थी. मनुष्य के भीतर अच्छाई और आदर्श की पराकाष्ठा की कल्पना करना तो मेरे लिए संभव है, लेकिन मैं यह हरगिज नहीं मानता कि ऐसे आदमी भी हो सकते हैं, जो केवल बुरे हों, जिनमें अच्छाई का जराभी अंश न हो. वह कल्पना इतनी मनमोहक होती थी कि डेढ़दो किलोमीटर का रास्ता पता भी नहीं चलता था. कल्पना का अधिकतम आनंद लेने के लिए मैं जानबूझकर चाल को धीमी कर देता था.

दादी के सभी मायके वालों पर जमीन थी. पिताजी बाहर आकर बसे थे. फिर भी उन्होंने थोड़ीथोड़ी करके अच्छीखासी जमीन खरीद ली थी. उसपर बंटाई पर कराते थे. बचपन में मेरा और बड़े भाई का झगड़ा अकसर हो जाया करता था. संभवतः मेरे मन में पढ़ाई में उनसे तेज होने का गुमान रहा हो, सो उनके बड़प्पन का लिहाज किए बिना ही उनसे झगड़ पड़ता था. पहलीदूसरी कक्षा में पहुंचते मेरी दोस्ती ‘छोटे’ से हो गई. वह नाम का ही छोटे था. कद में हमसे कहीं लंबा था. छोटे के पिता बुंदू खां घोड़ातांगा चलाते थे. उन दिनों गांव वाले खरीदारी के लिए अनाज का प्रयोग करते थे. सप्ताह में जब पर्याप्त अनाज जमा हो जाता तो पिताजी उसे बेचने स्याना मंडी में ले जाते. उस समय वे बुंदू का ही घोड़ातांगा बुलवाते थे. छोटे से दोस्ती के कारण मेरा उसके घर आनाजाना बढ़ गया. प्रसंग तो याद नहीं. एक बार न जाने किस बात पर वह मेरे लिए बड़े भाई से झगड़ पड़ा था. इसकी शिकायत घर पहुंची. तब मेरी खैर न थी. सब का इल्जाम था कि मैंने अपने भाई को एक ‘मुस्लिम’ से धमकवाया है. छोटे मुस्लिम था. गांव में मुस्लिमों की संख्या भी पर्याप्त थी. गांव में ठाकुरों की संख्या अधिक थी. मगर उसकी खूबी थी कि विभिन्न जातियों के घर, मुहल्ले आपस में मिलेजुले थे. गांव में यदाकदा जाति संबंधी झगड़े तो हो जाते थे, किंतु सांप्रदायिक नफरत जैसी वहां न कभी देखी न सुनी. अधिकांश मुस्लिम हाथ के दस्तकार थे. किसानों को उनकी प्रायः जरूरत पड़ती थी. मिलेजुले जीवन में नफरत के लिए कोई स्थान ही न था. बहरहाल, बड़े भाई से स्पर्धा या झगड़ा की भावना एक घटना के बाद हमेशा के लिए समाप्त हो गई. एक बार हम दोनों खेतों पर थे. जुताई चल रही थी. न जाने किस बात पर हम आपस में झगड़ पड़े. खूब गुत्थमगुत्था हुई. बड़े भाई ने मुझे गिरा दिया था. उसके बाद मैंने मान लिया बड़े को बड़ा मान लेने में ही बड़प्पन है और हमारे बीच लड़ाईझगड़ा हमेशाहमेशा के लिए समाप्त हो गया.

हमारे घर की दिनचर्या दूसरे लोगों से अलग थी. बुआ खेतों का काम देखती थीं. वे सवेरे उठकर चाय पीकर काम पर निकल जातीं. मां आम स्त्रियों की तरह मुंहअंधेरे उठतीं. भैंस को चारापानी के बाद सीधे चक्की पर जा बैठतीं. जब तक उजियारा हो, तब तक पूरे दिन की जरूरत के लायक आटा निमेट लेती थीं. हमारी आंख दूध बिलोवन की झल्लरमल्लर के साथ खुलतीं. हम सीधे उठकर उनके पास जाते. वे ताजा मक्खन हमारे हथेलियों पर रख देतीं. दूध बिलोने के बाद वे पिछले दिन दुकान पर आए अनाज की साजसफाई में लग जातीं. उसके बाद दुह दुहना. गांव में सभी मातापिता की लगभग ऐसी ही व्यस्त दिनचर्या थी. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने के लिए उनके पास समय न था. हम जैसेतैसे स्कूल के लिए तैयार होते तब तक वे रसोई से गरमागर्म रोटियों की सौंधी गंध उठने लगती.

हाई स्कूल तक पढ़ाई की सुविधा गांव में ही उपलब्ध थी. पांचवीं पास करने के बाद गांव के स्कूल में ही मेरा दाखिला करा दिया गया. स्कूल गांव के खेतों में बना था. घर से करीब दो किलोमीटर दूर. उसके लिए करीब एक किलोमीटर गांव के भीतर चलना पड़ता, बाकी सड़क पर. गर्मियों में तो स्कूल बंद रहता था. धूप में सड़क किनारे खड़े वृक्ष मददगार सिद्ध होते थे. मगर सर्दियों में वे सब खुद पीड़ा में होते थे. विशेषकर दिसंबर और जनवरी के महीने में जब सड़क पर कुहरा छाया होता. गजभर दूर का दिख पाना कठिन होता. तीखी सर्दी से दांत किटकिटा रहे होते, उस समय वृक्षों के पत्ते झड़ जाते और हमारी तरह वे भी सर्दी के बीत जाने की प्रतीक्षा में होते. आजकल बच्चों के पास ढेर सारे कपड़े होते हैं. उन दिनों हाफ बाजू का एक स्वेटर होता था. उसके अलावा एक या दो जोड़ी कमीजपाजामा. सर्दियों में रोज नहाना तो संभव न हो पाता था. लगातार पहनने से उसमें जूएं पड़ जाती थीं. कुहरे के दिनों में स्कूल तक दांत किटकिटाते हुए पहुंचना अलग. इसके बावजूद स्कूल पहुचने का संकल्प हल्का पड़ता था. बिना नागा हम समय से स्कूल पहुंचते थे.

उन दिनों सस्ते उपन्यास और रागनियों की चौबीस पृष्ठ की पुस्तकें गांवों में धड़ल्ले से खरीदी जाती थीं. पुस्तकों के शौकीन लोग आपस में अदलबदल कर पढ़ा करते थे. गांव में रागनियों के शौकीन एक सज्जन थे. एक बार उनके घर रागिनी गाने वालों की मंडली ठहरी. गांवमुहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. रागिनियां शुरू हुईं तो पूरा गांव चौंक पड़ा. जो रागिनियां मंडली गा रही थी, उनमें से अधिकांश उन्हीं सज्जन की लिखी हुई थीं, जिन्होंने वह आयोजन कराया था. फिर क्या था, पूरा गांव उनकी सराहना करने लगा. कुछ ही महीनों के बाद उन सज्जन की लिखी रागनियों की एक पुस्तक भी आ गई. उस समय तक मैं तुकबंदी करने लगा था, फिर भी लेखक बनने का ख्याल दूर तक नहीं था.

ओमप्रकाश कश्यप

आजाद सरोवर की कथा — अगस्त 15, 2016

आजाद सरोवर की कथा


एक पेड़ था. पेड़ पर थे हरहरे पत्ते. पत्तों के बीच फूटतीं, नईताजा कोपलें….आप सोचेंगे, इसमें नया क्या है? पेड़ है तो पत्ते भी होंगे. बिना पत्तों का तो ठूंठ होता है. मैं कहूंगा धीरज रखिए. जैसे जीवन कहीं भी पनप सकता है, कहानी भी किसी भी ओर से दस्तक दे सकती है. चलिए दुबारा शुरू करते हैं. एक पेड़ था. पेड़ की थी लंबीलंबी शाखाएं. शाखाओं पर थे हरेहरे पत्ते. हरे पत्तों के बीच से फूटती थीं, नईताजा कोपलें. पेड़ पर था भांतिभांति के पंछियों का बसेराकौआ, कबूतर, कोयल, तीतर, तोता, चिड़िया, गौरेया, गलगल आदि और न जाने क्याक्या. कभीकभी मोर भी आकर डेरा डाल लेता था. ऐसे भी अनेक पक्षी थे जो अपने हिसाब से आते और भेंटमुलाकात कर वापस लौट जाते थे. पेड़ के तने पर गिलहरी, जड़ों के पास नेवले का बसेरा था. वे पेड़ के थे, पेड़ उनका. बल्कि पेड़ तो उन सबका भी था जो पेड़ के नहीं थे. उसने तो कठफोड़वा को भी अपनी शाखाओं पर जगह दी थी. वह इधरउधर से घूमघाम कर आता और तने पर बैठ अपनी लगन और पेड़ के धीरज की परीक्षा लेने लगता था. पेड़ क्या अनगिनत जीवधारियों की भरीपूरी बस्ती थी. सब साथसाथ रहते. साथसाथ धूपवर्षा, आंधीहवा, गर्मीठंडक सहते.

उसी पेड़ की जड़ में एक बिल था. बिल में रहता था नन्हा खरगोश. बिल का दूसरा सिरा खेतों में खुलता था. नन्हे खरगोश का जब मन हो तब खेतों में चला जाता. इच्छा हो तब तने के पास आकर लेट लगाने लगता. उसके लंबेलंबे कान थे. रंग सफेद चिट्ट. नन्हेनन्हे पैरों से वह इतनी तेज दौड़ लगाता कि देखने वाले दंग रह जाते. सुबह की पहली किरन के साथ ही उसकी दौड़ शुरू हो जाती. फिर तो जो भी दिखाई पड़ता, उसी के पास जाकर हांक लगाताᅳ‘उठो सुबह हो गई.’ यहां से वहां वह इतनी तेजी से दौड़ लगाता कि पूरे जंगल में जाग पड़ जाती. पंछी चहचहाने लगते. कोपलें किरणों के लिए स्वागतद्वार खोल देती. पौधे अंगड़ाई लेने लगते. पूरे जंगल में एकदूसरे को जगाने और पहली किरण की बधाई देने का दौर आरंभ हो जाता. नन्हा खरगोश तेजी से बड़ा हो रहा था. इसी के साथ बढ़ रही थी….उसकी रफ्तार, चपलता और लंबी कुलांचों से दूसरों को दंग कर देने की कला. साथ ही साथ बढ़ रही थी, उदासी. उदासी!! भला क्यों?

सच तो यह है कि कुछ दिनों से नन्हा सचमुच उदास था. पलपल वह आसमान की ओर ताकता. सुबह की किरण दस्तक देती पर वह अलसाया पड़ा रहता. एक दिन गिलहरी ने भांप लिया. वह दौड़ती हुई उसके पास पहुंची, बोली

जंगल में सभी खुश हैं, तुम्हें क्या हुआ?’

सुनकर क्या करोगी!’ नन्हा शिकायतभरे स्वर में बोला. गिलहरी दंग रह गई.

मुझे न सही, कबूतर दादा को ही बता दो. उनके पास हर समस्या का इलाज है.’ पेड़ के बाशिंदों का मानना था कि कबूतर उन सबमें बुद्धिमान है.’

उस स्वार्थी के बारे में कुछ न कहो तो ही अच्छा. अकेलाअकेला आसमान की सैर का आनंद उठाता है.’

मजबूरी है. भोजन के लिए उन्हें जहांतहां भटकना ही पड़ता है. तुम्हें तो यहीं खेतों से सब कुछ मिल जाता है.’

मैं आजादी चाहता हूं. काश! तुम्हारी तरह मैं भी पेड़ पर दौड़ लगा पाता.’

आजादी अपनों के लिए मांगी जाती है. अपनों से नहीं. हम सब तुम्हारे अपने हैं. पेड़ हमारा घर है.’

मुझे एक जगह बंधकर रहना स्वीकार नहीं. मैं मुक्त होना चाहता हूं. ऐसी जगह जाना चाहता हूं, जहां कोई बंधन न हो.’ गौरेया ने लाख समझाया. लेकिन नन्हे पर तो आजादी की धुन सवार थी. नहीं माना. संयोग की बात. उसी दिन जोर की बारिश आई. सब अपनेअपने ठिकाने पर जा छिपे. नन्हे खरगोश के बंधुबांधव भी बिलों में शरण ले चुके थे. उसे अवसर मिला. तेज बारिश के बीच ही उसने दौड़ लगा दी. भागता रहा, भागता रहा….भागता ही रहा. मूसलाधार बरसात के बीच रास्ते का पता भी न चला. बारिश थमी तो वह एकदम नए स्थान पर था. अकेला पर खुश. उसे भूख लग आई थी. शरीर थकान से बेहाल. परंतु वह निराश नहीं था. चारों और हरियाले खेत थे. खरगोश ने आराम से भोजन किया. फिर उसे नींद आ गई.

वह देर तक सोता रहा. आंख खुलीं तो चैंक पड़ा. कबूतर उसके पास ही बैठा था.

वहां तुम्हारे लिए सब परेशान हैं. चारों ओर ढूंढ मची है.’

जाकर बता दो कि मैं ठीक हूं. चिंता न करें.’

परिवार में एकदूसरे की चिंता न करें, यह कैसे संभव है?’ कबूतर ने समझाया. वापस चलने को कहा. परंतु नन्हा जिद ठाने रहा. वह अपने फैसले पर अटल था. कबूतर भी कम न था, ‘ठीक है, तुम नहीं जाना चाहते तो तुम्हारी मर्जी. परंतु आजादी का मतलब सिर्फ इतना नहीं है, जितना तुम समझते हो.’

तो तुम्हीं बता दो?’ इस बार नन्हे के स्वर में कटाक्ष था. कबूतर उसके लिए तैयार था.

सहीसही तो केवल कछुआ ही बता सकता है….तुम्हारी तरह उसे भी आजादी पसंद है. अकसर कहता है, आजादी जड़ता से होनी चाहिए….जड़ों से नहीं.’ खरगोश को बात पसंद आई, बोला

कछुआ कौन?’

मेरा दोस्त! यहां से थोड़ी दूर तालाब है….तुम चाहो तो मैं उसके पास ले जा सकता हूं.’ खरगोश चुप्पी साधे रहा. कबूतर ने पंख फड़फड़ाए, ‘तुम्हें आजादी बेहद पसंद है. मैं उसमें खलल नहीं डालना चाहता. मैं कछुआ से मिलने जा रहा हूं. चाहो तो पीछेपीछे आ सकते हो.’ कहकर उसने पंख खोल दिए. नन्हे ने कुछ पल सोचा. फिर जिस दिशा में कबूतर उड़ा था, उसी दिशा में दौड़ लगाने लगा. लंबी यात्र के बाद कबूतर एक सरोवर के पास उतरा. खरगोश भी रुककर हांफने लगा. सरोवर बहुत बड़ा था. दूर तक सिर्फ पानी ही पानी. साफ….चमकीला. नीलमणि की भांति दमकता हुआ. उसमें जगहजगह कमल के फूल खिले थे. उनकी गंध हवा को महका रही थी.

मैं यहां पहले क्यों नहीं आया! आजादी का असली आनंद तो इस स्थान पर रहकर लिया जा सकता है.’ खरगोश बड़बड़ाया. कबूतर ने सुन लिया. हंसकर बोला, ‘बहुत जल्दी फैसला कर लेते हो. वैसे यह ज्यादा बुरी बात नहीं है. ऐसे हालात में भी दिमाग शांत रहे तो नई राहें अकस्मात मिल जाती हैं.’ सरोवर के किनारे एक शिलाखंड था. कबूतर उसी पर जा बैठा. खरगोश को झुंझलाहट होने लगी

कहां है तुम्हारा दोस्त?’ उसने कबूतर से पूछा.

धीरज रखो!’ कबूतर मुस्कराया. लगा कि दोनों एकदूसरे की आहट पहचान लेते थे. कुछ पलों के बाद जल में हलचल हुई. लहरों के बीच से मुंह चमकाता हुआ कछुआ प्रकट हुआ. दोनों ने एकदूसरे का स्वागत किया. नजर मिलते ही उनके चेहरे खिल उठे.

तुम्हारे साथ नया मेहमान कौन है?’ कछुआ ने खरगोश की ओर देखते हुए पूछा.

हम एक ही परिवार के हैं. तुम्हारी तरह यह भी बहुत आजादख्याल है.’ कबूतर ने बताया.

आजाद ख्याल….हम तो आजादी के सही मायने तक नहीं समझते. आजाद ख्याल तो वे थे….’ कछुआ यादों में डूब गया.

वे कौन….?’ खरगोश घबराया. आजादी के बारे में पूछने पर कबूतर ने कछुआ का नाम लिया था. जिसके लिए उसे मीलों दौड़कर आना पड़ा. सांस अभी तक उखड़ी हुई थी. पूरा दिन दौड़ते हुए बीता था. और दौड़ने की उसमें न तो शक्ति थी, न ही साहस. उसकी हालत देख कबूतर को हंसी आ गई

चिंता मत करो. कछुआ भाई जैसा अनुभवसिद्ध प्राणी इलाके में दूसरा नहीं है. उनके पास यादों का खजाना है. तुमने छेड़ ही दिया है तो सुनते जाओ. कछुआ यादों में खो गया

जहां आज तुम सरोवर देख रहे हो…..वहां कभी एक झील हुआ करती थी. झील क्या कोरा दलदल. यहांवहां जगहजगह पानी से भरे गड्ढे. उन्हीं से स्थानीय लोग अपना काम चलाते. जानवर अपनी प्यास बुझाते थे. उन दिनों देश परतंत्र था. अंग्रेज और उनके पिट्ठू शिकार के शौकीन जमींदारों को दलदल के आसपास का जंगल शिकार के लिए सबसे उपयुक्त था. भारीभरकम बूट पहने, कंधे पर बंदूक उठाए अंग्रेज अधिकारी वहां आते. जिस दिन आते, दर्जनों जानवरों की जान पर बन आती थी. झील के आसपास के गांवों के लोग भी वहां मछलियां पकड़ने आते थे. तीजत्योहार पर शिकार भी कर लेते थे. केवल शौक के लिए जानवरों को मौत के घाट उतारना उन्हें बिलकुल नापसंद था. उधर शिकारियों का आना बढ़ता जा रहा था. शिकार के नाम पर प्रतिदिन कई जानवर गोलियों का निशाना बना दिए जाते थे.

अंग्रेजों का आतंक. अंग्रेज शिकारियों तथा उनके मुंह लगे सामंतों को रोकनेटोकने वाला कोई न था. उनके द्वारा सताए गए जानवर अपना गुस्सा स्थानीय लोगों पर निकालते. कई बार संगठित होकर हमला बोल देते. जिससे उनकी जान पर बन आती थी. समस्या बढ़ी तो बात पंचायत तक जा पहुंची. मिलजुलकर समाधान निकालने का ग्रामीणों का यह पुराना तरीका था

अंग्रेज पूरे देश में छाये हुए हैं. उन्हें कौन रोक सकता है?’ पंचायत के आरंभ में ही एक डरे हुए आदमी ने बाकी लोगों को डराने की कोशिश की. बात किसी हद तक सही थी. कुछ देर के लिए घोर सन्नाटा व्याप गया. सभा को गुमसुम देख एक अनुभवसिद्ध बूढ़ा उठा तो सब उसकी ओर देखने लगे

मानता हूं कि अंग्रेजों से सीधी टक्कर लेना ओखली में मुंह डालने जैसा है. लेकिन यह केवल जानवरों पर संकट का मामला नहीं है. जंगल के साथसाथ हम सब के अस्तित्व पर भी संकट है. खूंखार जानवर उन्हें जंगल पर कब्जा करने से रोके हैं. वे न रहे तो पूरा जंगल उनके अधिकार में चला जाएगा.’

फिर क्या किया जाए?’

कभी उस जगह झील हुआ करती थी. यदि दलदल को साफ कर दिया जाए तो पानी अलगअलग गड्ढों के बजाय एक ही स्थान पर जमा होने लगेगा. उससे आसपास का क्षेत्र सूख जाएगा और जानवर भागकर अपनी जान बचा सकेंगे.’ बूढ़े की बात में दम था. उसी क्षण झील को साफ करने का संकल्प ले लिया गया. शुरुआत झील के दक्षिणी छोर से की गई, जहां दलदल बहुत अधिक था. वह सिरा जंगल से सटा था. जानवरों का खतरा भी ज्यादा था. लेकिन गांव वाले समझ चुके थे कि जंगल केवल जानवरों की नहीं, उनकी भी जरूरत है.

कई दिनों तक लगातार मेहनत करने के बाद जंगल की ओर का दलदल साफ कर दिया गया. परिणाम अनुकूल ही निकला. शिकार के दौरान हताहत होने वाले जानवरों की संख्या घटने लगी. गांव वाले खुश थे. पर काम अभी अधूरा था. असल चुनौती थी, दूसरी ओर का जंगल साफ करना. उसका दूसरा अर्थ था, शिकारियों के नायक वाटसन को सीधी चुनौती देना. वाटसन अंग्रेज सेना का कमांडर रह चुका था. उसकी क्रूरता को लेकर अनेक कहानियां ख्यात थीं. कभी भारतीय स्वाधीनता सेनानियों पर गोली बरसाया करता था. रिटायर होने के बाद जानवरों को निशाना बनाकर गोलीबाजी का अपना शौक पूरा कर रहा था. लेकिन गांव वालों का इरादा अटल था. खासकर उस बूढ़े का, जिसने गांव की कई पीढ़ियों को अपने सामने बड़े होते बनतेमिटते देखा था. जीवन की सांध्यबेला में वह गांव के लिए कुछ छोड़कर जाना चाहता था.

हिम्मत बनाए रखिए. तीन दिन बाद श्रावणी पूर्णिमा है. त्योहार मनाने के बाद नए संकल्प के साथ फिर जुटेंगे.’ बूढ़े ने समझाया. गांव वाले उत्सव की तैयारी में जुट गए. उस समय तक वे इस बात से अनजान थे कि दलदल को साफ करने की सूचना कुटिल वाटसन को मिल चुकी है. वह अनुकूल अवसर की ताक में था.

दिन का समय था. बरसात का मौसम अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने का भी होता है. गांव वाले जुताई के लिए हलबैल तैयार कर ही रहे थे कि गलियां घोड़ों की टाप से गूंजने लगीं. कुछ देर बाद वाटसन ने थानेदार और कुछ सिपाहियों के साथ प्रवेश किया. सभी के हाथों में बंदूकें थीं. साथ आए सिपाही गांव के रास्तों पर जम गए.

मुझे तुम सबको गिरफ्तार करने का आदेश है?’ पुलिस दरोगा ने आगे बढ़कर कहा.

किस जुर्म में?’ बूढ़े ने आगे आते हुए पूछा.

तुमने सरकारी जंगल और झील पर कब्जा किया है.’ वाटसन गुर्राया.

हम किसान हैं. इस जमीन को पीढ़ियों से संभालते आए हैं. हम इसके मालिक….’ बूढ़ा निर्भीक था. किसी भी प्रकार के डर से परे. लेकिन वह अपने शब्द पूरे न कर सका. थानेदार ने बंदूक का बट उसके पेट में दे मारा. बूढ़ा वहीं कराहकर पसर गया. उसे गिरते देख गांव वाले बेकाबू हो गए. एक युवक ने आगे बढ़कर थानेदार की बंदूक थाम ली. वाटसन को ऐसे ही बहाने की तलाश थी. उसने सिपाहियों को इशारा किया. निर्दोष गांव वालों पर लाठियां बरसने लगीं. कई लोग घायल हुए. चारों ओर चीखपुकार मच गई. पर जीत अंततः गांववालों की हुई. गालियां बकता हुआ वाटसन सिपाहियों के साथ वापस लौट गया.

गांव वाले खुश थे, लेकिन बूढ़े का मन आशंकाओं से भरा था. वह जानता था कि कुटिल वाटसन इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं है. उसने अपने कुछ आदमियों को वाटसन पर नजर रखने के लिए भेज दिया. दलदल की सफाई का काम बाकी था. गांव वाले उत्सुक थे. श्रावणी पूर्णिमा का त्योहार धूमधाम से मना. अगले दिन पंचायत की बैठक बुलाई गई. उसमें बूढ़े ने लोगों को संबोधित करते हुए कहाᅳ‘उस दिन जो हुआ, बुरा हुआ. जो भी हुआ उसमें हमारा कोई दोष नहीं है. परंतु वाटसन उस अपमान को भूलेगा नहीं. वह बदला लेगा. यह जान लेने के बाद भी जो लोग दलदल की सफाई को तैयार हैं, अपने हाथ ऊपर कर दें.’

वहां मौजूद हर आदमी इस सवाल के लिए मानो पहले से ही तैयार था. सबने एक साथ अपने हाथ खड़े कर दिए. यह देख बूढ़े का झुर्रीदार चेहरा चमक उठाᅳ‘आप सबका हौसला देखकर मेरी चिंता खत्म हुई. अब मेरी जान भी जाए तो परवाह नहीं.’ उसी समय दो आदमियों ने हांफते हुए प्रवेश किया. वे सीधे बूढ़े के पास जाकर रुके.

कोई खास खबर गिरवर?’ बूढ़े ने पूछा.

बुरी खबर है चाचा!’ उनमें से एक ने उखड़ती सांसों पर काबू करने की कोशिश में कहा, ‘वाटसन से ऊपर शिकायत भेजी थी. उसने हमारे ऊपर सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है. एक या दो दिन में यहां पूरी कुमुक आने वाली है.’

आने दो….हमारा फैसला अटल है. अपने जंगल, जमीन और आजादी के लिए हम जान देने को भी तैयार हैं.’ लोगों ने एक साथ कहा.

तो हमारी उससे मुलाकात जंगल में ही होगी.’ बूढे ने हाथ उठाकर कहा.

अगले दिन गांव में मुंहअंधेरे हलचल मच गई. करीब पचास आदमी सूरज उदय होने से पहले ही अपनेअपने औजार संभाल जंगल की ओर निकल पड़े. बूढ़ा सबसे आगे था. झील के पास पहुंचकर उन्होंने मोर्चा संभाल लिया. दिन धीरेधीरे आगे बढ़ा. दोपहर हुई. लोग उत्साह के साथ काम में जुटे थे. दोपहर ढलतेढलते खबर सच होने लगी. पगडंडियां घोड़ों की टापों से गूंज उठी. इस बार पूरी फौज थी. वाटसन खुद हवा में बंदूक लहरा रहा था. गांव वालों को काम में जुटा देख वह गुस्से से तमतमा गया. आगापीछा सोचे बिना उसने सिपाहियों को आदेश दिया. निर्दोष ग्रामीणों पर चारों ओर से गोलियां बरसने लगीं. दलदल में चीखपुकार मच गई. एकएक कर ग्रामीण दलदल में लोटने लगे. एक गोली बूढे को भी लगी. वह वहीं लुढ़क गया. कुछ लोग उसे बचाने को दौड़े. लेकिन गोली लगने से वे खुद भी दलदल में समाने लगे. उस दिन जितने भी लोग थे, सब या तो घायल हुए अथवा मौत के घाट उतार दिए गए.

वाटसन को लगा कि जिस उद्देश्य के साथ वह आया था, वह पूरा हो चुका था. उसने सिपाहियों को वापस लौटने का आदेश दिया. घटना की खबर गांव पहुंचते देर न लगी. शाम हो चुकी थी. बढ़ते अंधेरे की चिंता किए बिना स्त्रीपुरुष बच्चेबूढ़े गुस्से से बेकाबू हो दलदल की ओर भाग छूटे. हाथों में लालटेन, मशाल और हथियार लिए, अलगअलग रास्तों से आगे बढ़ रहे थे. बुरी तरह चीखतेचिल्लाते. उन्हें अपनी ओर बढ़ते देख वाटसन और उसके साथी घबरा गए. उन्होने मैदान छोड़ने में ही भलाई समझी. जान बचाने के लिए जंगल का घुमावदार रास्ता चुना. अंधेरा हो चुका था. सिपाही घने पेड़ों के बीच से जैसेतैसे रास्ता खोजकर आगे बढ़ रहे थे. वाटसन अपनी सफलता पर खुश था. परंतु उसकी खुशी अस्थायी सिद्ध हुई. अचानक उसका घोड़ा डकराया और बीच रास्ते पसर गया. कोई कुछ समझ पाए उससे पहले वाटसन भी जमीन पर गिरकर तड़फने लगा. उसके बाद तो चारों ओर से तीरों की बौछार होने लगी. साथ आए सिपाही जान बचाने के लिए इधरउधर भागने लगे.

अचानक क्या हुआ था?’ खरगोश जो अभी तक दम साधे कहानी सुन रहा था, एकाएक बोल पड़ा.

उस जंगल में अनेक वन्य जातियां रहती थीं. उन्हीं में एक कबीला भीलों का भी था. वे अपनी तीरंदाजी के लिए दूरदूर तक जाने जाते थे. गोलियां चलने की आवाज सुन वे अपनेअपने हथियार संभालकर निकल पड़े. जैसे ही पता चला कि वाटसन से निहत्थे ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया है, उनके रोष का पारावार न रहा. जंगल के अंदरूनी रास्तों से गुजरते हुए उन्होंने वाटसन और उसके साथियों को घेर लिया.’ इतना कहकर कछुआ चुप हो गया. खरगोश दम साधे सुन रहा था

जालिम वाटसन का क्या हुआ?’ खरगोश ने पूछा.

उसे उसके किए की सजा मिली. उसके बाद अंग्रेज अधिकारियों ने उस जंगल और झील पर कब्जा करने के लिए तीन बार सेना भेजी. परंतु बहादुर भीलों और गांव वालों के हौसले के आगे उन्हें हर बार मुंह की खानी पड़ी. आखिरकार उन्होंने जंगल पर कब्जा करने का इरादा बदल दिया. उस दिन जंगल और झील की सुरक्षा के लिए चालीस ग्रामीणों ने खुद का बलिदान दिया था. उनमें वह अस्सी वर्ष का बूढ़ा भी शामिल था.’

इतना सुंदर सरोवर….यह किसने बनवाया?’

अंगेजों द्वारा पूरी तरह हार मान लेने के बाद भीलों और गांव वालों ने मिलकर सारे दलदल को साफ किया. फिर सबने मिलकर उसे इस सुंदर सरोवर में बदल दिया.’

लोग इसे आजाद सरोवर कहते हैं. इसका एक और नाम भी है?’ कबूतर ने जोड़ा. फिर जवाब की प्रतीक्षा किए बिना ही बोला, ‘‘गंगासागर’….और यह नाम किसी देवी या देवता के नाम पर नहीं….’’

उस वृद्धबहादुर गंगा सिंह के नाम पर है, क्यों?’ खरगोश ने बीच ही में जोड़ा.

तुम्हें कैसे पता?’ कबूतर ने पूछा.

इतनी अच्छी कहानी सुनने के बाद इतना तो समझ ही सकता हूं.’ नन्हे खरगोश ने कहा. इस पर सब हंस पड़े.

ओमप्रकाश कश्यप

संकल्प — जून 18, 2016

संकल्प


प्रदूषण का दायरा बहुत बड़ा है. सच में झूठ, आस्था में अंधविश्वास की मिलावट भी प्रदूषण है. यह सामाजिक पर्यावरण को दूषित करती है.

तो बात की बात यह कि एक राजा था. बड़ा ही सत्यवान. हमेशा सच खाता, सच पहनता और सच ही ओढ़ताबिछाता था. रातदिन वह झूठ को धिक्कारता, सत्य की पूजा करता, ईमान के गुण गाता था. लोग झूठ से दूर रहें, सचाई को सिर धरें, यह सोचकर उसने झूठ को अलगनी पर लटका रखा था. सिंहासन के ठीक सामने, ताकि हमेशा उसपर नजर रख सके. झूठ किसी के पास जाए नहीं, लोग उसके पास आएं नहीं, इसके लिए उसने सख्त पहरा बिठाया हुआ था. प्रतिदिन दरबार में प्रवेश करते ही वह सबसे पहले खूंटी के पास जाता. झूठ को धिक्कारता. पहरे को चाकचैबंद देख खुशीखुशी सिंहासन तक पहुंचता. जैसे ही सिंहासन पर बैठता, मुंह लगा महामंत्री महिमामंडन में जुट जाता था

झूठ जिनसे शर्मिंदा है. सच जिनके कारण जिंदा है, ऐसे महान प्रतापी सम्राट सत्यदेव की जय हो.’ दरबारी अवसर की तलाश में रहते. महामंत्री के चुप होने से पहले वे भी शुरू हो जाते

जय हो, जय हो…..जय ही जय हो.’

सभी एकदूसरे को याद दिलाते रहते थे कि झूठ को राजा ने नजरबंद कर रखा है. जब तक वह कैद है, बाहर सच के सिवाय कुछ हो ही नहीं सकता. इसलिए लोग दिमाग को ताक पर रख लेते. राजा का इकबाल, लोग झूठ से घबराते. उसका नाम भी आ जाए तो तत्काल समझौता कर लेते थे. एक बार की बात. नगर दरोगा की पत्नी ने हार की फरमाइश की. दरोगा सुनार की दुकान में जा धमका. सुनार हार दिखाने लगा

केवल बीस हजार का हुजूर….’ एक हार पर दरोगा की नजर टिकी देख सुनार बोला.

सोना तो खरा है न!’

महाराज की आन है….’ खरी बात कहूंगा, सोने की चमक पूरी, खनक अधूरी है.’

बाकी आधा क्या है?’

तांबा हुजूर.’ सुनार हंसने लगा.

सच सुनकर बहुत अच्छा लगा. लीजिए दस हजार रुपये.’

हुजूर हार तो बीस हजार का है!’

इतनी जल्दी भूल गए, लाला! चार दिन पहले जब मैं दरोगाइन के साथ आया था, उस समय दस हजार पेशगी दिए थे. मैं अपने हर लेनदेन का हिसाब रखता हूं. ये देखो, इसपर मेरी पत्नी की गवाही भी हैं.’ दरोगा ने जेब से डायरी निकाल ली. बदले में सुनार अपनी बही पलटने लगाㅡ‘इसमें तो कुछ नहीं लिखा.’

तुम्हारी बही झूठी है तो मैं क्या करूं….’ झूठ का नाम आते ही सुनार घबरा गया.

चाहे हजार रुपये और कम कर दें, पर झूठा न कहें हुजूर! झूठ से मुझे घोर नफरत है.’ कहते हुए सुनार ने दीवार की ओर इशारा किया. वहां एक तस्वीर टंगी थी. राजदरबार में टंगे झूठ की अनुकृति. दरोगा ने नौ हजार गिनकर हार ले लिया. उस लेनदेन से दोनों खुश थे. दरोगा यह सोचकर प्रसन्न था कि बीस हजार के हार को केवल नौ हजार देकर झटक लाया. सुनार इस बात से मग्न कि पालिश किया हार सोने की आधी कीमत दे गया. उस राज्य में ऐसा होता ही रहता था. आम धारणा थी कि सत्यदेव के राज में सब चलता है. लेकिन एकाध सिरफिरा कभीकभार कह ही देता थाㅡ‘सत्यदेव से तो झूठ देव भले.’

इस विश्वास के कई फायदे थे. विद्यार्थी पाठशाला के बहाने दिनभर मटरगश्ती करते. घर लौटने पर मातापिता पूछतेㅡ‘कैसी रही आज की पढ़ाई?’ सवाल के पीछेपीछे जवाब मानो बंधा चला आता.

पूछिए मत पिताजी! गुरुजी ने पूरे दिन लगाए रखा. सिर दर्द से फटा जा रहा है.’

बहुत अच्छे, तुम जाकर आराम करो, मैं दूध लेकर आता हूं.’ पिता बागबाग हो जाते. ऐसी ‘लाडली’ संतानों का अध्यापक भी पूरा ख्याल रखते. परीक्षा में जी खोलकर नंबर देते. सराहे वही जाते थे जो ‘चायपानी’ जैसी मामूली भेंट के बदले नंबरों का अंबार लगा देते थे. उनके लिए पदप्रतिष्ठा की कमी न पड़ती थी. वे अध्यापक जो मेहनत करते, मेहनत करवाना चाहते, उनकी पूछ न स्कूल के भीतर थी, न उससे बाहर. ‘दुनिया का यही चलन है’ कहकर लोग दुनिया का बड़े से बड़ा गम पी जाते. भूलना उस बीमार समाज की सबसे कारगर दवा थी. वह लोगों को अवसाद से बचाती. बिना झगड़ेटंटे के जीना सिखाती थी.

यह दिखाने के लिए कि राजा को प्रजा की बड़ी चिंता है, सत्यदेव जबतब हाथ उठाकर दरबार में हांक लगाताㅡ‘महामंत्री जी! हमारे राज्य में छोटेबड़े सब प्रसन्न तो हैं न?’ महामंत्री इसीलिए महामंत्री था कि वह अवसर कभी चूकता नहीं था. तत्काल जवाब देताㅡ‘बेइंतिहा खुश हैं महाराज! इतने कि लोगों से खुशी संभाले नहीं संभलती.’

अच्छा! ज्यादा खुशी का वे क्या करते हैं?’

पड़ोसियों में बांटते हैं….प्रजा में मेलजोल बना रहता है.’

हम जानते थे. झूठ को कैद कर लिया जाए तो खुशहाली झक मारकर आएगी. इसलिए हमने….’

झूठ को ही कैद कर लिया. आपकी दूरंदेशी सुभानल्लाह!’ मुंह लगा महामंत्री राजा के मुंह से शब्द झटक लेता. एक बार दस्तकारों का एक दल राजा से मिलने दरबार पहुंचा. उसमें नाई, धोबी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार, तेलीतमोली, बुनकर, राजमिस्त्री सब सम्मिलित थे. दरबार में उनके मुखिया ने राजा से फरियाद की

बस्ती के हालात बहुत बुरे हैं. सूखे ने फसल को चैपट कर दिया है. किसान बरबाद हैं. हमारे धंधे पिट रहे हैं. कुछ दिन इसी तरह रहा तो हम सब भूख से बेमौत मारे जाएंगे.’ सुनकर राजा ने गर्दन उचकाई. आगंतुकों को घूरा

महामंत्री तो कहते हैं, राज्य में चारों ओर खुशहाली है. इतनी ज्यादा कि लोगों से संभाले नहीं संभल रही.’

महामंत्री झूठे हैं….’ मुखिया के मुंह से निकला. जैसे किसी ने भरे दरबार में हमला किया हो. ‘झूठ’ शब्द राजा के सीने पर हथौड़े की तरह लगा

चुप! झूठ और हमारे दरबार में?’ राजा क्रोध में इतनी जोर से चीखा कि दरबार की दीवारें थर्राने लगीं. दरबारियों के औसान बिगड़ गए. समझ ही नहीं पाए कि क्या हुआ? फरियाद लेकर आए लोग भी घबरा गए. मुखिया भय से कांपने लगा. अवसर देख महामंत्री स्वयं खड़ा हो गया, बोला

मैं बताता हूं महाराज! राज्य में हर तरफ सच का बोलबाला है. खुशहाली तो इतनी ज्यादा है कि संभाले नहीं संभल रही. ज्यादा खुशी में लोग बहकने लगे हैं, उन्हें कहेअनकहे का होश नहीं रहता. पिछले दिनों मैंने सीमा से जुड़े गांवों का दौरा किया था. वहां घरआंगन, गलीचैबारे सब जगह खुशी मानो छलछला रही थी. लोगों के पास इतनी ज्यादा खुशी थी कि पड़ोसी राज्य के निवासियों को बांटने के बाद भी कम नहीं पड़ रही थी.’

शाबास! यही तो हम चाहते हैं.’ राजा बोला. अचानक जैसे कुछ याद आया हो. महामंत्री की आंखों में आंखें डालकर पूछाㅡ‘फिर ये सब परेशान क्यों हैं?’

सीधी बात है महाराज! भरे पेट तो मोहनभोग भी अच्छा नहीं लगता. लोग खुशी से उकताने लगे हैं.’

हम समझ गए. ज्यादा खुशहाली भी नुकसानदेह है.’ बड़बड़ाता हुआ राजा फरियादियों की ओर मुड़ाㅡ‘लालच बुरी बला होती है. आप लोग जाइए हमें और भी जरूरी काम निपटाने हैं.’ सैनिकों ने फरियाद करने आई दस्तकारों को बाहर निकाल दिया. उनके जाने के बाद राजा महामंत्री की ओर मुड़कर बोलाㅡ‘हमारी उदारता देखिए. प्रजा की खुशहाली के लिए झूठ को ही नजरबंद कर लिया. भूल गए कि इतनी खुशहाली जिससे राजा और प्रजा का अंतर ही मिट जाए, अच्छी नहीं होती. महामंत्री जी, आप इसी क्षण टैक्स वृद्धि की घोषणा कर दें. सौ पर बीस टका….वसूली में किसी प्रकार की नरमी राजद्रोह मानी जाए….समझे!’

वाह! महाराज की नेकनीयती के क्या कहने. सौ पर केवल बीस टका बढ़ोत्तरी.’ करअधिकारी ने प्रशंसा की तो हमेशा आगे रहने वाला महामंत्री भला क्यों चुप रहता. वह भी राजा के महिमामंडन में जुट गया. उसकी देखा देखी बाकी दरबारी भी उसका गुणगान करने लगे.

राजा सत्यदेव को कहानी सुनने का बड़ा शौक था. एक बार उसके दरबार में मशहूर किस्सागो पधारा. राजा ने उसका खूब आदरसत्कार किया. किस्सागो जानता था कि राजा खुश हो तो दानबख्शीश की झड़ी लगा देता है. गुस्से में इतना सनका जाता है कि कब क्या कर दे, कुछ पता नहीं. सो उसने अच्छीअच्छी कहानियां सुनानी आरंभ कीं. राजा भूखप्यास भूलकर कहानी सुनने लगा. कहानी अच्छी लगती तो अपनी थुलथुली जांघ पर हाथ मार कर कहताㅡ‘शाबास, एक और हो जाए.’ हंसने लायक प्रसंग हो तो तोंद पर हाथ मारते हुए जोरजोर से हंसता. उदासी वाली बात हो तो दुख में राजा के साथसाथ बाकी दरबारियों तोंदें भी पिचकने लगतीं. कहानी सुनातेसुनते पूरी रात बीती. दरबारियों की आंखों में नींद कुनमुनाने लगी. किस्सागो भी आराम करना चाहता था. लेकिन राजा अभी तक कहानियों में मग्न था. उसकी अनुमति के बिना किस्सागो को रोकने का ताब किसी में नहीं था.

महाराज अब अगला किस्सा सुनिए….’ किस्सागो ने आसमान की ओर देखा. पौ फटने ही वाली थी. किस्सागो ने आंखों को मलकर नींद को बाहर धकेला और नई कहानी का आगाज कर दियाㅡ‘एक राजा था. उसका सारा दरबार सोने का था. सोने की दीवारें, सोने की छत, सोने का फर्श और सोने की राजसिंहासन. दरबार में जहां तक नजर जाती सोना ही सोना दिखाई पड़ता था.’

वाह! ऐसा दरबार तो हमारा भी होना चाहिए. आखिर हमने झूठ पर फतह पाई है.’ राजा सत्यदेव ने कहा. उसके बाद तो जब तक कहानी चली, राजा सोने के दरबार के लिए फड़फड़ाता रहा. उतारचढ़ाव के साथ आगे बढ़ती वह कहानी भी अंततः पूरी हुई. किस्सागो ने नई कहानी सुनाने की अनुमति मांगी. इस बार राजा ने कोई उत्तर न दिया. वह दूर कहीं खोया हुआ था. उसकी चुप्पी देख किस्सागो अपना तामझाम समेटने लगा. उधर राजा के दिमाग पर एक ही धुन सवार थी. सोने का दरबार, सोने का सिंहासन.

कुछ दिन बाद की बात. महामंत्री घोड़े पर सवार हो सैर के लिए निकला था. सहसा उसके कानों में घंटियों की आवाज सुनाई दी. साथसाथ एक गीत

पैसापैसा….पैसा….पैसा

लोग जिएं या निकले दम

लाभ हमारा ना हो कम

हमें चाहिए, खूब चाहिए

रोज चाहिए सदा चाहिए

पैसा….पैसा….पैसा….पैसा

महामंत्री ने अपना घोड़ा रोक दिया. कुछ देर बाद उड़ती धूल के बीच से एक रथ आता हुआ दिखाई दिया. एक घुड़सवार को सामने देख रथवान ने गाना छोड़ दिया.

तुम कौन हो? कहां से आ रहे हो?’

मैं सेठ धनानंद का रथवान हूं. उन्हें लेकर सिंहल देश से लौट रहा हूं.’

यह नाम पहले तो कभी नहीं सुना!’ महामंत्री ने आश्चर्य जताया.

कैसे सुनते. सेठजी बारह वर्ष पहले सिंहल देश के राजा के बुलावे पर वहां गए थे. वहां रहकर व्यापार जमाया. राजा को इतना टैक्स दिया कि भंडार में सोना रखने के लिए जगह कम पड़ने लगी. इस बीच उन्हें अपने देश की याद आई तो मिलने चले आए.’ सोने का जिक्र होते ही महामंत्री को किस्सागो द्वारा सुनाई गई कहानी याद आने लगी. उसने तत्काल कहा

तो आज की रात हमारे मेहमान बनकर रहिए. सुबह महाराज से भी भेंट हो जाएगी.’ रथवान ने अपने मालिक से बात की. उसके बाद अपना रथ महामंत्री के घोड़े के पीछे लगा दिया. अगले दिन महामंत्री के साथ धनानंद भी दरबार पहुंचा. महामंत्री ने उसका खूब गुणगान किया

मुझे सोना चाहिए….खूब सोना. इस दरबार में जहां तक नजर जाए, वहां तक सोना ही सोना.‘

सोना बहुत महंगी धातु है महाराज!’ सेठ धनराज मुस्कराया.

उसके बगैर वैभव भी नहीं है.’ राजा बोला.

महाराज! हर चीज सोना नहीं होती. परंतु सोना हर चीज से बनाया जा सकता है.’

आप हमारे लिए सोना बनाइए, हम आपको…..’

मैं टोकाटाकी पसंद नहीं करता.’

हमें मंजूर है.’

तब ठीक है महाराज! चार साल बाद इस दरबार में जहां तक नजर जाएगी, सोना ही सोना दिखाई देगा….’

राजा ने अनटोक काम करते रहने की इजाजत दे दी. सेठ सचमुच का सेठ था. धरती के ऊपर और खुले आसमान के नीचे, जो भी उसे दिखा, उसी को व्यापार में खपाने लगा. राज्य में खूब घना जंगल था. नदी, बागान, तालतलैया, वनउपवन सब थे. सोना कमाने के नाम पर व्यापारी ने जंगल बेचे, घाट बेचे. नदियों के पाट बेचे. कुछ ही समय में जहां बाग थे, वहां जुआखाने नजर आने लगे. जहां तालतलैया वनउपवन थे, वहां ऊंचीऊंची इमारतें बनवाकर किराये पर चढ़ा दीं. व्यापारी के कहने पर राजा ने कर्ज पर सूद, रोजमर्रा की वस्तुओं पर टैक्स बढ़ाया. प्रजा की ओर से राजा ने अपने आंखनाककानसब बंद कर लिए.

आखिर व्यापारी ने जैसा दावा किया था, वही हुआ. राज्य का खजाना तेजी से भरने लगा. चारों तरफ सोना ही सोना. कुछ दिनों बाद राजा ने अपने दरबार का कायाकल्प कराया. नए दरबार में राजा का सिंहासन, दरबारियों के आसान, झाड़फानूस, पर्दे, दीवारें, छत सब सोने से झिलमिलाने लगे. झूठ अब भी सूली पर टंगा था. लेकिन उसकी अलगनी सोने से मंढी थी.

सेठ धनराज का ध्यान व्यापार पर था. राजा का सेठ धनराज पर. पहले राज्य राजा की मर्जी से चलता था, अब राजा खुद सेठ की इच्छा का दास था. दरबारी जो राजा के इशारों पर नांचते थे, अब वे सेठ धनराज के मुरीद थे. किसानों, मजदूरों पर क्या बीत रही है, इसकी किसी को सुध न थी. तभी वक्त ने करवट ली. हवा बदली. बादल उस राज्य से रूठ गए. आसमान आंख तरेरने लगा. सूरज के कोप से धरती पपड़ाने लगी. पहले बारिश न हो तो नदी, तालाब, पोखर, बावड़ियों से काम सध जाता था. सेठ धनराज के आने के बाद नदी के पाट, तालाब के घाटों पर कब्जा हो चुका था. बावड़ियां धूल फांकने लगी थीं. बादल तो तभी से रूठ चुके थे जब राजा ने पेड़ों और जंगलों को कटवाना आरंभ किया था. सूखे से अकाल की हालत बनी तो लोग त्राहित्राहि करने लगे. जंगल में भोजन की कमी पड़ी तो जानवर बस्तियों पर हमला करने लगे. लोग राज दरबार में फरियाद लेकर पहुंचे तो सैनिक दीवार बनकर खड़े हो गए. लोगों को लगा कि प्राण यदि बचाने हैं तो अपने गांवधरती का मोह छोड़ना होगा.

इधर के लोग उधर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि उधर के राज्य में खूब पानी बरसा. पांच दिनों तक बादल रौद्र रूप दिखाते रहे. खेतखलिहान, घरमकान सब बाढ़ में बहने लगे. लोग बचाकुछा समेटकर पड़ोस के राज्य में शरण लेने भाग छूटे. सरहद पर दोनों ओर के लोग मिले. एकदूसरे को आपबीती सुनाई

हमें बरबाद होने में फिर भी कुछ वर्ष लगे थे. तुम्हें तो कुदरत ने एक झटके में तबाह कर दिया.’ इधर के दुखियारे ने उधर के दुखियारे को सांत्वना दी.

डर तो पहले से ही था. जानते थे कि यह दिन अवश्य देखना पड़ेगा.’ उधर के दुखियारे ने राज खोला.

हमारे उजड़ने की कथा तो जगजाहिर है. तुम अपनी सुनाओ?’

हमारे राजा को घूमने का शौक था. एक बार दुनिया की सैर को निकला. लौटा तो उसकी आंखों में दुनिया की हर नायाब चीज को समेट लेने की सनक थी. इसी चक्कर में खजाना लुटाया जाने लगा. खजाना समाप्त हुआ तो टैक्स बढ़ाया गया. अनापशनाप टैक्स से भी बात न बनी तो धरती के बाहर और भीतर जो मिला, उसे बेचकर धन जुटाया जाने लगा. धीरेधीरे पेड़ बिके, पाट बिके. नदियों के घाट बिके. राजा की सनक में जंगल के जंगल साफ हो गए. खेती बंजर होने लगी. जिन लोगों पर प्रजा के सुखदुख की जिम्मेदारी थी. वे केवल अपना घर भरने में लगे थे. ऐसे में प्रजा की चिंता कौन करता! इसलिए जो हुआ समझो कुदरत के कोप का नतीजा है.’

कुदरत का गुस्सा भी तो केवल हम गरीबों को झेलना पड़ता है. राजा के लिए क्या बाढ़, क्या सूखा.’ इधर के दुखियारे ने कहा.

नहीं भइया! इस बार कुदरत ने खूब इंसाफ किया. जोजो अपराध में भागी थे, किसी को नहीं छोड़ा.’ कहते हुए उधर का दुखियारा कुछ पल के लिए रुका, ‘दोष हमारा भी कम न था. राजा का दोष था कि वह अपने स्वार्थ के आगे प्रजा को भूल चुका था. हम छोटीछोटी बातों के लिए भी राजा पर आश्रित हो जाने के दोषी थे. अपने हाथपैर, दिलदिमाग को दूसरों की मनमर्जी पर निर्भर कर देना कुदरत का अपमान था. इसलिए उसने किसी को नहीं छोड़ा. न राजा को न उसके दरबारियों को ना ही हम प्रजा को. राजा का दरबार, उसका महल, अटारियां सब बाढ़ की भेंट चढ़ गए.’

अच्छा! तो राज किसके हवाले है?’

देख नहीं रहे, पानी ही पानी. समझ लो बाढ़ के हवाले है.’ उधर के दुखियारे का जवाब था.

यहां पानी तो है. जहां से हम आए हैं, वहां तो पानी की बूंद तक नहीं है.’

आखिर हम क्या करें, कहां जाएं?’ लोगों के चेहरों पर चिंता व्याप गई. बाढ़ ने सीमा के एहसास को समाप्त कर दिया था.

क्यों न आज कि रात यहीं सरहद पर बिताई जाए. सुबह की पहली किरण के साथ जो विचार बनेगा, उस दिशा में चल देंगे.’ इस सुझाव को सभी ने स्वीकार कर लिया.

भूख पर इल्जाम मढ़ा जाता है कि वह आदमी को बेईमान, हिंसक, हत्यारा और न जाने क्याक्या बना देती है. दोष भूख का नहीं, उस व्यवस्था का है जो एक व्यक्ति के आगे भरी हुई थाली परोसती है और दूसरे को एक के बाद एक फाका करने के लिए मजबूर किए रहती है. उस समय मनुष्य का इंसानियत और समाज दोनों से भरोसा उठ जाता है. भूख की भलमनसाहत को उस रात उन लोगों ने सिद्ध किया जो अजनबियों की तरह एकदूसरे से मिले थे. कुछ ही पल में उन्होंने खुद को इंसानियत के रिश्ते से बांध लिया था. वह सरहद की कदाचित सबसे शांत रात्रि थी. पूरी रात वे भविष्य के नएनए सपनों पर विचार करते रहे.

सुबह हुई. सुबह की पहली किरण ने उनके चेहरों को छुआ तो सब एक साथ उठकर खड़े हो गए. उनके एक तरफ जहां तक नजर जाए, वहां तक पानी था. दूसरी ओर बंजर. सूखी, पपड़ाई हुई जमीन.

किधर चलें?’ एक ने पूछा.

जहां पानी है, वहां उम्मीद है.’ उत्तर मिला

ठीक कहा, हम उम्मीद को ही चुनेंगे.’

हमारा राजा कौन होगा?’

कोई नहीं….हम सब राजा होंगे.’

और राजा सत्यदेव? वह हमें चैन से रहने देगा?’

डरो मत! राजा वह तब तक था, जब तक हम उसे राजा मानते थे. जब हम प्रजा नहीं तो वह कैसा राजा!’

क्या हम अपने खेत, जमीन, जंगल, घरमकान सब राजा और उसके दरबारियों के लिए छोड़कर चले जाएं?’ किसी ने पूछा.

कहा न! अब कोई राजा नहीं है….इसलिए घरमकान, जंगल और जमीन सब पर सभी का अधिकार है. हम अपने राजा खुद हैं. आज से हमारा संकल्प हैमिलकर रहेंगे, मिलकर भोगेंगे और मिलकर इस धरती को संवारेंगे….क्यों भाइयो?’

बिलकुल, हम संकल्प लेते हैं कि मिलकर रहेंगे. मिलकर भोगेंगे और मिलकर इस धरती को संवारेंगे.’ स्वतंत्रता की अनुभूति, एकता का बल और भविष्य के खुशनुमा सपनों से जन्मा उल्लास, इन सबका खूब रंग जमा. लोग अपने सारे दुखअभाव भुलाकर नाचने लगे.

ओमप्रकाश कश्यप

सुपर कप्तान — मार्च 6, 2016

सुपर कप्तान


कहने को तो पूरा स्कूल था. स्कूल में अनेक कक्षाएं. प्रत्येक कक्षा में चालीसचालीस बच्चे. फिर भीजी, हां फिर भी चर्चा केवल उन तीन सहेलियों की होती. तीनों पढ़ने में तेज थीं. क्लास में सदा अव्वल आतीं. अंकों के मामूली अंतर से आगेपीछे रहतीं….अध्यापक उनकी प्रशंसा करते. प्रधानाचार्य पीठ थपथपाते. मुहल्लेपड़ोस में भी बातें उन तीन सहेलियों की ही होती. तीनों भली थीं. जिससे मिलतीं, उसे अपना दोस्त बना लेतीं. तो चलिए, कहानी आगे बढ़ाने से पहले आपको उनका नाम भी बताए देते हैं. इस सलाह के साथ कि यदि बीच रास्ते मिल जाएं तो अवसर चूके बिना आप उनसे दोस्ती गांठ लें

तीनों में से एक का नाम थाडाली.

दूसरी कामिताली.

और तीसरी थीनिराली.

तीनों साथसाथ स्कूल जातीं. साथसाथ पढ़तीं, साथसाथ खेलतीं, मनोरंजन और गपशप करतींसाथसाथ होमवर्क निपटातींऔर साथसाथ खेलतेकूदते, बोलतेबतियाते स्कूल जातीं. क्लास में किसी को भी शिकायत का अवसर न देती थीं. डाली नाटकों में हिस्सा लेती और गाती भी बहुत अच्छा थी. निराली की रुचि खेलों में थी. मिताली प्रकृति की इतने सुंदर चित्र बनाती कि देखने वाले दंग रह जाते. अवसर कोई भी हो, तीनों हमेशा प्रशंसा की पात्र बनतीं. सब उनसे खुश रहते. प्यार करते. किंतु एक बार….

एक बार की बात. रोज की भांति टीचर ने कुछ काम दिया. रोज की भांति तीनों से सबसे पहले निपटाया. उसके बाद टीचर ने होमवर्क दिया. अगले दिन तीनों समय पर स्कूल पहुंची. होमवर्क दिखाने को कहा गया तो तीनों ने अपनीअपनी कापी आगे कर दी. टीचर खुश. हमेशा की तरह शाबासी दी. पीठ थपथपाई. बाकी कक्षा मुंह लटकाए खड़ी थी. उन तीनों के अलावा बाकी किसी का होमवर्क पूरा न था.

तुम्हें इनसे सबक लेना चाहिए….’ टीचर ने बाकी विद्यार्थियों से कहा. इस पर कक्षा के एक कोने में खुसरपुसर होने लगी. टीचर डांटें या कोई सवाल करें, उससे पहले ही एक लड़की बोल पड़ी—‘मैडम ये तीनों बहुत चालाक हैं.’ किसी ने उन पहली बार लड़कियों की बुराई की थी. वे तीनों तो कुछ समझ ही नहीं पाईं. स्वयं टीचर भी अचंभित थीं. सबकी निगाहें शिकायत करने वाली लड़की की ओर उठ गईं.

सच कहती हूं मैम!’ लड़की ने आगे कहा, ‘ये तीनों होमवर्क को तीन हिस्सों में बांट लेती हैं. फिर अपनेअपने हिस्से का काम निपटाकर एकदूसरे की नकल कर लेती हैं. इस हिसाब से तीनों को केवल एकतिहाई होमवर्क करना पड़ता है. जबकि हमें….’ लड़की रुआंसी होने का नाटक करने लगी. कुछ बच्चे हंसने लगे. जबकि कुछ जो उन तीनों से ईष्र्या करते थे, लड़की ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने लगे. टीचर सन्न. सबको चुप देखकर….

डाली चुप….

मिताली चुप….

निराली भी चुप….

आगे से आप तीनों कक्षा में अलगअलग बैठेंगी. अलगअलग होमवर्क करेंगी.’ टीचर ने आदेश सुनाया. जैसे वज्रपात हुआ हो. तीनों सहेलियां हतप्रभ. उन्हें टीचर से ऐसे व्यवहार की उम्मीद हरगिज न थी.

मैडम आप हम तीनों से कोई भी प्रश्न पूछ सकती हैं.’ आदेश से घबराई डाली ने कहा. टीचर ने उसकी बात को नजरंदाज कर दिया.

अलगअलग बैठाने के बजाय आप हमें अलगअलग होमवर्क दे सकती हैं.’ मिताली ने प्रतिवाद किया. टीचर ने फिर अनसुना कर दिया.

आप हमें बाकी बच्चों से ज्यादा होमवर्क दें, हम उसे भी कर लेंगीं. परंतु अलगअलग बैठने को न कहें.’ निराली बोली. तीनों में वह सबसे छोटी थी. टीचर ने उसके सुझाव पर भी कोई ध्यान नहीं दिया. मिताली गुमसुम थी. मानो सदमे से बाहर आने की ताकत ही शेष न हो. अगले दिन टीचर ने उन्हें अलगअलग बिठा दिया. उस शाम स्कूल की छुट्टी होने पर तीनों मिलीं तो उदास थीं. मिताली अभी तक सदमे की अवस्था में थी. आँखें लाल….

हम तीनों किसी और स्कूल में एडमीशन ले लेते हैं?’ डाली ने सुझाव दिया.

ऐसे कैसे स्कूल छोड़ दें.’ निराली गुस्से में थी, ‘टीचर ने उन बच्चों का साथ देकर गलती की है. क्यों न हम प्रिंसीपल मैडम के पास चलें. वे हमारी बात जरूर समझ जाएंगी.’

ठीक है…!’ डाली ने सहमति जताई. तीनों सहेलियां उसी दिन प्रधानाचार्य से मिलीं. उनसे अपनी बात कही. तीनों को न्याय की उम्मीद थी. पूरी बात सुनने के बाद प्रधानाचार्य ने फैसला सुनाया—‘अगर तुम तीनों सही हो तो अलगअलग बैठकर भी अच्छे अंक ला सकती हो?’

तीनों उदास मन लिए वापस लौट आईं.

अच्छा तो यह होता कि तीनों लड़कियां टीचर के निर्णय को चुनौती की तरह स्वीकार करतीं. सोच लेतीं कि परेशानी किसी समस्या का निदान नहीं है. धैर्यवान इंसान पर्वत को झुका सकता है. जबकि डरा हुआ आदमी रस्सी को भी सांप समझकर रास्ता बदल लेता है. लेकिन उन तीनों की परेशानी ऐसी बढ़ी कि,

साथसाथ पढ़नाखाना छूट गया.

आतेजाते हंसनामुस्कराना छूट गया.

खेलनाकूदना, धूम मचाना भी छूट गया.

अब उनका पढ़ने में मन न लगता था. पहले तीनों सहेलियां कक्षा में मुखर होती थीं. टीचर सवाल करतीं तो वे जवाब देने के लिए सबसे पहले हाथ उठातीं. अब उनकी जुबान पर ताले पड़े रहते. तीनों अपनीअपनी जगह गुमसुम बैठी रहतीं. पहली तिमाही की परीक्षा हुई. परिणाम आया तो बेहद निराशाजनक. तीनों के नंबर अपेक्षा से बहुत कम थे—

आ गई न असलियत सामने….एकदूसरे की नकल मारकर तीनों होशियारी दिखाती थीं.’ परीक्षाफल देखकर एक विद्यार्थी ने टिप्पणी की. स्वयं टीचर को भी ऐसी उम्मीद न थी. बाकी बच्चों के चले जाने के बाद टीचर ने उन्हें समझाने लगीं—

जीवन में चुनौतियां रूप बदलबदलकर आती हैं. तुम्हारे लिए यह एक चुनौती ही थी. मैं सोचती थी कि तुम तीनों हिम्मत दिखाकर अपने आलोचकों का मुंह बंद कर दोगी.’ इसपर तीनों कुछ न बोलीं. गर्दनें जमीन पर टिकाए रहीं. तीनों सहेलियों की स्कूल में अलग पहचान थी. कक्षा तो दूर, पूरे विद्यालय में उनका स्थान लेने वाला कोई न था. परीक्षा में तीनों एक साथ पिछड़ीं तो स्कूल भी पिछड़ने लगा. प्रिंसीपल मैडम को चिंता होने लगी. उन्होंने क्लास टीचर को बुलाया. टीचर उद्धिग्न थीं. पश्चाताप की भावना उनके चेहरे से झलक रही थी. सो प्रिंसीपल के पूछने से पहले ही बताने लगीं—

उन तीनों के साथ गलत हुआ है. मैं जानती थी कि उनपर लगा आरोप एकदम गलत था. जिन बच्चों ने शिकायत की थी, वे उनसे ईर्ष्या रखते हैं. फिर भी मैंने यह सोचकर उन्हें अलगअलग बैठाने का निर्णय लिया था कि तीनों जीवन की चुनौतियों को झेलने के लिए हरदम तैयार रहें. मैं नहीं समझती थी कि उसका ऐसा परिणाम होगा.’

आपको उन्हें समय देना चाहिए था.’ प्रिंसीपल ने पूछा.

मैं अपना आदेश वापस लेना चाहती हूं. लेकिन डर है कि उससे दूसरे विद्यार्थियों को गलतफहमी बनाए रखने का मौका मिल जाएगा.’

तीनों विलक्षण हैं. उन्हें एकदूसरे की कमजोरी नहीं, ताकत बनना चाहिए.’ प्रिंसीपल ने कहा. विचारविमर्श के बाद तय किया गया कि तीनों को संभलने का कुछ और अवसर दिया जाए. उसी दिन लंच में तीनों सहेलियों को स्टाफ रूम से बुलावा आया. तीनों वहां पहुंची तो वहां मौजूद क्लास टीचर ने उन्हें प्यार से बैठने को कहा.

क्या तुम तीनों अपनेअपने परीक्षाफल से संतुष्ट हो?’ सहज होने के पश्चात टीचर ने सवाल किया. इसपर तीनों गर्दन झुकाए रहीं. उनकी चुप्पी टीचर को अखरने लगी. मगर वे इतनी जल्दी हार मानने वाली न थीं. एक और कोशिश करते हुए टीचर ने कहा, ‘हमें जीवन में कई बार ऐसे हालात से गुजरना पड़ता है जो हमको जराभी अच्छा नहीं लगता. उस समय हमें धैर्य के साथ परिस्थिति का सामना करना चाहिए. मुझे नहीं लगता था कि तुम इस छोटीसी परीक्षा में असफल हो जाओगी.’

तीनों कुछ न बोलीं. टीचर ने समझाना जारी रखा—‘मैं अपने फैसले को बदलना चाहती थी. लेकिन तुम्हारा परीक्षाफल देखने के बाद मैं हरगिज ऐसा नहीं करूंगी. अगर ऐसा किया तो जो आरोप तुमपर लगाया गया था, वह एकदम सही मान लिया जाएगा.’

परीक्षाफल बिगड़ने से वे तीनों परेशान थीं. कुछ टीचर के समझाने का असर था. क्लास रूम से बाहर आते समय डाली ने कहा—

एकदूसरे के पास न सही, हैं तो तीनों एक ही कक्षा में. हमें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए.’

मैं भी यही सोचती हूं. आखिर हम यहां पढ़ने के लिए आती हैं….कक्षा से बाहर तो हम मिलती ही हैं.’ निराली ने डाली का साथ दिया.

टीचर ने उन बच्चों का साथ ही क्यों किया था….उनका संदेह मिटाने के लिए वे हमारी परीक्षा भी ले सकती थीं.’ मिताली बोली. कमजोर परीक्षाफल ने उसे और भी व्यथित कर दिया था. मिताली की वेदना ने डाली और निराली को भी दुखी कर दिया.

फिर तुम ही बताओ क्या करें?’

हमारी टीचर ही हमपर विश्वास नहीं करतीं तो कोई दूसरा क्यों करेगा! ऐसे में हम पढ़लिखकर भी क्या करेंगी!’ मिताली को लगता था कि कक्षा में उसका अपमान हुआ है. इस क्षोभ और पीड़ा से वह उबर ही नहीं पा रही थी.

डाली और निराली सबकुछ भुलाकर पढ़ना चाहती थीं. किंतु मिताली बातों ने उन्हें भी उद्धिग्न कर दिया. दिन बीतने लगे. टीचर की तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी हालत में परिवर्तन न हुआ. छमाई परीक्षा में एक बार फिर अंक कम आए तो टीचर और प्रधानाचार्य के अलावा तीनों के अभिभावक भी चिंता में पड़ गए. वे लगभग साथसाथ स्कूल पहुंचे. टीचर और प्रिंसीपल दोनों से मिले—

आश्चर्य की बात है, बच्चियों ने इतनी छोटीसी बात दिल पर रख ली.’ अध्यापक से पूरी बात जान लेने के बाद उनमें से एक ने कहा.

हैरानी तो हमें भी है.’

अब?’

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाना नहीं है. हम चाहते हैं कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में भी निखार हो. आप धीरज रखिए, हम कोशिश कर रहे हैं.’ प्रधानाचार्य ने अभिभावकों को समझाया. वे संतुष्ट होकर अपनेअपने घर लौट गए. तीनों लड़कियों के स्वभाव में आए बदलाव से मुहल्ले वाले भी परेशान थे. बस्ती में कोई न कोई सांस्कृतिक आयोजन हमेशा चलता रहता था. पहले तीनों सहेलियां उनमें बढ़चढ़कर हिस्सा लेती थीं. अब वे उनसे भी बचने लगी थीं. उससे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आभा फीकी पड़ने लगी थी.

उस विद्यालय की गिनती शहर की अच्छी संस्थाओं में थी. उसके अलावा शहर और भी कई स्कूल थे. सब मिलकर फरवरी में सालाना जलसा करते थे. पहले तीनों सहेलियां वार्षिकोत्सव में खुशीखुशी हिस्सा लेतीं. स्कूल की ओर से भेजे गए प्रतिभागियों की सूची में उनके नाम सबसे ऊपर होते. लेकिन उस वर्ष तीनों में से एक ने भी सालाना जलसे में भागीदारी की इच्छा पेश न की. न ही किसी ने उनसे पूछा.

हमें टीचर से बात करनी चाहिए.’ डाली ने कहा.

बिलकुल! वे यदि इन्कार करेंगी तो हम प्रधानाचार्य से मिलेंगे.’ निराली ने साथ दिया.

जाने दो, जब उन्हें ही हमारी याद नहीं तो हम क्यों उनकी फिक्र करें.’ मिताली ने कहा.

ऐसे कैसे जाने दें….पिछले कई वर्षों से हम हर जलसे में शामिल होती आई हैं. कई मेडल स्कूल के लिए जीते हैं. वे हमें ऐसे अलगथलग नहीं कर सकते.’ निराली ने प्रतिवाद किया.

तो ठीक है, तुम दोनों हिस्सा लो….मैं किसी से कहने नहीं जाऊंगी.’ मिताली ने फैसला सुनाया. उसे सुनकर बाकी दोनों लड़कियों ने भी वार्षिकोत्सव में हिस्सा लेने का इरादा छोड़ दिया. तीनों सहेलियों का नाम किसी भी सूची में न देख बाकी विद्यार्थियों को भी अटपटा लग रहा था.

वार्षिकोत्सव के लिए प्रतिभागियों को विदा करने के लिए कार्यक्रम का आयोजन था. प्रिंसीपल सहित सभी अध्यापक, विद्यार्थी और बच्चे वहां मौजूद थे. मंच के सामने, पहली कतार में प्रतिभागियों को बिठाया गया था. केवल औपचारिक घोषणा बाकी थी. सो बिना समय गंवाए प्रिंसीपल मैडम ने घोषणा की—‘हमेशा की तरह इस वर्ष भी हमारे होनहार विद्यार्थी कई प्रतियोगिताओं में भाग लेंगे. कुल आठ टीमें बनाई गई हैं. प्रत्येक टीम एक विद्यार्थी के नेतृत्व में अपने कौशल का प्रदर्शन करेगी.’ इसपर बच्चे ताली बजाने लगे. मैडम कुछ पल के लिए रुकीं, उसके बाद आगे बताने लगीं, ‘इस वर्ष से हमने नई पहल की है. टीमों के बीच तालमेल बिठाने, आवश्यकता पड़ने पर टीम कप्तान की मदद करने के लिए तीन ‘सुपर कैप्टन’ हमने नियुक्त किए गए हैं. सुपर कप्तान चुनी गई लड़कियां इस स्कूल की सबसे होनहार लड़कियां हैं, आप उनके बारे में भलीभांति जानते हैं, उनके नाम….’ मैडम फिर कुछ पल तक विराम की अवस्था में आ गईं. बच्चे सांस रोके प्रतीक्षा कर रहे थे. उनके कौतूहल को शांत करते हुए मैडम ने बताने लगीं—

सालाना प्रतियोगिताओं में हमारे स्कूल की सुपर कप्तान होंगी, इस विद्यालय की सबसे होनहार छात्राएं, डाली, मिताली और निराली.’

अपना नाम सुनकर तीनों सहेलियां चौंकी. वे उठकर खड़ी हुईं. कुछ कहना चाहती थीं कि तभी उनकी टीचर तालियां बजाने लगी. इसी के साथ पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा. मानो सब किसी सोचीसमझी नीति का हिस्सा हो. प्रिंसीपल मैडम उठ गईं. इसी के साथ कार्यक्रम के संपन्न होने की घोषणा कर दी गई.

इरादे नेक हों तो परिणाम नेक ही होते हैं. सालाना जलसा ठीकठाक संपन्न हुआ. उसके एक सप्ताह पश्चात स्कूल फिर पूरी तरह सजा था. स्कूल के प्रवेश द्वार को फूलमालाओं सजाया गया था. रंगबिरंगे गुब्बारे जगहजगह अपनी छटा बिखेर रहे थे. इस बार सबके चेहरे पर उल्लास था. एक बड़ासा मंच और सामने कुर्सियां लगवाई हुई थीं. मंच के आगे बिखरे फूल वातावरण में उल्लास में वृद्धि कर रहे थे. तभी प्रिंसीपल मैडम मंच पर आईं. स्वागत और तालियों की आवाज के बीच उन्होंने कहना आरंभ कर दिया—

मित्रो, आज हमारे स्कूल के लिए बहुत गर्व और खुशी का दिन है. जलसे में हमारी सभी टीमों ने बढि़या प्रदर्शन किया. उसी का परिणाम है कि कुल आठ स्वर्ण पदकों में तीन हमारे स्कूल के हिस्से आए हैं. इनके अलावा दो रजत पदक भी. मैं उन सभी विद्यार्थियों का अभिनंदन करती हूं, जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से स्कूल को गर्व करने का अवसर दिया है. सबसे पहले मैं फुटबाल टीम की कप्तान चंदना को यहां बुलाना चाहूंगी.

एक लड़की उठी और धीरेधीरे मंच पर जाकर बताने लगी—

धन्यबाद पिं्रसीपल साहिबा. अपने स्कूल के लिए स्वर्ण जीतने का मुझे गर्व है. साथ में खुशी भी. लेकिन मैं बता देना चाहती हूं कि इस जीत के श्रेय की सही अधिकारी मैं कतई नहीं हूं. यह जीत हमें निराली के कारण प्राप्त हुई है. वही सम्मान की असली हकदार है….’

निराली तो खेल में हिस्सा न लेने की ठाने हुए थी?’ सामने की तरफ से सवाल उछाला गया.

निराली क्यों तैयार हुई, यह तो मैं नहीं जानती. मैं जानती थी कि पिछले टूर्नामेंट हमने निराली के कारण ही जीते थे. इसलिए मैं शुरू से ही चाहती थी कि वह टीम का हिस्सा बने. मुझे खुशी है कि निराली ने हमारी उस समय मदद की, जब हमें उसकी सबसे अधिक जरूरत थी. प्रतिद्विंद्वी टीम हम पर हावी होती जा रही थी. हम जीतने की उम्मीद खो चुके थे. तब अचानक उसने टीम में उतरने का संकेत दिया. मौका निकालकर मैंने उसे खेल में शामिल भी कर लिया.’

मंच पर पूरी तरह सन्नाटा व्यापा हुआ था. चंदना बताए जा रही थी—‘निराली के आते ही बाजी पलटने लगी. जो प्रतिद्विंद्वी टीम हमसे दो गोल आगे थी, अगले बीस मिनट के खेल में वे हमसे एक गोल पीछे थे. खेल समाप्त होने से पांच मिनट पहले ही हम अपनी जीत पक्की कर चुके थे.’ सभी को जीत की खुशी थी. लेकिन निराली खेलने को क्यों तैयार हुई, यह जानने की उत्सुकता अधिक थी.

निराली ने सही समय पर निर्णय लेकर इस स्कूल का मान रखा है. हम चाहेंगे कि वही हमारी जिज्ञासा को शांत करे.’ नाम पुकारे जाने पर निराली मंच पर पहुंची और बिना किसी भूमिका के बताने लगी, ‘फुटबाल के अलावा मिताली ने चित्रकला और डाली ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए गोल्ड जीता है. यह देखकर आपको समझ जाना चाहिए. फिर भी मैं बताए देती हूं.’ निराली ने कहा. सब सांस रोककर सुनने लगे, ‘हमारे साथ कक्षा में जो घटा था उसके बाद मिताली सबसे ज्यादा आहत थी. वह किसी भी कार्यक्रम में हिस्सा लेने को तैयार न थी. मैंने और डाली ने भी तय किया था कि जब तक मिताली टूर्नामंेट से दूर रहेगी, हम भी नहीं हिस्सा नहीं लेंगी.’

फिर मिताली कैसे तैयार हुई?’ सामने से आवाज आई.

समझ लीजिए सबकुछ अपने आप हुआ. चित्रकला प्रतियोगिता आरंभ होने तक वह बिलकुल तैयार नहीं थी. लेकिन जहां चित्रकला की स्पर्धा होनी थी, वह लोकेशन इतनी सुंदर थी कि वह अपने आपको न रोक सकी.’ निराली ने बताना शुरू किया, ‘आयोजकों ने चित्रकला की स्पर्धा खुले में आयोजित की थी. चारों ओर खेत ही खेत थे. बच्चों को एक पार्क में बिठा दिया था. बसंत का मौसम. चारों और फूल ही फूल खिले थे. खेतों में पीली सरसों लहलहा रही थी. चित्रकला प्रतियोगिता का शीर्षक भी ‘वसंत’ था. विद्यार्थियों को उसी के चित्र बनाने थे. मिताली कुछ देर तो गुमसुमसी प्रतिभागियों को चित्र बनाते देखती रही. धीरेधीरे वह अपने चारों और फैले प्राकृतिक सौंदर्य में डूबकर आपा खो बैठी. उसके कदम अपने आप कैनवास की ओर बढ़ते चले गए. उसके बाद मेरे और डाली के लिए भी कोई बंधन न था.’ निराली के मंच से उतरते ही संचालक मंच पर आकर बताने लगी—

हमें मालूम था, मिताली कैनवास को देखकर उससे दूर नहीं रह सकती. जानते हो बच्चो, हमारी मिताली ने चित्र में क्या बनाया था….वसंत को कोई बालक सरसों के पीले फूलों में देख रहा था तो किसी को गुलाब पर मंडराती तितलियों का चित्र बनाने में आनंद आ रहा था. मिताली ने प्रकृति के साथसाथ चित्र बनाते बच्चों को भी अपने कैनवास पर उतार डाला. पीली सरसों, महकी हवा और बच्चे, मिताली ने प्रकृति और जीवन को एकमेव कर दिया. उसके बाद तो चित्रकला का पहला पुरस्कार उसके नाम होना ही था. मिताली शुरू हुई तो डाली और निराली के लिए भी रास्ता खुल गया.’

निराली और मिताली के बारे में जान लेने के बाद सबके मन में डाली के बारे में जानने की उत्सुकता थी. उसके बारे में बताने के लिए खुद प्रिंसीपल मैडम खड़ी हो गईं, ‘डाली के बारे में बताने से पहले मैं आपको उस महान स्त्राी के बारे में बताना चाहूंगी, जिसने नारी शिक्षा के अधिकार के लिए सबसे पहले लड़ाई शुरू की थी. उस समय जब लड़कियों को पढ़ानालिखाना अच्छा नहीं समझा जाता था, उसके अलावा भी उनपर ढेर सारे बंधन थे, पूरा समाज रूढि़यों में जकड़ा हुआ था—तब उस स्त्राी ने न केवल लड़कियों के लिए स्कूल खोला, बल्कि तमाम विरोधों के बावजूद लड़कियों को पढ़ाना जारी रखा. उसका महान स्त्राी का नाम था—सावित्री बाई फुले. डाली ने अपने ‘एकल नाटक’ में सावित्री बाई फुले के जीवनसंघर्ष को इतने जीवंत रूप में सामने रखा कि आयोजक और दर्शक सब ‘वाहवाह’ कहने लगे.’

कार्यक्रम संपन्न हुआ तो स्कूल में सभी की जुबान पर उन तीन सहेलियों की चर्चा थी. अगले दिन की बात. वे तीनों समय पर स्कूल पहुंची और कक्षा में अपनीअपनी जगह जाकर बैठ गईं. थोड़ी देर बाद टीचर ने प्रवेश किया. आते ही उसने तीनों सहेलियों को पुकारा—

तुम तीनों एक साथ अपने पुराने स्थान पर बैठ सकती हो.’

थैंक यू मैडम, हम यहीं ठीक हैं.’ मिताली ने खडे़ होकर कहा. यह सुनकर टीचर हैरान होकर उसकी ओर देखने लगी—

क्या तुम अभी तक नाराज हो?’

नो मैडम, हम अलगअलग होकर भी एक हैं.’ इस बार तीनों ने एक साथ कहा. यह सुनते ही सारी कक्षा तालियों से गूंजने लगी.

ओमप्रकाश कश्यप

रोशनी की खातिर — नवम्बर 14, 2015

रोशनी की खातिर


कई बार मनचीता अकस्मात हो जाता है. मैं कहानी की तलाश में निकला हुआ था कि राह किनारे इबारत देखकर चौंक पड़ा. लिखा थाᅳ‘कहानी की तलाश है, तो इधर से जाएं.’

जैसे कोई स्वप्न फला हो. मैं उधर मुड़ गया. संकरी पगडंडी को पत्तों ने ढक रखा था. पांव पड़ते ही सूखे पत्ते चरमरा उठते. कहीं पढ़ा था, ‘प्राण हर वस्तु में होते हैं. उनकी मात्रा चेतना के स्तर से तय होती है.’ सूखे पत्तों में भी इतनी चेतना तो है कि कोई दबाए तो चरमराकर अपना प्रतिरोध जता सकें. मेरा बस चलता तो पत्तों से बचकर आगे बढ़ता. लेकिन पगडंडी के दोनों ओर घनी झाडि़यां थीं. रंग-बिरंगे फूलों से लदी हुईं. स्पर्श मात्र से फूल झर-झर झरने लगते. हवा उनकी गंध से सुवासित थी. मैं आगे बढ़ ही रहा था कि निगाह एक और इबारत पर पड़ीᅳ

‘कहानी की खोज में निकलने वाले व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि वह खुद भी एक कहानी है.’ मेरे लिए यह विचार नया नहीं था, किंतु उसे इबारत के रूप में देखकर देह सिहरने लगी थी. मैं आगे बढ़ता गया. कुछ देर बाद झाडि़यां समाप्त हो गईं. एहसास हुआ कि मैं शहर बहुत पीछे छूट चुका है. चारों ओर खुला मैदान था. कुछ दूर आगे जाते ही जमीन पर खिंची लकीरों पर नजर पड़ी. कौतूहल लिए मैं उस ओर बढ़ गया. नई इबारत में लिखा थाᅳ‘अमीर गरीबी का पोषण करता है.’

‘यह अवश्य किसी की शरारत है.’ᅳउक्ति का एकाएक अभिप्राय समझ न आने पर मैंने सोचा और चारों ओर नजर दौड़ाई. रेत पर केवल मेरे पैरों के निशान थे. मन हुआ कि वापस लौट चलूं. लेकिन कहानी? पिछले कई दिनों से मैं नई कहानी की खोज में था. अब परिस्थितियां बन रहीं हैं, इसलिए मैं अवसर को चूकना नहीं चाहता था. आगे बढ़ने पर मैदान चांदी की विशाल परात जैसा दिखने लगा. चारों ओर रेत ही रेत. सफेद शीतल, मानो चांदनी में धुला हो. मौसम साफ था. आकाश नीला और चमकीला. तभी ताजी हवा का शीतल झोंका मेरे चेहरे से टकराया. मन ताजगी से खिल उठा.

‘मत भूलो की तुम यहां कहानी की तलाश में आए हो.’ मैंने खुद को चेताया. तभी लगा जैसे किसी ने मेरे पैरों को छुआ हो. मैंने झुककर देखाᅳनीचे एक पीपल का पत्ता था. सूखा पर तना हुआ. अगर पत्ता है तो पेड़ भी आसपास होना चाहिए. सहसा हवा का दूसरा झोंका आया और पत्ता छिटककर दूर जा पड़ा. उस वीराने में मानो वही मेरा एकमात्र मीत हो. मैं उसको पकड़ने के लिए आतुर हो उठा. मगर अगले झौंके ने पत्ते को और आगे ढकेल दिया. मैं उसके पीछे भागा. सामने एक और इबारत थीᅳ‘जहां कम संभावना दिखे, वहां राह जल्दी निकलती है.’ एक के बाद एक सामने आती पहेलियां मेरी उलझन को बढ़ा रही थीं. घर से निकले कई घंटे हो चले थे. निराशा बढ़ने लगी थी. फिर भी कुछ ऐसा था, जो उस स्थान से बांधे हुए था.

मानो हवा और पत्ते के बीच कोई गुप्त संधि हो. जैसे ही मैं पत्ते तक पहुंचने को होता, हवा का झोंका उसको आगे खिसका देता था. मैदान बीच से उठने के बाद फिर ढलान में बदल चुका था. मैं पत्ते का पीछा करते हुए आगे बढ़ रहा था. तभी सामने एक खंडहर दिखाई पड़ा. आगे एक और इबारतᅳ‘हर पुरानी इमारत वक्त की छाती पर टंकी इबारत होती है.’ नई पहेली में उलझने का मेरा इरादा न था. मेरा ध्यान उस खंडहर में अटका था. वे किसी हवेली के अवशेष थे. दीवारें दरक चुकी थीं. छतों का तो नामोनिशां न था. अगली बार खंडहर को पार कर पत्ता जहां पहुंचा वहां पीपल का पुराना पेड़ था. मेरे कदमों की आहट से पीपल के पक्षी फड़फड़ाए. लेकिन कुछ देर बाद वापस लौट आए. आसपास कोई और ठिकाना न देख वे शायद लंबी उड़ान भरना भूल चुके थे.

‘स्वागत है, लेखक महोदय.’ एक भारी, गंभीर आवाज मेरे कानों में पड़ी. मैं चौंककर इधर-उधर देखने लगा. सिवाय उस पेड़ और सुनसान खंडहर के वहां कोई न था. आवाज शायद मेरे भीतर से ही आ रही थी, ‘हर बार लेखक ही कहानी को ढूंढे यह जरूरी नहीं है. कभी-कभी कहानी भी अपना लेखक खोज लेती है. इस बार कहानी ने तुम्हें चुना है.’

‘कैसी कहानी?’

‘बहुत पुरानी कहानी है. ये जो खंडहर तुम देख रहे हो, यहां कभी जमींदार की हवेली थी. इलाके का सबसे बड़ा जमींदार था वह. बहुत ही घमंडी, अहंकारी और कठोर. वह चाहता था कि पूरा गांव उसे अपना ‘अन्नदाता’ माने. सारी भूमि जमींदार के अधीन थी. पूरे गांव पर केवल जमींदार का आदेश चलता था. वह दिन कहे तो दिन, रात कहे तो रातᅳ

‘सूरज मेरी हवेली के ऊपर से उगता है.’ गुमान से तना जमींदार कहता.

‘सही फरमाया हुजूर! कई बार मैंने भी सूरज मियां को आपकी छत पर लोट लगाते देखा है.’ मुंह लगे कारिंदे ‘हां’ में ‘हां’ मिलाने लगते. ऐसे-ऐसे झूठ बोलते कि खुद झूठ भी शर्म से सिकुड़ जाएᅳ

‘आकाश-यात्रा की अनुमति लेने आया होगा.’ तीसरा कहता. इसपर बाकी लोग भी जोर-जोर से हंसने लगते. मकसद एक ही होता, जमींदार को खुश रख अपना उल्लू सीधे करते रहना.

वह छोटा-सा गांव था. पचास-साठ घरों वाला. घर क्या कोरी झोपडि़यां थीं. गांव किनारे झोपड़ी में एक बुढि़या अपने बारह-तेरह वर्ष के पोते के साथ रहती थी. वह दिन-भर मेहनत करती. शाम को अपने पोते के साथ खाना खाती और सो जाती.    उस साल दशहरा आया तो बुढि़या ने पोते को कटोरा थमाते हुए कहाᅳ‘बेटा हवेली से तेल ले आ.’

‘हवेली से क्यों मां? घर में क्या तेल की कमी है?’ लड़के ने पूछा.

‘नहीं रे, दशहरे का त्योहार है. दीपक जलाए जाएंगे….’

‘पर हवेली से ही क्यों?’

‘परंपरा ही ऐसी है बेटा. गांव के सारे दीये हवेली के तेल से ही जलते हैं.’ दादी की बात मानकर लड़का हवेली की ओर चल दिया. हवेली पहुंचा तो वहां तेल लेने वालों की कतार लगी थी. लड़का भी उसमें शामिल हो गया. काफी देर बाद उसका नंबर आया. तेल लेकर लौटते-लौटते शाम हो चुकी थी. बुढि़या ने जल्दी-जल्दी दीये तैयार किए. लड़का प्रतीक्षा में था कि पूजा संपन्न हो और कुछ खाने को मिले. लेकिन बुढि़या न जाने किसके इंतजार में व्यग्र थी. वह बार-बार बाहर जाती, हवेली की ओर नजर डालती और मन मसोसकर लौट आती थी. देर तक बाहर-भीतर जाने से बुढि़या थक गई और निढाल होकर जमीन पर पसर गई. आखिर लड़के से रहा न गयाᅳ

‘मां! भूख लगी है, जल्दी करो.’

‘बस थोड़ी देर बेटा….जरा बाहर जाकर देख. हवेली का दीपक जला कि नहीं.’ लड़के ने बाहर जाकर देखा, कहीं कोई दीपक जलता हुआ दिखाई न पड़ा. लड़का झुंझला पड़ाᅳ

‘किसलिए मां, तुम फटाफट दीये जलाओ….’ लड़का मचला.

‘पहले हवेली के दीपक जलेंगे, उसके बाद ही बाकी घरों में दीये जलाए जाएंगे.’ बुढि़या ने कहा तो लड़का पांव पटकता हुआ बाहर निकल गया. सहसा उसकी निगाह दूर हवेली पर टिमटिमाते दीपक पर पड़ी. इसके साथ ही गांव में एक-एक कर दीपक जलाए जाने लगे. लड़का गुस्सा भूल उछलता-कूदता भीतर आया,कृ‘दादी, दीये जला.’

बालक के दिमाग में अनेक सवाल थे. त्योहार खुशी-खुशी मना बुढि़या सोने चली तो लड़के ने उन सवालों की झड़ी लगा दीᅳ‘दादी घर में पर्याप्त तेल था, फिर भी तुमने मुझे हवेली क्यों भेजा था?’

‘यही परंपरा है बेटा. गांव में हर घर का पहला दीपक जमींदार के घर से आए तेल से जलता है.’

‘और तब जलता है जब जमींदार की हवेली जगमगाने लगती है, क्यों? क्या हम उसके गुलाम हैं?’

‘वे हमारे अन्नदाता हैं.’ बुढि़या ने पोते के होठों पर हाथ रख दिया.

‘हम अपनी मेहनत का खाते हैं. फिर वे हमारे अन्नदाता कैसे हुए?’

‘गांव की सारी जमीन, खेती-बाड़ी, पशु सब उन्हीं का है.’

‘कल से तुम उसके खेतों में काम करने मत जाना. मैं शहर जाकर काम करने लगूंगा.’ बुढि़या को उत्तर न सूझा. वह समझाने का प्रयास करती रही. लड़का आगे तक की सोच रहा थाᅳ

‘दादी, दिवाली कब है?’

‘बीस दिन बाद.’

‘तुम हवेली से तेल लाने को फिर भेजोगी?’

‘तू मत जाना, मैं खुद चली जाऊंगी.’

‘जो मेहनत करता है, उजाले अपनी जेब में रखता है.’ लड़के के दिमाग में बिजली की तरह कौंधा. उसने ठान लिया कि चाहे जो हो, वह तेल लेने हवेली पर नहीं जाएगा. दादी से कहेगा कि सारे दीपक घर के तेल से जलाएं. अगले दिन वह सवेरे उठा. दादी से कुछ कहे बिना तेली के यहां जा पहुंचा. तेली उस समय कोल्हू चला रहा था. लड़का उसे देखने लगाᅳ

‘दादा, मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूं?’ थोड़ी देर देखने के बाद लड़के ने पूछा.

‘मदद की तो मुझे खास जरूरत है.’ तेली बोला, ‘दीवाली का समय है. तेल की चारों तरफ मांग है. इसलिए दिन-रात काम करना पड़ रहा है.’

‘मैं दिन-भर खाली रहता हूं. कहें तो आ जाया करूं?’ लड़के ने बैल हांकने की संटी तेली के हाथ से लेते हुए कहा.

‘नौकर गांव गया है. दो-चार दिन भी मदद कर दो तो काम सध जाएगा.’ तेली ने खुश होकर कहा. लड़का नौकर के लौटने तक तेली के घर काम करने आता रहा. आखिरी दिन वह वापस लौटने लगा तो तेली ने एक पीपा तेल उसे थमा दिया. लड़का खुश होकर घर पहुंचा और तेल से भरा पीपा मां को थमा दिया. मां के पूछने के पर उसने सारा किस्सा बयान कर दिया. बुढि़या ने उसे गले से लगा लिया.

अगले दिन वह कुम्हार के घर पहुंचा. वह मिट्टी के बर्तन बना रहा था. सामने चाक तेजी से घूम रहा था. कुम्हार की नजर चाक के साथ घूम रही मिट्टी पर थी. उसके हाथ बड़ी कुशलता से कच्ची मिट्टी को गढ़ने में लगे थे. लड़का सम्मोहित-सा उसके हाथों का कौशल देखता रहा. कुम्हार के परिवार वाले, जिनमें छोटे-छोटे बच्चे भी थे, तैयार दीपकों को सुखाने में लगे थे. उसकी पत्नी मिट्टी तैयार कर रही थी. कुम्हार बीच-बीच में उन्हें कुछ समझाता और फिर काम में जुट जाता थाᅳ

‘बहुत काम है दादा?’ लड़के ने पूछा.

‘बेटा, यह काम ही ऐसा है. कुछ दिन काम ही काम, फिर साल-भर तक कोई नहीं पूछता.’ लड़का बिना कुछ कहे कुम्हार के परिवार के साथ लग गया. शाम तक उसने कच्चे बर्तनों को सुखाने में उनकी मदद की. उन्हें आंवा तक ले गया. कुछ देर बर्तनों को रंगने में मदद की. लौटते समय कुम्हार ने ढेर सारे दीपक उसे थमा दिए. घर पहुंचा तो बुढि़या उन्हें देखकर चौंक पड़ी.

‘इस दीवाली हमारी झोंपड़ी भी हवेली की तरह जगमगाएगी.’ लड़के ने कहा तो बुढि़या खुशी और आशंकाओं में डूबकर उसे देखने लगी. अगले दिन लड़का धुनिया के पास गया. वह रुई धुनने में लगा था. लड़के ने उससे बात करने की कोशिश कीᅳ

‘दादा एक बात बताओगे?’

‘क्या?’ धुनिया ने बिना हाथ रोके पूछा.

‘इस गांव में एक तेली हैं. वे रोज इतना तेल पेर लेते हैं कि गांव वाले खा नहीं पाते. कुम्हार इतने बर्तन बना देते हैं कि आसपास के गांव वाले भी बरतते हैं. और आप….’

‘किसी से कम नहीं हूं बेटा….आसपास के दस-बारह गांवों का काम साधता हूं.’ धुनिया ने जोश में कहा.

‘मेरी दादी बूढ़ी हैं….ज्यादा काम नहीं कर पातीं. वह भी रोज इतना कमा लाती हैं कि हम दोनों मजे से खा सकें.’

‘यह तो अच्छी बात है.’

‘वही तो, तुम सब अपनी जरूरत से ज्यादा कमा लेते हो. फिर जमींदार को अपना अन्नदाता क्यों मानते हो?’ धुनिया हैरानी से लड़के की ओर देखने लगा. कुछ देर बाद वह फिर अपने काम में लग गया.

‘आपने जवाब नहीं दिया….?’ लड़के ने पूछा.

‘माफ करना, सर्दियां सिर पर हैं. मैं बातचीत में समय नहीं गंवा सकता.’ धुनिया लड़के की ओर से मुंह फेर जल्दी-जल्दी हाथ चलाने लगा. लड़का कुछ देर मौन खड़ा रहा. सहसा उसकी निगाह इधर-उधर बिखरी रुई पर पड़ी. वह आगे बढ़कर उसे समेटने लगा. बड़े जतन से उसने इधर-उधर उड़कर पहुंचे फाहों को एक जगह जमा किया. उसके बाद इधर-उधर बिखरे कपड़ों को तह करके कोने में लगा दिया. काम पूरा हुआ तो धुनिया बहुत खुश था.

‘शाबास! तुम बहुत मेहनती और समझदार हो.’ धुनिया ने कहा.

‘आपने मेरे सवाल का उत्तर तो दिया नहीं था?’ लड़के ने टोका. धुनिया गंभीर हो गयाᅳ

‘बेटा, तुम्हारे प्रश्न का उत्तर गांव में किसी एक के पास नहीं है. सभी को मिलकर खोजना होगा. जिस दिन खोज लेंगे, उस दिन चमत्कार होगा. दीवाली के दीयों से एकदम सच्ची रोशनी निकलेगी.’ कहते हुए धुनिया भीतर गया. बाहर निकला तो हाथ में झक सफेद, मुलायम, रेशम-सी चमकीली रुई थीᅳ

‘जमींदार के घर इसी रुई की बत्तियां बनती हैं. तुम रखो, दीवाली पर काम आएगी.’ लड़के ने खुश होकर रुई ले ली.

दीवाली आई. पोते से कुछ कहे बिना बुढि़या बर्तन लेकर हवेली की ओर निकल गई. उसके लौटने से पहले ही लड़के ने सारे दीये आंगन में सजा दिए. उनमें कनस्तर से तेल डाला. बत्तियां वह एक दिन पहले ही बना चुका था. एक-एक कर सभी दीपकों में बत्ती डाली. पूरा आंगन दीपकों से भर गया. अंधेरा होने से पहले ही उसने सारे दीपक जला दिए.

            उस साल गांव वालों ने देखा, वहां एक के बजाय दो ठिकाने जगमगा रहे थे. पहली जमींदार की हवेली. दूसरी बुढि़या की झोपड़ी. अनेक दीपकों की रोशनी में बुढि़या की झोपड़ी गांव के कंदील की तरह रही थी. चारों ओर बुढि़या की झोपड़ी और उसके पोते के कौशल की चर्चा थी. जमींदार ने सुना तो जल-भुन गया. उसने अगले ही दिन बुढि़या और उसके पोते को बुलवा भेजा.

            ‘सुना है इस बार तुम्हारे घर बहुत धन आया है, जरूर चोरी की होगी?’ जमींदार बोला. बुढि़या ने सब सच-सच बता दिया.

            ‘गांव में सबको आमदनी के हिसाब से कर देना पड़ता है.’

            बुढि़या चौंकी. जमींदार के आगे गिड़गिड़ाई. पर वह माना नहीं. कर के ऐवज में बुढि़या और उसके पोते दोनों को दस दिनों तक हवेली में बेगार करनी पड़ी.

जमींदार सोचता था, बुढि़या और उसके बेटे को सबक मिला. आगे किसी की हिम्मत उसका आदेश टालने की न होगी. उधर बुढि़या और उसके बेटे से बेगार कराने की चर्चा पूरे गांव में होती रही. हर कोई जमींदार की आलोचना कर रहा था. लोगों की दबी इच्छा बाहर आ चुकी थी. वे चाहते थे कि आने वाली दीवाली पर उनका घर भी जगमगाए.

            ‘जमींदार का कोप देखा है. बुढि़या और उसके पोते को दस दिन तक बेगार में लगाए रखा था.’

            ‘बेगार तो हम करते ही रहते हैं. पर उजाले का त्योहार वर्ष में एक बार आता है.’ उस घटना के बाद सबके दिमाग में यह बात बैठ गई कि आजादी के लिए कुछ दिन की बेगार करने में भी बुराई नहीं है. गांव में फैल रही सुगबुगाहट से जमींदार अनजान न था. धीरे-धीरे समय बीता. माह-दर-माह चलकर त्योहारों का मौसम फिर लौट आया. जमींदार सावधान था. वह नहीं चाहता था कि गांव वाले उसकी इच्छा के बाहर कोई काम करें.

            उस वर्ष तेली के तेल, धुनिया की रुई और कुम्हार के बर्तनों की जबरदस्त बिक्री हुई. दशहरे के दिन से ही गांव वालों में अपने-अपने घर को सजाने की होड़-सी मच गई. जमींदार ने दीपक और तेल बंटवाने का अच्छा-खासा इंतजाम किया था, लेकिन एक भी आदमी हवेली पर तेल मांगने नहीं पहुंचा. न किसी ने हवेली के दीपक जलने का इंतजार किया. अंधेरा होने से पहले ही घरों में दीपक झिलमिलाने लगे. रोशनी पर हवेली के एकाधिकार को चुनौती मिली. गांव वालों को लगा, वे अपनी रोशनी से त्योहार मना रहे हैं. जमींदार तिलमिला गया. सबसे अधिक नाराज वह बुढि़या के पोते से था. इसलिए उसने लड़के को सबक सिखाने की ठान ली. अगले दिन जमींदार के आदेश पर उसके कुछ लोग गए. उन्होंने बुढि़या की झोपड़ी को तहस-नहस कर दिया. जिस-जिस ने बुढि़या के पोते का साथ दिया था, उन सबको काम देने से मना कर दिया. झोपड़ी उजाड़ दिए जाने पर भी लड़का घबराया नहीं. गांव से कुछ दूरी पर रेत का टीला था. वह अपनी दादी के साथ टीले पर चला गया. गांव वालों ने मदद की. दोनों झोपड़ी बनाकर वहीं रहने लगे.

दीवाली आते-आते गांव में सरगरमी बढ़ने लगी. लोग जमींदार से नाराज थे. दीवाली से चार दिन पहले हुई मुनादी ने उनकी बेचैनी को और अधिक बढ़ा दियाᅳ‘सभी ग्रामवासी ध्यान से सुनें. पुरोहित महाराज का कहना है कि जमींदार हमारे अन्नदाता हैं. पूरे गांव पर उनकी विशेष कृपा है. घर-घर में दीवाली मने, गांव खुशहाल हो. उसके लिए कल सुबह से ही दान आरंभ किया जाएगा. बच्चे-बूढ़े-जवान सभी हवेली पहुंचें.’

‘मुफ्त में मिली वस्तु की कीमत आत्मसम्मान के मोल चुकानी पड़ती है.’ मुनादी सुनकर लड़के के मुंह से निकला था. बात बाहर आने की देर थी. पलक झपकते वह गांव की सीमा पार कर गई. गांव वालों को लुभाने के लिए जमींदार खुद दान बांटने बैठा था. लेकिन इक्का-दुक्का को छोड़कर कोई घर से नहीं निकला. जो निकले वे भी मारे शर्म के बीच रास्ते से लौट आए.

वैभव-विलास को यदि कोई सराहने वाला न हो तो वह नकली लगने लगता है. जमींदार ने हवेली को जमकर सजाया था. फिर भी गांव में हवेली की जगह चर्चा बुढि़या की झोपड़ी की थी. पेड़ों और लताओं के झुरमुट में, दीपमालाओं से जगमगाती झोपड़ी दमकते सूरज जैसी लग रही थी. जमींदार देखकर जल-भुन गया. इस बार उसका गुस्सा पूरे गांव पर था. उसने अगले दिन से ही गांववालों के खेतों पर आने पर रोक लगा दी. गांव वाले दो-चार दिन परेशान दिखे. कुछ को लगा कि जमींदार को नाराज करके उन्होंने अच्छा नहीं किया. कुछ ने जमींदार को मनाने की कोशिश भी की. मगर जमींदार ऐंठ में था. कहने लगा, जब तक पूरा गांव माफी मांगने नहीं आता, वह पीछे हटने को तैयार नहीं है. मजबूर होकर लोग शहर की ओर निकलने लगे. एक बार शुरुआत की देर थी. फिर तो शहर जाकर काम करने वालों का तांता-सा लग गया. धीरे-धीरे उन्होंने शहर के आसपास जमीन देखकर बसना शुरू कर दिया. एक दिन अपनी दादी को लेकर लड़का भी गांव से कूंच कर गया.

            खेतों में काम करने के लिए जमींदार ने दूसरे गांवों से मजदूर बुलाए थे. मगर जैसा उसका स्वभाव था, बाहर के मजदूर काम पर कम ही टिकते. उससे फसलें मरने लगीं. हवेली की आमदनी का मुख्य जरिया खेती थी. वही घाटे का शिकार हुई तो जमींदार के परिवार में क्लेश बढ़ने लगा. उसके बड़े कुनबे में धीरे-धीरे फूट पड़ने लगी. क्लेश और तनाव के बीच एक दिन जमींदार चल बसा. उसके परिवार वाले भी जहां सिर समाए, वहां जाकर बसने लगे. बसे-बसाए गांव का एकाएक उजड़ जाना सामान्य बात नहीं थी. आसपास के गांवों में यह बात फैल गई कि वह जगह अशुभ है. लोग उधर आने से भी कतराने लगे. धीरे-धीरे पूरा गांव रेत के मैदान में बदल गया….

उस मैदान से चला तो भरी-पूरी कहानी मेरे साथ थी. कुछ दिन बाद वह एक पत्रिका में छपी. उसे पढ़कर अनेक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं. पाठकों ने उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की. लेकिन कहानी छपने के चार महीने बाद जो पत्र मिला, उसने मुझे चौंका दिया. पत्र में लिखा थाᅳ

‘अंकल! यह पत्र में अपने दादाजी के कहे अनुसार लिख रही हूं. वे सत्तर वर्ष के हैं और अकसर बीमार रहते हैं. ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं, पर विद्वान हैं. सूत्रों में बात करते हैं. आंखों से कम दिखता है, इसलिए स्वयं कुछ पढ़-लिख नहीं पाते हैं. मैं ही उन्हें पढ़कर सुनाती रहती हूं. एक दिन एक पत्रिका में छपी कहानी उन्हें सुनाई थी. उसे सुनकर वे परेशान हो उठे. उन्हें उतना बेचैन मैंने पहले कभी नहीं देखा था. कई दिन बाद उन्होंने बताया कि आपकी कहानी में जिस लड़के का जिक्र है, वे मेरे दादा जी ही हैं. नीचे मैं उनके मन की बात उन्हीं के शब्दों में लिख रही हूंᅳ

‘आपकी लेखनी को नमन. हवाओं से इतिहास निचोड़ लेने का हुनर आप जानते है. आपकी कहानी असल में मेरी कहानी है. जब से सुनी है, तभी से पश्चाताप की आग में जल रहा हूं. जमींदार को सबक सिखाने के चक्कर में मैं भूल गया था कि उस गांव और वहां की मिट्टी के प्रति भी मेरा कुछ कर्तव्य है. गांव छोड़ने के बाद हममें से किसी ने भी उस ओर झांकने की कोशिश नहीं की. सब शहर की भागम-भाग में खोकर रह गए. जिन लोगों ने मेरे साथ गांव छोड़ा था, उनमें से अधिकांश आज इस दुनिया में नहीं हैं. फिर भी बहुत लोग हैं जिनके मन में उस मिट्टी की महक आज भी ताजा है.’

‘अब पछताए का होत जब चिडि़या चुग गई खेत.’ मेरे मुंह से निकला. उस व्यक्ति का पत्र पढ़कर मुझे उसपर दया आनी चाहिए थी. लेकिन मेरे मन में उसके प्रति गुस्सा था. क्या गांव छोड़कर शहर में बसना ही एकमात्र विकल्प था! क्या अधिकारों की लड़ाई गांव में रहकर नहीं लड़ी जा सकती थी! उस लड़के ने जोश-जोश में पूरे गांव को उजाड़ने की भूमिका रची थीᅳ‘नाटकबाज!’ पत्र-लेखक के लिए मेरे मुंह से निकला. पत्र को डायरी के साथ नत्थी कर मैं उस घटना को भुलाने की कोशिश करने लगा. लेकिन घटना दिलो-दिमाग पर ऐसी अंकित थी कि उसको भुलाना आसान न था.

सितंबर का महीना था. हल्की ठंडक त्योहारों का प्रवेश द्वार होती है. उल्लास अपने आप उमगने लगता है. उस दिन आॅफिस से लौटा तो एक पत्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा. पते की लिखावट जानी-पहचानी लगी. दिमाग में एकाएक उस बच्ची का चित्र कौंध गया. उत्सुकता पर काबू रखते हुए पत्र खोला. इस बार अक्षर कुछ टेढ़े-मेढ़े थे. मानो कांपते हाथों ने लिखा हो. पत्र में जो लिखा था, वह किसी स्वप्न के एकाएक फलीभूत होने जैसा थाᅳ

‘कहानी के जरिये आपने जो मेरी जन्मभूमि की दुर्दशा का संदेश मुझ तक पहुंचाया था, उसके लिए धन्यबाद. साठ वर्ष पहले की उन घटनाओं के लिए मैं अभी तक खुद को नायक समझता आया था. जीवन के साठ वर्ष मैंने इसी एहसास के साथ गुजारे हैं. कहानी पढ़कर मुझे लगा कि उस कहानी का सबसे बड़ा खलनायक भी मैं ही था. जमींदार से टकराते समय मैंने अपनी मातृभूमि का ख्याल एकदम छोड़ दिया था. खैर, कहानी पढ़ने के बाद मैंने शहर में बसे अपने लोगों से संपर्क करना शुरू किया. उन्हें अपने गांव की याद दिलाई. वे आज भी मुझे नायक ही मानते हैं. लेकिन उस समय बिना सोचे-विचारे गांव को एकाएक छोड़ आने का मलाल सबके मन में आज भी है. इसलिए हमने फैसला किया है कि आने वाली दीपावली हम अपने गांव में मनाएंगे. आठ-दस परिवार गांव लौटने को तैयार हो गए हैं. मुझे उम्मीद है, बाकी लोग भी पीछे नहीं रहेंगे. आपने हमें भूल सुधारने का मौका दिया, जो प्रेरणा हम सबके मन में जगाई, उसके लिए हम आपके एहसानमंद हैं. यदि हो सके तो आनेवाली दीपावली के बाद हमारे गांव में दर्शन दीजिएगा. भरोसा रखिए, इस बार आप वहां रेत से नहीं, जिंदगी से रू-ब-रू होंगे.

पत्र को मैंने कई बार पढ़ा. मेरे लिए यह एक अद्भुत, अपूर्व स्वप्न के सच होने का एहसास था. उस रात सपने में देखाखंडहर के अगल-बगल बनी झौपडि़यों में दीपक झिलमिला रहे हैं. नन्हे-नन्हे बच्चे फुलझडि़यां और पटाखे छोड़ रहे हैं. स्त्रियां आंगन में अल्पना सजा रही हैं. मिठाइयां बांटी जा रही हैं. उनकी खुशी में शामिल होने के लिए आसमान के तारों में होड़-सी मची है. वे जमीन की ओर उतरते चले आ रहे हैं.

उस साल, जैसी उस गांव की दीवाली मनी, वैसी दीवाली गांव-गांव, घर-घर मने.

ओमप्रकाश कश्यप

नीलतारा —

नीलतारा


आजकल तो कहानी कहने-सुनने का रिवाज ही नहीं रहा. लेकिन यह कहानी उन दिनों की है, जब कथक्कड़ हर चौराहे और चौपाल पर मौजूद होते थे. घर में उसका काम दादा-दादी, नाना-नानी संभालते थे. उन दिनों, नया हो या पुराना, हर कथक्कड़ एक ही बात कहता थाᅳ‘कहानियों में कहानी नील तारे की. जिसने यह न सुनी, उसने क्या सुना!’ श्रोताओं में भी नील तारे की कहानी का प्रताप निराला था. जब भी कथक्क्ड़ कहानी शुरू करने को होता, चारों ओर से बस एक फरमाइश सुनाई पड़ती थीᅳ

‘नील तारे की कहानी हो जाए.’

‘कल ही तो सुनाई थी.’

‘एक बार और सही.’ नील तारे की कहानी सुनाने में कथक्क्ड़ को भी खूब मजा आता. इसलिए वह खुशी-खुशी तैयार हो जाता. चतुर कथक्कड़ कहानी को तरह-तरह के रंग भरकर, आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ इस तरह पेश करते कि वह हर बार नई-सी लगती. श्रोता मंत्र-मुग्ध हो जाते. कहानी का मुख्य पात्र थाᅳनील-तारा.

नीलतारा आसमान में दमकता तो उसकी नीली आभा सबका मन मोह लेती. टिमक-टिमक कर वह बच्चों को हर्षाता और देर तक अपने स्थान पर टिका रहता. सुबह आकर सूरज की किरणें जब खूब तन-मन सहलातीं, आराम करने की सलाह देतीं, तब जाकर आसमान छोड़ता. आसमान में बसने से वर्षों-वर्ष पहले वह धरती पर एक सरोवर का कमल हुआ करता था. कमल भी सबसे निराला….जो भी उसे देखता, बस देखता रह जाता था. सरोवर की सबसे खूबसूरत और चंचल तितलियां उस पर मंडरातीं. भंवरे हर फूल-पत्ती के आगे उसका गुणगान करते थे.

नील तारे को बच्चों से प्यार था. आसमान में टिमटिमाने के अलावा कोई दूसरा काम तो था नहीं. इसलिए अवसर मिलते ही वह धरती की ओर ताकने लगता. वन-उपवन में खिलनेवाले फूलों, पक्षियों, नदी-तालाबों और झरनों पर नजर रखता. पार्क में बच्चों को खेलते देख उनका भी रोम-रोम पुलकने लगता. उस समय उसे अपने पुराने दिन याद आ जाते. याद आता वह समय, जब वह सरोवर में बसा करता था. वे खुशियां जो उसने सरोवर के प्राणियों के साथ बांटी थीं. उन दिनों की शरारतों को याद कर वह खूब टिम-टिमाता. साथी तारों के साथ मस्ती करता. मन को उल्लास से भर देने वाली अनेक घटनाओं में से कुछ ऐसी भी थीं, जिनकी स्मृति मन को अवसाद से भर देती. जैसे कि यह घटना….

जब सरोवर में था तो सब उसे नील कमल कहा करते थे. सरोवर में और कमल भी थे. लेकिन नीलकमल के आगे उनकी आभा फीकी थी. सुबह की नीरवता में जल के ऊपर खिला हुआ वह ऐसे नजर आता, मानो एकांत सरोवर में चांदी की नन्ही डोंगी लहरा रही हो. उसकी सुंदरता और समझदारी के चर्चे दूर-दूर तक थे. इसके बावजूद उसे किसी तरह का गुमान नहीं था. उस बार लंबी बारिश हुई थी. सरोवर जल से आकंठ भरा था. मेडक, मछली, कछुआ और जल के दूसरे प्राणी बेहद प्रसन्न थे. मगर लगातार बारिश के कारण नील कमल सो नहीं पाया था. उसकी पंखुडि़यां अलसायी हुई थीं. सहसा एक तितली उसके पास आकर मंडराने लगी. उसके पंख सोने जैसे थे. बड़ा गुमान था उसे अपने पंखों पर. इठलाती हुई वह कभी इस फूल पर जाती, कभी उस फूल पर. कभी पंखुडि़यों पर झूलती, तो कभी पराग कण लेने के लिए उसके हृदय पर चोट करने लगती थी.

‘देखो, मैं कुछ देर आराम करना चाहता हूं. सरोवर में मुझसे सुंदर और भी कमल हैं. तुम उनके साथ खेल सकती हो.’ नील कमल ने उसे समझाने की कोशिश की थी. तितली सुनकर भुनभुनाने लगीᅳ

‘चुप, कीचड़ में रहकर मुझे टोकता है. जानता नहीं, मैं स्वर्ण तितली हूं. मेरा जो मन करेगा, करूंगी. जहां जी चाहेगा, वहां जाऊंगी.’

नील कमल मुस्करा कर रह गया. तितली से पुरानी पहचान थी. रोज का मिलना-जुलना. वह तुनक-मिजाज पर दिल की भली थी. साथ में बेहद खूबसूरत भी. धूप में उसके पंख ऐसे दमकते, मानो शुद्ध सोने के गुलाब की दो पंखुडि़यां हवा में लहरा रही हों. स्वर्ण तितली के अलावा सरोवर में रजत मछली की भी चर्चा थी. हर कोई उससे बात करने, अपने पास बुलाने को लालायित रहता था. स्वर्ण तितली और रजत मछली के बीच गहरी दोस्ती थी. स्वर्ण तितली फूलों पर मंडराती तो रजत मछली सरोवर के किनारे पानी में लेटे-लेटे उसकी उड़ान देखती रहती. कई बार खुश होकर हवा में छलांग भी लगा देती. मानो कहना चाहती हो, उड़ान मैं भी भर सकती हूं. जैसे ही रजत मछली हवा में उछाल भरती, उसके चांदी जैसे पंख झिलमिला उठते थे. उससे फूलों पर मंडरा रहे भंवरों की आंखें चौंधिया जातीं. सरोवर के जल में बने प्रतिबिंब से मोटे कछुए को चांद निकल आने का भ्रम हो आता. वह सोने के लिए तट की ओर निकल पड़ता था.

भरे-पूरे शांत सरोवर में हर तरह से खुशहाली थी. जंगल से आने-वाले जीव भी खुश रहते थे. लेकिन इधर कुछ दिनों से वे व्यग्र दिखाई पड़ने लगे थे. बात करते तो काना-फूसी के अंदाज में. मानो किसी अज्ञात से सभी को भय हो. किसी अनहोनी की चिंता उन सबको सता रही हो. कारण किसी से छिपा न था. पिछले कुछ महीनों से जंगल के प्राणियों की संख्या घट रही थी. सरोवर का अमृत समान शुद्ध जल, काला पड़ने लगा था. स्वस्थ प्राकृतिक जीवन जीनेवाले जीवों में तरह-तरह की बीमारियां पैदा होने लगी थीं. छोटे प्राणियों पर अलग से आफत थी. मछली, कछुए, मेडक जैसे प्राणी रोजाना दम तोड़ रहे थे. उससे पूरे जंगल में आपाधापी मची थी. जानवर सरोवर को छोड़ने को उद्यत थे.

एक दिन स्वर्ण तितली उसके पास पहुंची तो बहुत घबराई हुई थी. नीलकमल ने अपनी पंखुड़ी उसकी ओर तैरा दीᅳ‘गजब हो गया.’ वह बैठते ही बोलीᅳ‘मैं तो यहां हरगिज नहीं रहनेवाली. तुम भी इस सरोवर को छोड़कर कहीं दूर निकल जाओ.’

‘तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?’

‘उफ! क्या तुम्हें सचमुच कुछ नहीं मालूम….बेचारी रजत मछली!’

‘बात क्या है?’ सुनकर वह घबरा गया. इधर कई दिनों से रजत मछली को देखा तक न था. कहीं किसी मछुआरे के जाल में तो नहीं फंस गई. अथवा किसी मगरमच्छ या बड़ी मछली ने….’ उसके मन में डरावने विचार आने लगे.

‘बेचारी….सरोवर की सैर को निकली थी. घूमती-घूमती दूसरी दिशा में चली गई. तभी एक आदमी वहां पहुंचा. उसके हाथों में बड़ी-सी केन थी. देखते ही देखते उसने केन को सरोवर पर उलट किया. जैसे तेजाब की धार हो. पानी से बुलबुले उठने लगे. जीव-जंतु कुम्हलाने लगे. नन्ही-नन्ही मछलियां तो निष्प्राण होकर पानी पर तैरने लगीं. रजत मछली भी उसकी चपेट में आ गई. बेसुध होकर वह कई दिनों तक पानी पर तैरती रही. जब होश आया तो उसके चांदी जैसे पंख पुराने जंग खाए लोहे के समान काले पड़ चुके थे….सरोवर ही क्यों, आफत तो पूरे जंगल पर आई थी. सबकुछ जैसे तबाह होता जा रहा था.’ स्मृति-वेदना ने नीलतारे को घेर लिया था. कुछ देर के लिए वह टिमटिमाना भूल गया. उसे शांत देख पूरे आसमान में उदासी व्याप गई.

‘समय सबसे हुनरमंद हकीम होता है. उसकी दवा का असर धीमा पर स्थायी होता है’ᅳभारी-सी आवाज नील तारे के कानों में पड़ी. उसने पीछे देखा एक पुराना तारा था. आमतौर पर शांत रहनेवाला. बुढ़ापे के कारण उसकी चमक फीकी पड़ने लगी थी. वह हमेशा सोया हुआ नजर आता. इस कारण नील-तारा और उसके साथी उसे ‘ऊंघता हुआ तारा’ कहा करते थेᅳ

‘संकट के भय से प्राणी यदि सरोवर छोड़कर जा रहे थे, तो इसमें बुरा क्या है. जीवन की रक्षा करना तो प्राणिमात्र का धर्म है.’ ऊंघता हुआ तारा कह रहा था.

‘सरोवर कोई पराया नहीं था. उसी ने हमें यह जीवन दिया था. संकट में उसका साथ छोड़ देना तो घोर स्वार्थ होता.’ नील तारे ने प्रतिवाद किया.

‘जानता हूं, तुम उनसे अलग थे. इसीलिए यहां आसमान में सबसे ऊंचे स्थान पर हो.’

‘उस सरोवर के बारे में तुम और क्या जानते हो?’ नील तारे ने ऊंघते हुए तारे से सवाल किया.

‘सब कुछ जो शायद तुम भी नहीं जानते.’ ऊंघता हुआ तारा मुस्कराया. नीलतारा हैरानी से उसकी ओर देखने लगा. कुछ देर बाद ऊंघते हुए तारे ने कहना आरंभ कियाᅳ

‘आजकल तो नजर धुंधलाने गई है. उन दिनों यह बहुत तेज हुआ करती थी. धरती की सारी चीजें एकदम साफ नजर आती थीं. उस सरोवर की चर्चा यहां हम सितारों के बीच भी थी. दूसरों की तरह मैं भी उस सरोवर की ओर देखता रहता था.’ ऊंघते हुए तारे ने कहा तो नीलतारा उसी की ओर देखने लगा. बूढ़ा तारा अपनी यादों में डूबा हुआ था. कुछ देर बाद उसने बताना आरंभ कियाᅳ

‘बात बहुत पुरानी है. लेकिन कुछ बातें मानो कभी न भूलने वाली होती हैं. मुझे वह ऐसे याद हंै, मानो कल ही की बात हो. सरोवर इतना सुंदर था कि धरती पर उसके जोड़ का सरोवर शायद ही कोई और रहा हो. वह बारहों महीने आकंठ भर रहता. उसका जल स्फटिक-सा चमकीला और अमृत तुल्य मीठा था. हजारों कमल उसमें खिले रहते थे. उसकी शोभा के सामने नीलगगन की शोभा भी फीकी पड़ती थी. उसकी सुंदरता ही उसके संकट का कारण बनी थी.’

‘तुम ठीक कहते हो.’ नील तारे ने टोका.

ऊंघते हुए तारे ने कहना जारी रखा, ‘शुरुआत में भूला-भटका आदमी ही उस ओर आता था. धीरे-धीरे आनेवालों की संख्या बढ़ती गई. बड़ी-बड़ी गाडि़यां वहां से गुजरने लगीं. सरोवर की सुंदरता देख लोग कुछ देर के लिए वहां ठहरते. मौज-मस्ती करते. आदमी की खासियत यह कि वह अपने एक कंधे पर अच्छाई, दूसरे पर बुराई का पोटला लिए रहता है. हड़बड़ी में अच्छाई या बुराई के पोटलों में से कौन-सी चीज कब और कहां निकल जाए, वह चिंता नहीं करता.

‘तुम तो पहेली बुझाने लगे?’ नील तारे ने हंसकर कहा.

‘सीधी-सरल बात पसंद भी कौन करता है!’ ऊंघता हुआ तारा हंसकर बोलाᅳ‘सरोवर के दर्शन को आने वाले सैलानियों में बड़े-बड़े उद्योगपति, इंजीनियर और व्यापारी भी होते. पता चला कि उनमें से कुछ की योजना उस इलाके को पयर्टन केंद्र में बदल देने की थी. कुछ वहां कारखाने लगाना चाहते थे. धीरे-धीरे वहां आनेवाली गाडि़यों की संख्या में बढ़ने लगी. रवाना होते समय लोग-बाग खाली डिब्बे, प्लास्टिक, पन्नियां, पैट्रोल और डीजल की दुर्गंध तथा बचा हुआ भोजन वहां छोड़ जाते थे. उनके जाते ही भूखे-प्यासे जानवर वहां आते और वहां बिखरे भोजन को पोलीथिन और पैकिंग के साथ खा जाते थे. नतीजा यह हुआ कि जिस जंगल में स्वच्छ हवा बहती थी, नदियां निर्मल नीर बहाती थींᅳवहां गंदगी और महामारियां बढ़ने लगीं. जो गाय-भैंस पवित्र दूध से सबका भरण-पोषण करती थीं, वे बीमारी का शिकार होकर मरने लगीं. जिस जंगल में भरपूर खाद्य सामग्री हर समय मौजूद होती थी, उसमें जानवरों के आगे भुखमरी की नौबत आने लगी. वे क्षुब्ध होकर बस्ती पर हमला करने लगे. इससे आदमी का कुपित होना स्वाभाविक था. कुछ दिनों बाद वहां पक्की सड़क बनने लगी. उसे देखकर जंगल के प्राणी दो हिस्सों में बंट गए.

कुछ प्राणी आदमी के आने से खुश थे. जैसे कि कबूतर. सरोवर किनारे खड़े बांस के झुरमुट में रहनेवाले कबूतर का कहना था कि आदमी जगह का इस्तेमाल खेती के लिए करेगा तो उसे दाने-दाने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. बगुला को इसमें संदेह था. लेकिन अपने दोस्त कबूतर की खातिर वह उसके समर्थन में था. लेकिन कौआ जिसे जंगल का बुद्धिमान प्राणी माना जाता था, कबूतर से सहमत न थाᅳ

‘भोजन की कमी तो जंगल में अब भी नहीं है. धरती हम जैसे लाखों-करोड़ों प्राणियों का पेट भर सकती है. इसलिए हमें आदमी के यहां होने से कोई शिकायत नहीं है. धरती जितनी हमारी है, उतनी आदमी की भी है. लेकिन आदमी को भी समझना चाहिए कि धरती उसके अकेले की नहीं है. इसलिए उसे खेत मैदान अपने लिए रखकर जंगल हमें सौंप देने चाहिए….’ उसी पेड़ पर एक बाज भी बैठा था. कौआ की बात सुनकर उससे रहा न गया, बोलाᅳ

‘आदमी घमंडी है. वह हमारी बात समझना ही नहीं चाहता. आखिर कौन उसे समझाए कि जंगल की कुल आबादी कुछ ही महीनों में आधी हो चुकी है. नदियों और सरोवर के अमृत तुल्य जल में जहर घुलता जा रहा है. कुछ वनस्पतियों ने तो उगना ही छोड़ दिया है. यही सब चलता रहा तो कुछ वर्षों में यह सारा जंगल वीरान मरुस्थल में बदल जाएगा.’

आदमी द्वारा सरोवर सहित वन-प्रांतर को कब्जाया जाना प्रकृति को नहीं रुचा. उसका कोप भूकंप, महामारी के रूप में नजर आने लगा. उसके बाद तो आदमी और प्रकृति में मानो जंग-सी मच गई. अभिमानी मनुष्य कभी अपनी जरूरत, कभी सुरक्षा के नाम पर प्रकृति को उजाड़ने लगा. इससे वहां के प्राणियों का नाराज होना स्वाभाविक था. वे इकट्ठा होकर समस्या के हल पर बातचीत करने लगेᅳ

‘एक जमाना था जब जंगल की ओर पांव धरने की उसकी हिम्मत न पड़ती थी.’ लकड़बघ्घा ने कहाᅳ‘मैं बस्ती पर हमला करके किसी बच्चे उठा लाता था. तब तुम सब मुझे क्रूर और निर्दयी बताते थे. मगर मेरे ही कारण आदमी की इस जंगल की ओर पांव धरने की हिम्मत न पड़ती थी. मैंने बस्ती की ओर जाना क्या छोड़ा कि आदमी बौराने लगा.’ लक्कड़बघ्घा ने बताया.

‘अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है. हम एकजुट होकर बस्तियों पर हमला कर दें तो आदमी टिक नहीं पाएगा.’ हाथियों के मुखिया ने कहा.

‘उसके लिए हम ही काफी हैं.’ भेडि़या आगे आया. भेडि़या का ऐलान सुन लोमड़ी को भी जोश आ गया. वह आगे आते हुए बोली, ‘दोस्तो जंगल को बचाने के लिए आदमी को मिटाना यदि जरूरी है तो हमें देर नहीं करनी चाहिए. आज रात होते ही बस्ती पर हमला बोल देते हैं. सुबह तक सब हमारे अधीन होगा.’ लोमड़ी की बात सुनकर बाकी जानवर भी जोश में आए गए. वे आगे आकर चिंघाड़ने लगे. भेडि़या, शेर, चीता, गैंडा जैसे शक्तिशाली जानवर हमले की तैयारियों में जुट गए. इससे शांति प्रिय जानवरों में खलबली मच गई.

‘क्या हम आदमी को समझा नहीं सकते?’ एक हिरन ने आगे बढ़कर डरते-डरते कहा. शोर-शराबे और मारकाट की बात उसको कतई नापसंद थी.

‘भाइयो इसे तो सबके आगे गिड़गिड़ाकर जान की भीख मांगने की आदत है.’ गीदड़ ने हिरन पर कटाक्ष किया. इसपर वहां मौजूद जानवर हंसने लगे.

‘आदमी क्या इतना दयालु है कि हमारी फरियाद सुनकर इस जंगल से निगाहें हटा लेगा?’ लकड़बघ्घा ने हिरन को घूरा.

‘हमें मनुष्य को एहसास कराना चाहिए कि वन, वनस्पति और सरोवर की जरूरत उसको भी है .’ हिरन ने हिम्मत बटोरकर कहा.

‘आदमी घमंडी है. हमारी हरगिज नहीं सुनेगा?’

‘असंभव कुछ भी नहीं है?’ कौआ ने बीच में दखल देते हुए कहा. सब उसकी ओर देखने लगे.

‘कैसे?’

‘यदि हवा और धूप हमारा साथ दें तो आदमी को बिना कुछ नुकसान पहुंचाए भी सबक सिखाया है?’

हवा और धूप तो पहले से ही तैयार थीं. अगले दिन जैसे ही सूरज चढ़ा, तेज हवाएं बहने लगीं. जंगल काटने के लिए निकले आदमियों जो रसद-पानी साथ लाए थे, एक झटके में सब इधर से उधर हो गया. उसके बाद हवा ने अपने पंख सिमेट लिए. हवा थमने के साथ ही धूप अंगारे की तरह बरसने लगी. भूख-प्यास से व्याकुल लोग सरोवर की ओर भागे. भूख-प्यास से व्याकुल, पसीने से लथपथ लोग सीधे सरोवर में जा घुसे. अगले दिन भी वही हुआ. उस दिन सरोवर को बहुत कम नुकसान पहुंचाया गया था. कुछ लोग तो सरोवर को साफ रखने की कोशिश करते नजर आए. यह देखकर जंगल के प्राणियों में खुशी की लहर दौड़ गई.

धीरे-धीरे जंगल की ओर आदमियों का आना कम होने लगा. एक दिन कबूतर बस्ती से लौटा तो बहुत खुश था. उसने जंगलवासियों को खबर दी, जिसे सुनकर सब खुशी से उछल पड़ेᅳ

‘चिंता छोडि़ये, आदमी ने इस सरोवर और जंगल को काटने का इरादा बदल दिया है. अब इसे अभ्यारण्य के रूप में विकसित किया जाएगा.’ कबूतर की बात सुनकर सब खुशी से उछलने लगे. उसी समय हाथी का नन्हा बच्चा जोश से भरकर सरोवर में जा घुसा. खुशी से बौराए शिशु हाथी ने नीलकमल को तोड़कर आसमान की ओर उछाल किया.’ इतना कहने के बाद ऊंघता हुआ तारा चुप हो गया.

‘क्या वह मैं था….’ नीलकमल ने पूछा.

‘बिलकुल….मैंने तुम्हें लपक लिया था. तब से तुम यहीं हो. तुम्हारे चले आने से वहां के प्राणियों को दुख तो बहुत हुआ था. लेकिन सरोवर के बचने की खुशी में….’ ’

‘मैं तारा कैसे बना?’ नीलतारे ने पूछा.

‘तुम्हारी वह पहचान धरती पर रहने तक थी. यहां तुम सिर्फ एक तारे हो….हमारी तरह’ ऊंघते हुए तारे ने बताया.

‘और रजत मछली का क्या हुआ था?’

‘संकट टलते ही वह भी सरोवर में वापस लौट आई थी.’

‘उसके पंख….?’

‘पंख जाने के बाद भी रजत मछली खुश थी. सरोवर जो बचा लिया गया था.’

‘ऐसे किस्से तो और भी होंगे?’

‘हर तारे की कोई न कोई कहानी है. फिलहाल मुझे नींद आ रही है….’ कहकर ऊंघते हुए तारे ने आंखें बंद कर लीं. नीला तारा पुनः सरोवर की ओर निहारने लगा. सहसा एक मछली सरोवर में उछली….नीलतारा जोश में चिल्लायाᅳ‘रजत मछली!’

‘शी….यहां आसमान में शोर मचाना मना है.’ ऊंघते हुए तारे ने कहा और पुनः अपनी आंखें बंद कर लीं.

ओमप्रकाश कश्यप

बूढ़ा मसीहा — अगस्त 15, 2015

बूढ़ा मसीहा


सितंबर 23 2005. तियांझिन की सड़कों से जनाजा गुजर रहा था. परंपरा से हटकर उसमें सैकड़ों छोटे बच्चे थे. उनका पहनावा ऐसा था मानो कबाड़ बीनतेबीनते जनाजे में चले आए हों. उनके अलावा स्कूल के विद्यार्थी, जो खबर मिलते ही कक्षा छोड़कर अंतिम यात्रा में चले आए थे. साथ में जनाजे के पीछे चलते सैकड़ों स्त्रीपुरुष, बूढ़ेजवान. सबसे पीछे एक काफिला रिक्शाचालकों का भी था, जो धीरगंभीर, मौन कतार बांधे मंदमंद आगे बढ़ रहे थे. उन्हीं के बीच इक्कादुक्का भिखारी भी थे. सबकी आंखें नम थीं. इस विचित्र जनाजे को जो भी देखता, चौंक पड़ता. लेकिन जब मरने वाले के बारे में पता चलता, मन में हूकसी उठने लगती थी—

कमाल का इंसान था. हमेशा दूसरों के लिए जिया. जितना कमाया पाईपाई दान करता रहा.

सच्चा बोधिसत्व….75 साल तक रिक्शा खींचता रहा….अपना सुखदुख कभी नहीं देखा.

दूसरों की खातिर पैसा बचाने की धुन सवार थी. दसबारह मजदूरों के साथ एक गंदे कमरे में रहता. तंगहाल जीवन जीता. एक ही पेंट को थेगली लगाकर रातदिन लटकाए रखता था.

मरने वाले को लेकर वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई न कोई किस्सा था. एक अधेड़ स्त्री रोती हुई चल रही थी. दिवंगत की बेटी. जब तक वह जीवित था, वह उस पर पर खूब नाराज होती थी. एक बार उसने बूढ़े को कचरे के डिब्बे से डबलरोटी उठाकर खाते हुए देख लिया. तब वह उसपर खूब बिगड़ी. भलाबुरा भी कहा. बूढ़ा चुपचाप सुनता रहा. बेटी का गुस्सा शांत हुआ तब उसका कहना था. कहना भी क्या, एक तरह से उसकी बचत करने की युक्ति थी, ताकि अनाथालय को दान देने के लिए ज्यादा से ज्यादा धन जुटा सके—

कहा क्या था?

उसका कहना था, ‘लोग किसान के श्रम का मूल्य नहीं जानते. नहीं जानते कि फसल उगाने के लिए उसे कितनी मेहनत करनी पड़ती है. नासमझी में बचे हुए भोजन को कचरे के डिब्बे में फैंक आते हैं. जबकि उतने भोजन से न जाने कितने गरीबों का पेट भर सकता है. यह किसान के पसीने का अपमान है….’

बूढ़े के पैरों में आमतौर पर अलगअलग डिजायन के जूते होते थे. जगहजगह से फटे जिन्हें वह अपने अनगढ़ हाथों से सुधारता रहता था, ‘एक बार की बात. किसी ने उसे कबाड़ से जूते उठाते हुए देख लिया था. पूछने पर बोला—‘अलगअलग डिजायन के हैं तो क्या हुआ. असली बात तो पैरों की सुरक्षा से है. ऐसे लोगों को कौन समझाए कि देश के साथ गद्दारी का दूसरा नाम फिजूलखर्ची है.’

एक रिक्शाचालक बराबर में आ गया, बोला—‘उसने हमें सिखाया कि नेकी करने के लिए बड़ा पेशा नहीं, नेक इरादा चाहिए.’

90 वर्ष की उम्र तक वह लगातार रिक्शा चलाता रहा. पाईपाई दान करता रहा. इन वर्षों में उसने जितनी दूर तक रिक्शा चलाया, उससे वह पूरी धरती की अठारह परिक्रमा कर सकता था.

मित्रो! मेरा लेखकधर्म कहता है कि उस मामूली इंसान की इस गैर मामूली कहानी को आप सब के साथ साझा करूं. अपने आप में यह कहानी उतनी ही सच्ची है, जितनी आपकीमेरी हथेलियां, वह इबारत जो आप इस समय पढ़ रहे हैं और वह स्फुरण जो इस कहानी को पढ़तेपढ़ते आपकी देह में उतरने वाला है. यह कहानी उन लोगों के लिए है, जो मानते हैं कि अच्छाई दुनिया से उठ चुकी है; और अब जिधर देखो उधर बुराई की भरमार है. कहानी में बूढ़े बाय फेंग ली से मिलकर उनकी गलतफहमी शायद कुछ कम हो जाए. दस साल पहले, 94 वर्ष की अवस्था में हमसे विदा ले चुका है. आज केवल उसकी कहानियां हैं. तियांझिन में आप किसी के मुंह से सुन लीजिए. सब उसे अपनीअपनी तरह से याद करेंगे. यदि उनसे पूछा जाए कि फेंग ली क्या कोई देवता था? तो वे बिना झिझके जवाब देंगे—

हमें किसी देवता पर भरोसा नहीं….फेंग ली जैसे मनुष्यता की कसौटी पर खरे इंसान के रहते हमें देवताओं की जरूरत भी नहीं है.’ उन विद्यार्थियों के लिए जिन्हें उसने अपने बच्चों की तरह सीने से लगाया, 75 पार की उम्र में भी जिनके लिए निःस्वार्थ भाव से रिक्शा खींचता रहा, उनके लिए तो वही सच्चा देवता था. आज उनमें से अनेक घरगृहस्थी वाले बन चुके हैं. फेंग ली की कहानियां वे अब अपने बच्चों को सुनाते हैं.

ली ने लंबी उम्र का बड़ा हिस्सा रिक्शा खींचते हुए बिताया था. शहर का सबसे बूढ़ा रिक्शाचालक होने के कारण साथी उसे मजाक में ‘रिक्शाखोर’ कहते. उसके दुबले शरीर को देख कुछ सवारियां तो चुपचाप आगे बढ़ जाती थीं—

वह बूढ़ा अपना बोझ नहीं उठा पाता तो रिक्शा कैसे खींचेगा!’

भीड़ में गिरा दिया तो और मुश्किल.’ कहकर लोग हंसते. ली को उनसे कुछ मतलब न था. वह चुपचाप अपना काम करता. थक जाता तो रिक्शे को ही अपना बिस्तर बनाकर आराम फरमाने लगता. एकांत उसे नापसंद था. घर के नाम पर एक कमरा था. वहां वह बहुत कम जाता. भीड़भरी सड़कों पर रिक्शा खींचना उसे चुनौती मालूम होता. तंग गलियों में जहां दूसरे रिक्शाचालक जाने से कतराते, ली मजे से जाता और भीड़ के बीच से रिक्शे को कुशलतापूर्वक निकाल लाता था.

कोलाहल ही जीवन है.’ वह अकसर बड़बड़ाता.

अब तो गांव जाने वाले हो दद्दा. वहां मजे से बूढ़ी के हाथ की चाय पीते हुए ढेर सारी बातें किया करना.’ उसके साथी हंसकर कहते.

सबको एक न एक दिन रिटायर होना पड़ता है. आने वाली सर्दियों में मैं 75 का हो जाऊंगा. चाहता हूं कि अगला जन्मदिन गांव में अपने परिवार के बीच रहकर मनाऊं.’

जाना कब है?’

बहुत जल्दी….शायद इसी महीने.’ ली मुस्करा दिया.

गांव में बेटा गृहस्थी में हाथ बंटाने लगा था. इससे ली का हौसला बढ़ा था. परिवार की चिंता भी घटी थी. काम के वक्त दूसरे रिक्शाचालक सवारी पकड़ने के लिए मारामारी करते. उन्हें देख रिक्शे पर अधलेटा ली मन ही मन मुस्कराता. कभीकभी ऐसा भी होता कि दूसरे रिक्शाचालकों के वादविवाद से खिन्न होकर सवारी ली की ओर चली आती. मगर जब से ली ने गांव लौटने की ठानी थी, साथी रिक्शाचालकों ने उसके साथ स्पर्धा करना छोड़ दिया था. ली मौजूद हो तो पहले उसी को सवारी उठाने का अवसर मिलता. उस दिन भी यही हुआ था. सवारी आई तो रिक्शाचालकों ने ली की ओर इशारा कर दिया—

चलोगे?’

बैठिए….’ ली ने रिक्शा बढ़ा दिया. शहर का हर कोना, हर मोड़ यहां तक कि सड़क के हर गड्ढे से उसकी जानपहचान थी. उसके बीच से रिक्शा ऐसे निकाल ले जाता था कि राह चलते लोग हैरान रह जाते. कुछ लोग उसके बूढ़े शरीर की चुस्तीफुर्ती के लिए उसकी प्रशंसा करते. परंतु उस दिन कुछ अलग हुआ. ली को अचानक ब्रैक मारना पड़ा. सातआठ वर्ष का एक छोकरा भीड़ को चीरता हुआ झोंके की तरह सामने आया. ली रिक्शा रोके उससे पहले ही छलांग मारता हुआ दूसरी ओर निकल गया.

सड़कछाप’—ली बुदबुदाया. उसके मुंह से कई गालियां लड़के के मांबाप के लिए निकलीं. वह थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि एक मासूम आवाज ने उसे ब्रेक मारने को विवश कर दिया. वही लड़का बाजार में खरीदारी करने वाली स्त्री से बतिया रहा था—

मेम! क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूं?’

मुझे मदद नहीं चाहिए….हटो!’ औरत ने लगभग चीखते हुए जवाब दिया. उसके गुस्से की परवाह किए बिना लड़का दूसरी स्त्री के सामने पहुंच गया—

मेम, आपके पास सामान कुछ ज्यादा है? लाइये मैं आपकी मदद कर दूं?’

हरामखोर, राह चलते लोगों से पैसा ऐंठेंगे और नशाखोरी करेंगे.’ बड़बड़ाते हुए ली ने अपना वेग बढ़ा दिया. सवारी का गंतव्य आ चुका था. वापस लौटते समय फेंग ली की नजर फिर उस लड़के पर पड़ी. इस बार उसके हाथों और कंधों पर कई झोले टंगे थे. एक बूढ़ी महिला उसके साथ थी. बच्चे को काफी परेशानी हो रही थी. लेकिन उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था, आखों में चमक. तेज कदमों से महिला के आगेआगे चलता वह कार तक पहुंचा. महिला ने सामान रखकर पर्स से एक सिक्का निकालकर उसकी ओर बढ़ा दिया. लड़का दौड़ता हुआ फिर बाजार में जा धमका. फेंग ली उसे कौतूहल से देखता रहा.

सर, क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूं?’ इस बार लड़का एक पुरुष के सामने खड़ा था. पुरुष उसकी ओर ध्यान दिए बिना आगे बढ़ गया. लड़का बड़बड़ाया. मानो अपने आप पर झुंझला रहा हो. बाजार में रहते हुए वह इतना तो जान ही चुका था कि पुरुष जल्दीजल्दी बाजार आते हैं और चलतेफिरते खरीदारी कर फटाफट लौट जाते हैं. महिलाओं को गृहस्थी के लिए ज्यादा सामान चाहिए. इसीलिए उन्हें मदद की अधिक दरकार होती है. कुछ देर बाद लड़का फिर एक महिला की मदद कर रहा था.

इन लोगों के लिए भोलेभाले ग्राहकों से पैसे ऐंठना कितना आसान है!’ झुंझलाता हुआ ली अपने रिक्शे के साथ वहां से बढ़ जाना चाहता था. तभी उसने मासूम बच्चे को देखा. पांचछह वर्ष की उम्र, भीड़ में खुद को बचाता हुआ वह लड़के के पास पहुंचा और उसके सामने अपनी मुट्ठी खोल दी. उसकी हथेली पर दो यूआन थे.

मैंने छह कमाए हैं….तू इन्हें अपने पास रख. भूख लग रही है. चल खाना खा लेते हैं.’ लड़का खुश था. अपने नन्हे साथी की बांह पकड़कर वहां से चल दिया. फेंग ली का कौतूहल बढ़ चुका था. वह रिक्शा लेकर उनके पीछे चलने लगा. दोनों एक ढाबे पर रुके. ढाबे वाला शायद उनका परिचित था. उनके बैठते ही उसने खाना लगा दिया. दोनों एक ही थाली में खाने लगे.

मैंने व्यर्थ ही संदेह किया. भीख मांगने से अच्छा है, मेहनत करके अपना पेट भरना. परंतु इस उम्र में सबसे ज्यादा जरूरी है—पढ़ाईलिखाई….पर उसके मातापिता!’ उसी समय एक सवारी ने आवाज दी. अपने सवालों के साथ फेंग ली उसी दिशा में मुड़ गया.

समय अपनी बेकद्री की लंबी सजा देता है. चारपाई पर लेटेलेटे ली को अपना बचपन याद आ रहा था. पिता गरीब थे. वे ली को पढ़ाना चाहते थे. लेकिन वह खुद पढ़ाई से जी चुराता था. पिता की बात न मानने का दंड उसने पचास साल तक रिक्शा खींचते हुए भोगा था. क्या वे बच्चे भी इसी तरह सड़कों पर भटकते रहेंगे! कब तक लोगों की फटकार सहेंगे! अगर उनके मातापिता ने कोई अपराध किया है तो उसमें उन मासूमों का क्या दोष! ली सोचता रहा.

पूरी रात करवट बदलते हुए बीती. नींद आंखों से लुकाछिपी खेलती रही. अगली सुबह पूरी देह जकड़ी हुई थी. अनमने भाव से उसने रिक्शा निकाला. उस बाजार की ओर जाने की हिम्मत न पड़ी. इसलिए रिक्शा नई सड़क पर चढ़ा दिया. बीते दिन की घटनाएं अब भी उसका पीछा कर रही थीं. मन बेचैन था. एक सवारी मिली. उसको गंतव्य पर पहुंचाने के बाद अगली सवारी उठाने का उसका मन न हुआ. मन की आकुलता को दबाने के लिए वह निरुद्देश्य आगे बढ़ने लगा. मानो खुद को खुद से दूर ले जाना चाहता हो.

सहसा कुछ आवाजों ने उसका ध्यान भंग किया. लगा कि भयानक कुत्तों की आवाज थी. माजरा समझने के लिए ली ने अपना रिक्शा उसी दिशा में मोड़ दिया. पतली सड़क से गुजरते हुए वह अचानक चौंक पड़ा. चार खतरनाक कुत्ते एक सातआठ वर्ष के बच्चे को घेरे हुए थे. लड़का बचाव के लिए जैसेतैसे जूझ रहा था. ली रिक्शे को दौड़ाता हुआ आगे बढ़ा और कौशलपूर्वक बच्चे के बराबर पहुंच गया. घबराया हुआ बालक झट से रिक्शा पर चढ़ गया. कुत्तों को अब जाकर लगा कि दूसरा पक्ष भी मजबूत है. वे एकएक कर खिसकने लगे.

कहां रहते हो?’ ली ने पैडल मारते हुए पूछा.

उधर….’ लड़के ने इशारा किया.

मांबाप क्या करते हैं?’

कबाड़ी थे….कुछ दिन पहले न जाने कहां चले गए.’ लड़का उदास हो गया.

घर में और कौन है?’

दो छोटी बहनें….’

कोई बड़ा?’

मैं हूं न!’ लड़का तपाक से बोला. ली उसका आत्मविश्वास देखकर दंग रह गया. क्षणभर को यह भी लगा कि लड़का झूठ बोल रहा है. बीते दिन की घटना अभी तक उसके जहन में थी—

ठीक है, अभी पता लग जाएगा. मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देता हूं.’ कहते हुए उसने बस्ती की ओर रिक्शा बढ़ा दिया.

ली लड़के द्वारा बताए मार्ग पर रिक्शा आगे बढ़ाता रहा. पुरानी बस्ती की तंग गलियों से गुजरने हुए लड़के ने जहां रिक्शा रोकने को कहा, वह एक पुरानी, खंडहरनुमा इमारत थी, जिसका आधे से अधिक हिस्सा जमींदोज हो चुका था. फर्श पर मलबा जमा था. वर्षा का पानी भीतर आने से चारों ओर सीलन थी. दीवारों पर फफूंद, जमीन पर घासफूंस उग आए थे. लड़के के पीछेपीछे ली भी इमारत में प्रवेश कर गया. अचानक उसने जो देखा वह उसे स्तब्ध करने के लिए काफी था. उसकी आंखें फटी की फटीं रह गईं. बगैर छत के कमरे के एक कोने में कबाड़ का ढेर लगा था. उसके बराबर में कबाड़ से चुनी गई एक पन्नी पर चार और पांच वर्ष की दो बच्चियां दीवार से सटी, सहमी हुई बैठी थीं. उनकी आंखें उदास, चेहरे पीले जर्द, पथराए हुए थे.

लड़के ने आगे बढ़कर दोनों बहनों को बारीबारी से पुचकारा. इसपर वे अपने भाई की आंखों में देखने लगीं.

झिन! मेरी अच्छी बहन, आज तो सब कबाड़ा हो गया. कुछ कुत्ते मेरे पीछे पड़ गए. इन्होंने बड़ी मुश्किल से बचाया….’ लड़के ने ली की ओर इशारा किया. इसपर दोनों बच्चियां उसकी ओर देखने लगीं. सूनी आंखों के साथ. ली की समझ में न आया कि उन मासूमों से कैसे बात करे. मौन लड़के ने ही भंग किया—

मैं जानता हूं, तुम दोनों को भूख लगी होगी. जरा ठहरो, मैं कुछ इंतजाम करता हूं.’ लड़कियां भाई के साथ अपरिचित आदमी को देखकर सहमी हुई थीं. समझाने पर उन्हें कुछ तसल्ली हुई. दोनों वापस दीवार से सटकर बैठ गईं. ली अभी तक स्तब्ध था. उसका अपना जीवन आसान न था. मगर इस तरह का बेहाल जीवन वह पहली बार देख रहा था.

मैं अभी आया.’ लड़के बाहर जाने लगा.

क्या तुम यहां से चलना चाहोगे?’ ली ने टोका.

कहां?’

मेरे साथ, मेरे कमरे पर.’

मेरी बहनें भी साथ रहेंगी?’ लड़के ने प्रतिप्रश्न किया. उसे अपनी बहनों की चिंता खुद से ज्यादा थी.

क्यों नहीं….’

पहले मैं इनके भोजन का इंतजाम करता हूं.’

कोई जरूरत नहीं है. तुम इन्हें रिक्शा में बिठाओ. हम रास्ते में कुछ खरीद लेंगे.’ ली ने भरोसा दिखाया. लड़के ने मौनसहमति व्यक्त कर दी.

तीनों बच्चों को कमरे पर लाने के बाद ली ने उन्हें खाना खिलाया. उसके बाद उन्हें चारपाई पर लिटा दिया. खुद वह जमीन पर लेट गया. उसे तसल्ली थी. पिछले दिन का सारा मलाल धुल चुका था. लग रहा था कि उसने अच्छा काम किया है. बावजूद इसके उसका मन अभी अशांत था. बल्कि निरंतर उलझता ही जा रहा था. भावुकता में उठाए गए कदम के लिए वह खुद को बारबार दोषी मान रहा था. चिंता थी कि उसके गांव चले जाने के बाद उन बच्चों की देखभाल कौन करेगा! रिक्शाचालक मित्रों पर उसे पूरा भरोसा था. जानता था कि वह आग्रह करेगा तो कई रिक्शाचालक एकएक बच्चे को गोद लेने के लिए तैयार हो जाएंगे. किसी एक को तो वह अपने साथ गांव भी ले जा सकता था. मगर लड़का अपनी बहनों को खुद से अलग करने को कतई तैयार न होगा. एकदूसरे से बिछड़कर बच्चे भी खुश नहीं रह पाएंगे.

फिर?’ वह लगातार इस पहेली को सुलझाने में लगा रहा. सुबह होतेहोते वह फैसला कर चुका था. बच्चे अभी सोए हुए थे. ली रिक्शा लेकर बाजार को चल दिया. वहां से उसने नाश्ते की सामग्री और कुछ कपड़े खरीदे. लौटा तो बच्चे जाग चुके थे. ली ने उन्हें नाश्ता कराया. फिर स्नान कराकर तीनों को साफ कपड़े पहना दिए. उसके बाद उसने लड़के से कहा—

माफ करना मेरे दोस्त. मैं अकेला और बूढ़ा आदमी तुम तीनों की देखभाल नहीं कर सकता. लेकिन मैं तुम्हें ऐसी जगह पहुंचा सकता हूं, जहां तुम्हारे जैसे दूसरे बच्चे भी रहते हैं. वहां तुम्हें वहां किसी वस्तु की कमी महसूस न होगी.’

लड़का भावशून्य निगाहों से ली की ओर देखता रहा. बच्चियां चुप थीं. मानो सबकुछ सुनतीसमझती हों. उन्हें देख ली का दिल बैठने लगा. उसने परिस्थिति पर विचार किया. फिर रिक्शा निकाला और बच्चों को बिठाकर तियांझिन की सड़कों पर निकल पड़ा. काफी चक्कर काटने के बाद वह एक अनाथालय में पहुंचा. ली के मुंह से बच्चों की आपबीती सुनने के बाद अनाथालय का प्रबंधक बोला—

अच्छा किया, जो तुम इन्हें यहां ले आए. ऐसे मासूमों की देखभाल करने में ही हमारी खुशी है.’

बच्चों को अनाथालय छोड़ने के बाद ली को लगा कि उसने अपने जीवन का आखिरी दायित्व भी पूरा कर दिया है. अब उसे शांत, सुकूनभरी जिंदगी चाहिए. उसके लिए गांव सबसे उपयुक्त जगह है. दिन तो वह पहले ही तय था. गांव जाने से एक दिन पहले उसने अपना रिक्शा एक साथी को सौंप दिया था.

गांव में पहुंचकर वह बच्चों के साथ बतियाता रहा. बच्चे भी अपने पिता के साथ प्रसन्न थे. दिन परिजनों के साथ बातचीत और मिलनेमिलाने में कब पूरा हो गया, उसको पता ही नहीं चला. सोने चला तब भी उसका मन एकदम शांत था. अपने गांव, अपनी धरती पर अपनों के बीच वह गहरी नींद लेना चाहता था. लेकिन चारपाई पर पड़ते ही सबकुछ उलटपलट गया. नींद सुबह की ओस की तरह आंखों से गायब हो गई. दिमाग में फिर पुरानी यादें भिनभिनाने लगीं. तियांझिन का जीवन, साथी रिक्शाचालक. उनके बीच बिताए पचास से अधिक वर्षों की खट्टीमीठी घटनाएं. उन्हें याद करते हुए वह कभी मुस्कराता तो कभी उदासी उसे घेर लेती. सहसा ली को उन बच्चों का ख्याल आया जिन्हें वह अनाथालय छोड़कर आया था. उसके आते ही प्रबंधकों ने उन्हें निकाल न दिया हो! और वह लड़का जो बाजार में मिला था! क्या वह आज भी लोगों के आगे काम के लिए फरियाद करता होगा. उनके अलावा भी सड़कों और चौराहों पर गाड़ी साफ करते, ढाबे में बर्तन धोते, कबाड़ बीनते, सड़क पर ठेला चलाते, रेलवे स्टेशन के आसपास आवाराओं की तरह चक्कर काटते, नंगेअधनंगे बच्चे, जिन्हें उसने तियांझिन की सड़कों पर भटकते हुए देखा था, सब एकएक कर याद आने लगे—

उफ!’ याद करतेकरते ली का दिमाग भन्नाने लगा—‘अनाथालय का मैनेजर बातचीत के दौरान तो अच्छा आदमी लगा था. क्या दिल का भी उतना ही अच्छा होगा? कौन जाने….मुझे यहां नहीं आना चाहिए था.’

‘75 वर्ष की उम्र क्या कम होती है? फिर एक न एक दिन तो मुझे आना ही था!’ ली ने खुद को समझाने की कोशिश की. लेकिन बेकार. मन यहांवहां भटकता ही रहा. अगली सुबह वह ठोस इरादे के साथ जगा. उसने बच्चों को बुलाया—

बच्चो! पिछली रात जो मैंने तुम सबके साथ बिताई, मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत और यादगार रात थी. लेकिन कुछ काम ऐसे हैं, जिनके लिए मुझे फिर शहर लौटना पड़ेगा.’

अचानक कौनसा काम आ पड़ा?’

फिर कभी बताऊंगा….’ ली ने कहा. परिजनों के पास अनेक सवाल थे. मगर ली के पास उनके एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं था. अगले दिन वह शहर में साथी रिक्शाचालकों के बीच था. उसे वापस लौटा देख वे चौंके. कारण जानना चाहा. ली शांत रहा. उसी दिन ली ने अपने लिए नए रिक्शे का इंतजाम कर लिया. उसके तुरंत बाद वह अनाथालय पहुंचा. वहां उस लड़के तथा उसकी बहनों को खुश देखकर उसे संतोष हुआ. अब उसका काम था. दिनभर रिक्शा चलाना. शाम को उन बच्चों के लिए कुछ ले जाना. ली को इस काम में बेहद खुशी मिलती. पहले वह उन तीन बच्चों को देखने जाता था, धीरेधीरे उसमें दूसरे बच्चे भी शामिल होते गए. अब वह जितना कमाता, सप्ताह के अंत में सारा अनाथालय के प्रबंधकों को सौंप आता था.

गांव से लौटने के बाद वह एकदम बदल चुका था. पहले उसकी निगाहें केवल सवारी को खोजती थीं. आजकल वह सवारी के साथसाथ लावारिस दिखनेवाले बच्चों की तलाश में भी रहता. जैसे ही कोई लावारिस बालक दिखाई पड़ता. ली उसको अपने घर लाता. एकदो दिन अपने साथ रखता. फिर अनाथालय में छोड़ आता. अनाथालय के बच्चे उसको पहचानने लगे थे. वे उसे बूढ़ा मसीहा कहते. ली मुस्कराभर देता. अनाथालय में बच्चों को किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए उसने अपनी जरूरतें बहुत सीमित कर ली थीं. प्रायः वह कबाड़ से बीने हुए कपड़े पहनता था. पेट भरने के लिए सस्ते से सस्ता जो भी मिलता, खा लेता. प्रतिदिन कईकई घंटों तक काम करता. पाईपाई जोड़ता. सप्ताह होतेहोते जितना जमा होता, उसे दान दे आता था. अनाथालय के कर्मचारी ली की प्रशंसा करते. लेकिन ली द्वारा अपनी कमाई का अधिकांश दान कर देना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता था—

बाबा, आपकी आराम करने की उम्र है. अपने देश में दयालु लोगों की कमी नहीं है. उनकी ओर से हमें जरूरत लायक मिल ही जाता है. वैसे भी इस उम्र में रिक्शा खींचना आपके लिए अच्छा नहीं है.’

क्या आप लोग चाहते हैं कि मैं चारपाई पर पड़ापड़ा खांसता रहूं.’ ली बात को हंसी में टालने की कोशिश करता.

हमें सरकार पर भरोसा है. उसने जरूरत पड़ने पर हमेशा हमारी मदद की है.’

जरूरी नहीं कि सारी जिम्मेदारियां अकेले सरकार उठाए. प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह नेक कामों में सरकार की मदद करे.’ यह कहकर ली उन्हें निरुत्तर कर देता था. साथी रिक्शाचालक उसे सनकी कहने लगे थे. ली को किसी की भी परवाह नहीं थी.

समय बीत रहा था. जिन बच्चों को ली ने अनाथालय में प्रवेश दिया था, वे बड़े होतेहोते किशोर और जवान होने लगे. उनमें से कुछ समर्थ होकर चुनौतियों से जूझने के लिए खुद जीवनसमर में उतर चुके थे. उनकी जगह नए बच्चों ने ले ली थी. ली भी नब्बे को छू रहा था. कमर झुकने लगी थी. इतने बूढ़े व्यक्ति को तियांझिन की सड़कों पर रिक्शा चलाते जो भी देखता, हैरान रह जाता. जब पता चलता कि अपनी कमाई का एक पैसा भी अपने पास नहीं रखता, दान कर देता है. तब ली के प्रति उनका मन श्रद्धा से भर जाता. सड़क पर ली का रिक्शा देख लोग चर्चाएं करने लगते. कुछ ली के लिए रास्ता छोड़ किनारे हो जाते थे.

ली सोचता, एक दिन दुनिया में कोई बालक अनाथ नहीं रहेगा. कोई कबाड़ नहीं बीनेगा. किसी को भूख के लिए कचरे के डिब्बे में झांकने की जरूरत नहीं पड़ेगी. चाय के ढाबों पर काम करने वाले बच्चे स्कूल जाने लगेंगे. उस दिन की प्रतीक्षा में वह जीता था. लेकिन मंजिल लगातार दूर जाती हुई नजर आती. वह निराश होने लगता. उस दिन वह और अधिक मेहनत करता. दिन के अलावा रात को भी सवारी पकड़ लेता. लगातार मेहनत से उसकी कमर झुकने लगी थी. आंखों से कम नजर आता था. एक दिन की बात. वह दो बच्चों को अनाथालय छोड़ने जा रहा था. उनकी भिखारिन मां, बच्चों को साथ लेकर भीख मांगती थी. ली के काफी समझाने के बाद वह बच्चों को अनाथालय छोड़ने को तैयार हुई थी. शाम का समय था. सड़कें स्ट्रीट लाइट से जगमगाने लगी थीं. ली के लिए वह समय बहुत मुश्किल होता था. सामने से आती रोशनी सीधे आंखों में टकराती तो रास्ता पहचानना कठिन हो जाता. उस दिन भी वही हुआ. चौराहे को पार कर ली जैसे ही मुड़ा, सामने से आती गाड़ी की तेज रोशनी से रिक्शा भटक गया. वह सड़क के किनारे से टकराया. रिक्शा पलटतेपलटते बचा.

कांपते दिल से उसने उसने बच्चों को अनाथालय पहुंचा तो दिया. लेकिन बेचैनी नहीं गई. उम्र का लंबा हिस्सा उसने रिक्शा चलाते हुए बिताया था. ऐसी घबराहट पहले कभी नहीं हुई थी. वह रात जैसेतैसे बीती. सुबह हुई पर मन उदास था. वह धीरेधीरे चलता हुआ अलमारी तक पहुंचा. वहां से उसने वह डिब्बा निकाला. उसमें वह अपनी रोज की बचत को संभालकर रखता था. डिब्बे के साथ वह चुपचाप बाहर आया और रिक्शा लेकर अनाथालय की ओर बढ़ गया. कर्मचारियों ने ली को आते देखा तो वे बाहर निकल आए. अनाथालय का प्रबंधक खुद ली को सहारा देते हुए अपने आफिस में ले गया—

आज इतनी जल्दी? सब ठीक तो है न!’ कुर्सी पर बिठाने के बाद प्रबंधक ने पूछा.

उत्तर देने के बजाए, ली ने कंपकपाते हाथों से उसने डिब्बा खोला और मेज पर उलट दिया—‘समझ लीजिए कि यह मेरी आखिरी भेंट है. मैं आप लोगों का बहुत शुक्रगुजार हूं. आपने मुझे मेरी जिंदगी का मकसद दिया, जिससे मैं अपने देश के लिए कुछ कर सका. मेरा शरीर जवाब दे चुका है. आज के बाद मैं यहां न आ सकूंगा.’

ली के लाए यूआन गिने गए. पांच सौ से ज्यादा पाए गए. इससे पहले वह साढ़े तीन लाख से अधिक यूआन अनाथालय को दान कर चुका था. विदा की उस बेला में वहां मौजूद हर व्यक्ति भावविह्वल था. अंततः प्रबंधक आगे आया और ली का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला—

बाबा! हम अपनी इकलौती संतान का लालनपालन ढंग से कर लें तो मान लेते हैं कि एक गृहस्थ के रूप में हमने इस देश को पर्याप्त योगदान दिया है. आपने तो अकेले तीन सौ बच्चों की देखभाल करने, उन्हें पढ़ालिखाकर योग्य बनाने में हमारी मदद की है. आपकी बराबरी यहां कौन कर सकता है.’

काश मैं कुछ और कर पाता?’ बूढ़े ली के मुंह से पीड़ा भरी कराह निकली. उस समय तक ली के आने की खबर पूरे अनाथालय में फैल चुकी थी. बच्चे उससे मिलने को उत्सुक थे. ली को सहारे के साथ बरामदे तक लाया गया. मेज का सहारा लेते हुए उसने बच्चों को संबोधित किया—

बच्चो! भूल जाओ कि तुम अनाथ हो, गरीब हो. केवल पढ़नेलिखने पर ध्यान दो. मैं तो आगे नहीं आ पाऊंगा. लेकिन भरोसा रखो, पूरा देश तुम्हारे साथ खड़ा है….मैं हमेशा चाहूंगा कि हमारे बच्चे खूब मेहनत करें, पढ़लिखकर अच्छी नौकरी करें. अच्छे आदमी बनें और मिलजुलकर इस देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाएं.’

जो लोग मृत्यु से पहले ही किवदंतियों में समा जाते हैं. वे कभी मरते नहीं हैं. लोगों के सपनों, कल्पनाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों में घर बनाए रहते हैं. ऐसे लोगों की कहानियां भी कभी खत्म नहीं होतीं. वे बस अगली कड़ी का इंतजार कर रही हैं.

ओमप्रकाश कश्यप

विविध की डायरी — जून 13, 2015

विविध की डायरी


विविध के दादू को डायरी लिखने का शौक है. बोर्डिंग में जाने पर विविध को घर की याद आई तो उसने भी कलम उठा ली. ये पन्ने उसी की डायरी के हैं, जो उसने अपने दादू को संबोधित करते हुए लिखे हैं—

17 फरवरी 2015

आज बोर्डिंग का तीसरा दिन है. मैं दो दिनों तक लगातार सोचता रहा कि घर में कोई मुझे प्यार नहीं करता. बहुत शरारती हूं न! इसलिए मुझे घर से दूर कर दिया गया है. बीते दो दिन मैं लगातार अच्छा बालक बनने की कोशिश करता रहा. इन दो दिनों में मैंने कोई शरारत नहीं की. मुंह तक नहीं खोला. मुझे गुमसुम देख बच्चों ने मान लिया कि मैं बीमार हूं. वे मेरा हाल-चाल पूछने आए. जब उन्हें पता चला कि मुझे कुछ नहीं हुआ है, तो दब्बू कहकर मेरी हंसी उड़ाने लगे. मुझे उदास देखकर मैडम ने पूछा था—
‘घर की याद आ रही है विविध?’ मैं चुपचाप किताब में आंखें गढ़ाए रहा.
‘ऐसा सबके साथ होता है. धीरे-धीरे नए दोस्त बनते हैं. आदमी छूटे हुए को भूल जाता है.’ मैडम कहे जा रही थीं. वही गोल-मोल बातें. जैसी बड़े अकसर बच्चों के साथ करते हैं. मैं दादू के अलावा किसी और के साथ सहज हो ही नहीं पाता. मुझे आज भी याद है, जब मैं हा॓स्टल के लिए निकला था, तब दादू ने कहा था—‘दुनिया से जुड़ने के लिए खुद से जुड़ना बहुत जरूरी है.’
जब से आया हूं, यह बात मेरे दिमाग में लगातार चक्कर काट रही है.
‘मैडम, खुद से जुड़ना क्या होता है?’ मैंने पहली बार अपना मुंह खोला. मैडम चकित होकर मेरी ओर देखने लगीं. शायद ऐसे सवाल की उन्हें उम्मीद ही नहीं थी. कुछ देर बाद मेरे कंधों पर हाथ रख मुझे समझाते हुए बोलीं—
‘अपनी शक्तियों को समेटे रखना.’ फिर पहेली! मैं मैडम की ओर देखने लगा. बड़े लोगों को पहेली बूझने के लिए हम बच्चे ही क्यों मिलते हैं! दादू की पहेली क्या कम उलझन-भरी थी जो मैडम ने एक पहेली और दाग दी. मैंने देखा, मैडम मुस्करा रही थीं—
‘तुम समझदार हो. पर कुछ चीजें वक्त के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.’
ऊंह! यह क्या बात हुई. दादू होता तो कहता—‘समझा नहीं सकते तो बचाव का रास्ता ढूंढ लिया.’ पर मैं जानता हूं दादू ऐसा कभी नहीं कहते. उनके पास आने-जानेवालों का तांता लगा रहता है. उनमें कुछ विद्यार्थी भी होते हैं. दादू अपने पास आनेवाले वालों से अकसर कहा करते हैं—‘शब्दों से दोस्ती करो.’
उन लड़कों के पल्ले क्या पड़ता है, मुझे नहीं पता. परंतु शब्दों से दोस्ती की बात मैं समझ सकता हूं. दादू अस्सी बरस की अवस्था में रोज डायरी लिखते हैं. फुर्सत मिलते ही कुछ न कुछ पढ़ने लग जाते हैं. मेरे लिए यह पहेली अबूझ नहीं है. इसलिए घर छोड़ते समय मैंने सबसे पहला फैसला किया था—शब्दों से दोस्ती करने का.
घर से चलते समय दादू से नीली डायरी मांगकर लाया था. सोचा था उनकी तरह रोज कुछ न कुछ लिखूंगा. लेकिन पिछले दो दिन मन बेहद उदास रहा. शब्द जंगली हिरन की तरह पकड़ से दूर भागते रहे. आज मैंने ठान लिया था कि कुछ न कुछ लिखकर मानूंगा. कलम उठाई तो शब्द अपने आप उतरने लगे. तब पता चला कि शब्द दोस्ती के लिए हमसे भी ज्यादा उतावले होते हैं. मन से पुकारो तो कतार बांधे खुद-ब-खुद चले आते हैं. दादू ठीक कहते हैं—हर मंजा हुआ लेखक कमांडर की तरह होता है, शब्द उसके अनुशासित सेनानी.
अरे वाह! आज तो मैं भी पहेलीनुमा बातें करने लगा. दादू का कुछ असर तो पड़ना ही है. डेढ़ घंटा लिखने में कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला. अब सोता हूं. मैडम बता रही थीं, कल प्रधानमंत्री जी संबोधित करने वाले हैं. देश का प्रधानमंत्री हम बच्चों से संवाद करे, मुझे तो यह सोचकर ही सिहरन होती है.
पता नहीं वे सिर्फ अपने मन की कहेंगे या हमारे मन की बात भी सुनेंगे.

18 फरवरी 2015

स्कूल में सुबह से ही हलचल थी. खुले मैदान में पंडाल लगाया गया था. सामने बड़ा टेलीविजन स्क्रीन था, जिसपर प्रधानमंत्री जी संबोधित करनेवाले थे. पिछले स्कूल में हर पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को जलसा होता था. बड़े-बड़े लोग आते. बच्चों को फलाहार भी मिलता. ‘क्या आज भी फलाहार बंटेगा?’ हर बच्चे के मन में यही ख्याल था. एक लड़का स्कूल के कमरों में बार-बार चक्कर लगा रहा था. एक-एक कर वह सारे कमरों में घूम चुका था.
‘अंबेश, क्या है, क्यों चक्कर काट रहे हो? जाकर अपनी क्लास के साथ बैठो.’ एक मैडम ने उसे डांटा. लेकिन अंबेश की आंखें अब भी इधर-उधर कुछ खोज रही थीं—
‘मैडम भूख लगी है.’ अंबेश ने मासूमियत से बताया.
‘सुबह तुम्हारी मम्मी ने नाश्ता नहीं कराया था?’
‘मैंने मना कर दिया था.’
‘क्यों मना कर दिया था?’
‘प्रधानमंत्री जी के टेलीविजन पर आने की खुशी में लड्डू बटेंगे….’
‘ठीक है, पर नाश्ता क्यों नहीं किया था?’
‘पिछली बार दो लड्डू मिले थे. पेट भरा होने के कारण मैं बस एक खा पाया था.’ बच्चे की मासूमियत देख मैडम हंसी. आसपास मौजूद बच्चे भी अपनी हंसी न रोक सके.
प्रधानमंत्री जी समय पर बोले. अच्छी-अच्छी बातें बर्ताइं. मामूली लगनेवाली सफाई जैसी बातें भी. घर में दादू भी सफाई पर जोर देते थे. पर मैं लापरवाही कर जाता था. आज पता चला कि मामूली लगनेवाली हर बात मामूली नहीं होती. गांधी जी छोटी-छोटी बातों पर अमल करके ही बड़े आदमी बने थे. आइंस्टाइन के चाचा ने यूक्लिड की ज्यामिती की छोटी-सी पुस्तक भेंट में दी थी. यदि आंइस्टाइन उस पुस्तक को पुरानी और मामूली समझकर एक ओर रख देते तो क्या इतने बड़े वैज्ञानिक बन पाते!
प्रधानमंत्री जी का संदेश पूरा होते ही हमसे मैदान में चलने को कहा गया. चार टुकड़ों में बांटकर हमें मैदान की सफाई का काम सौंपा गया. प्रधानमंत्री जी के संदेश का असर. हम सभी उत्साहित थे. चार मैडम बच्चों को निर्देश दे रही थीं—
‘विविध वो कागज उठाकर डस्टबिन में डालो.’ एक मैडम ने मुझसे कहा तो मैं दौड़ पड़ा. जैसे पंख लगे हों. हम बच्चों के लिए यह एक खेल था. परंतु मैडम का खड़े-खडे़ आदेश देना मुझे अच्छा नहीं लगा. मैदान बड़ा था. थोड़ी ही देर में उस खेल से उकताहट होने लगी. दूसरे बच्चे भी थकावट महसूस करने लगे. चारों मैडम जैसे एक ही दिन में पूरे मैदान की सफाई का संकल्प ले चुकी थीं. क्या प्रधानमंत्री जी का संदेश केवल हम बच्चों के लिए था? क्या वे हमें निरा बच्चा समझते हैं. मैं सोच ही रहा था कि एक ओर से रोने की आवाज सुनाई दी. सभी उस ओर दौड़ पड़े. पता चला कि एक मैडम ने छोटे बच्चे को ईंट उठाकर एक ओर रखने को कहा था. बच्चा ईंट संभाल न पाया और गिर गया. घुटने छिलने से वह रोये जा रहा था. बालक की मरहम-पट्टी की गई. उसके बाद हमारा मन उस काम से ऊब गया. प्रधानमंत्री जी की कही अच्छी-अच्छी बातें हवा हो गईं.
अच्छा हुआ, सफाई का काम भी रोक दिया गया.

21 फरवरी 2015

बीते दिन एक भी क्लास नहीं लगी थी. मुझे वह दिन बहुत अच्छा लगता है, जब स्कूल हो पर पढ़ाई बिलकुल न हो. उस दिन लगता है कि स्कूल हम बच्चों के हिसाब से चल रहा है. बाकी दिनों में तो हम बच्चों को ही स्कूल के हिसाब से चलना पड़ता है.
बच्चे को चोट लगने की घटना का असर हम सबके मन पर था. मैडम उसी की चर्चा कर रही थीं. कक्षा खाली थी. बच्चों को मौका मिला. वे उछल-कूद मचाने लगे. किसी एक ने कागज उछाला तो देखा-देखी दूसरे बच्चे भी शुरू हो गए. उसके बाद तो मानो होड़-सी मच गई. फर्श पर कागज ही कागज नजर आने लगे. एक दिन पहले प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया संदेश मानो बेअसर हो गया. शोर-शराबा सुनकर मैडम आईं. बच्चों को डांटकर उन्होंने पढ़ाना शुरू कर दिया. कक्षा में गंदगी देख मुझे बहुत बुरा लग रहा था. अच्छा होता मैडम जी डांटने के बजाय हम सबसे सफाई करने को कहतीं.
तभी आहट सुनाई पड़ी. दरवाजे पर प्रिंसीपल मैडम थीं. बच्चे उन्हें देखकर खड़े हो गए. हम सब डरे हुए थे कि कक्षा में गंदगी देख प्रिंसीपल मैडम अवश्य डांटेंगीं. डर से हमारे दिल जोर से धड़क रहे थे. प्रिंसीपल मैडम ने कक्षा में एक नजर दौड़ाई, फिर किसी से कुछ भी कहे बगैर फर्श पर बिखरे कागजों को उठाने लगीं. हम सब स्तब्ध—
‘अरे….रे मैडम, आप छोड़िए, मैं कराती हूं.’ मैडम ने आगे बढ़कर उन्हें रोकने की कोशिश की. प्रिंसीपल मैडम चुपचाप काम में लगी रहीं. यह देखते ही बच्चे अपनी-अपनी सीट छोड़ कागज बीनने में लग गए. कुछ ही क्षणों में कमरा साफ हो गया. प्रिंसीपल मैडम बिना एक भी शब्द कहे चुपचाप चली गईं. उनकी चुप्पी हम सब पर भारी थी. सभी अपराधबोध से ग्रस्त थे.
‘मौन शब्दों से ज्यादा शक्तिशाली होता है.’ दादा जी अकसर कहा करते थे. उसका मतलब आज समझ में आया.
मैडम ठीक ही कहती थीं. कुछ बातें समय के साथ धीरे-धीरे समझ में आती हैं.

फरवरी 22 2015

कल की घटना का बहुत गहरा असर पड़ा है. बच्चों ने कागज के कनकौए उड़ाना छोड़ दिया है. कक्षा में, खेल के मैदान पर या रास्ते में, बच्चों को कहीं भी गंदगी दिखती है, तो उसे चुपचाप उठाकर डस्टबिन के हवाले कर देते हैं. कक्षा में सभी शांत रहते. मानो जा चुके हांे कि शोर अपने आप में गंदगी है. लंच करने से पहले सब एक-एक कर हाथ धोते है. छोटी-छोटी बातें बड़ा सुख दे जाती हैं. मेरा मन स्कूल में लगने लगा है. कुछ लड़के दोस्त बने हैं. उन्हीं में एक लड़का है वेदांत. उसके घर में एक दादी है. जब मैं उससे अपने दादू की बातें करता हूं, वह अपनी दादी की बातें सुनाने लगता है. इससे एक बात तो समझ में आती है. परिवार में दादा-दादी, नाना-नानी का होना बेहद जरूरी है. वे न हों तो घर कितना बोझिल हो जाए.
पढ़ाई शुरू हो चुकी है. होमवर्क काफी था. काफी समय उसे निपटाने में ही निकल गया. सोता हूं.

फरवरी 27 2015

कई दिनों से डायरी लिखने का काम छूटा रहा. आज कक्षा में मैडम ने बताया था कि दस दिन बाद स्कूल का सालाना उत्सव शुरू होगा. उसके लिए नाटक तैयार करने का काम उन्हीं को सौंपा गया है. अपनी नई जिम्मेदारी पर वे बहुत उत्साहित थीं. इसलिए कक्षा में आने के साथ ही उन्होंने कहा था—
‘‘दो नाटकों में से पहला नाटक राजा और उसके वजीर की कहानी है. दूसरे में एक नेता और जनता होगी.’ यह सुनकर हम बच्चों ने ताली बजाकर अपनी खुशी प्रकट की थी.
‘विविध तुमसे इस नाटक में हिस्सा लेने को कहा जाए तो क्या बनना चाहोगे, राजा या वजीर?’ मैडम ने मुझसे पूछा. मैं ऐसे सवाल के लिए तैयार न था.
‘कुछ भी नहीं मैडम?’ थोडी देर बाद मैंने उत्तर दिया.
‘क्या तुम्हें नाटक में हिस्सा लेना अच्छा नहीं लगता?’
‘मुझे राजा या उसका वजीर बनना अच्छा नहीं लगता.’
‘क्यों?’
‘राजा और वजीर तो बीते जमाने की बातें हैं’ मैंने उत्तर दिया था. उस समय मेरे दिमाग में गांव की एक घटना चक्कर काट रही थी. दादू के पास गांव के कुछ लोग आए थे. दशहरे के अवसर पर नाटक मंडली को बुलाने की बात थी.
‘इस बार गांव वाले राजा नल का नाटक देखना चाहते हैं.’ लोगों के साथ आए ग्राम प्रधान ने कहा था. इस पर दादू का उत्तर था—
‘राजा-महाराजाओं का जमाना तो कभी का लद चुका है प्रधान जी.’
‘फिर?’
‘मेरा बस चले तो मैं ऐसी नाटक मंडली को गांव में बुलाऊं जो सुभाष चंद बोस या महात्मा गांधी पर नाटक खेले.’
‘विविध, क्या तुम दूसरे नाटक मैं नेता का पाठ करना चाहोगे?’ मुझे चुप देख मैडम ने पूछा था.
‘नहीं, जनता का?’
‘तुम तो नेता का पाठ आसानी से कर सकते हो?’ मैडम ने मुझे समझाने की कोशिश की थी.
‘दादू बताते हैं, हमारे देश में जनता ही नेता को चुनती है. नेता गलती करे तो उसको उतार फैंकती है. इसलिए मैं जनता बनना चाहूंगा…..समझदार जनता.’
‘सही कह रहा है मैडम.’ कक्षा में किसी ने पीछे से कहा था—‘जनता भी तो सफाई करती है….गंदे नेताओं की सफाई.’
मुझे लगा कि हमारी बातें सुनकर मैडम भी खुश हैं. शाम को उन्होंने बताया था कि ‘राजा और वजीर’ नाटक का विचार त्याग दिया गया है. उसके स्थान पर अब महात्मा गांधी के दांडी मार्च पर आधारित नाटक खेला जाएगा. डांडी मार्च की कहानी मैं दादू के मुंह से सुन चुका था. उसके बाद मैडम ने मेरी ओर देखते हुए कहा था—‘जानते हो विविध नाटक को बदलने का फैसला तुमसे बातचीत के बाद लिया गया है और मीटिंग के दौरान प्रिंसीपल मैडम ने कहा था—
‘‘लोकतंत्र में जनता भी सफाई करती है….देश की सफाई. यदि देश स्वस्थ रहेगा तो नागरिक अपने आप स्वस्थ्य होते चले जाएंगे.’’

ओमप्रकाश कश्यप

लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर — मार्च 22, 2015

लखनऊ : तहजीब-पसंदों का जिंदादिल शहर


यात्रा संस्मरण

दिल्ली-लखनऊ राजधानी का सफर. गाड़ी अपनी तेजी से भाग रही है. रात्रि-भर का सफर पूरा कर पड़ाव पर पहुंचने को उत्सुक. करीब डेढ़ घंटे बाद अपने गंतव्य पर होगी. करीब सवा सौ किलोमीटर का सफर बाकी. अंधियारा छंटने के साथ साथ ही हरियाले खेत और पेड़-पौधे नजर आने लगे हैं. सभी तेजी से पीछे की ओर भागते; या भागने का एहसास कराते हुए. धरती का हरियालापन ही वह गुण है जिससे यह देश दुनिया-भर में जाना जाता है. इससे आकर्षित होकर न जाने कितने हमलावर इस धरा की ओर आकर्पित हुए और जाति-धर्म के आधार पर बुरी तरह बंटे, अलसाए यहां के बाशिंदों को रौंदकर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. आए लूटने के लिए थे लेकिन यहां कि उर्वरा धरती, हरी-भरी वादियां, नदियांे और तालाबों से अभिसिंचित धरा उन्हें इतनी पसंद आई कि यहीं के होकर रह गए. आर्यों से लेकर अंग्रेजों तक—यह देश सबका बना. यह भारत में नहीं दुनिया-भर के अनेक देशों में हुआ. जिन देशों की धरती उर्वरा थी, मगर नागरिक अनपढ़ या बंटे हुए, वहां यह लगभग स्थायी रूप में शताब्दियों तक कायम रहा. धरती का उर्वरा-सामर्थ्य और खनिज संपदा भी औपनिवेशीकरण का कारण बन सकती है, यह यूरोपीय देशों में औद्योगिकीकरण की सफलता के बाद पूरी दुनिया ने देखा. फिर भी अनेक देश खुद को पराधीनता से जल्दी ही मुक्त कराने में सफल हुए. लेकिन जाति-प्रथा के आधार पर बुरी तरह बंटा भारतीय समाज, कभी इसकी तो कभी उसकी अधीनता में जाता रहा.

अभी-अभी कोई छोटा-सा स्टेशन गुजरा है. नाम पढ़ नहीं पाया. पटरियों के बराबर आते-जाते लोग बता रहे हैं कि अपने शहर से चार सौ किलोमीटर दूर आ जाने पर भी बहुत-कुछ बदला नहीं है. और बदले भी क्यों? शहर के मुट्टी-भर बाशिंदों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश की रोजी-रोटी इस धरती की कोख से फलती है. यहां मुट्ठी-भर शहरियों से आशय उन चार-पांच प्रतिशत लोगों से है जो तीन-चार पीढ़ियों से शहर में रह रहे हैं और गांव से नाता टूटा हुआ है. वरना हम जैसों के जीवन का दो तिहाई हिस्सा शहर में बीतने के बावजूद मन में गांव ही बसता है. जहां आय का मुख्य साधन खेती है. मन हल-बैल, खेत-खलिहान और नदी-तालाब में बसता है. जब वही लोकगीत, वही हल-बैल, वही समस्याएं और वैसे ही एक समान सपने होंगे तो व्यवहार की समानता भी रहेगी ही.

मध्य रात्रि से उजाला होने तक अधिकांश समय अंधेरे में कटा. ट्रैन भागती रही और यात्री स्वयं को गाड़ी-हवाले कर वक्त गुजार देने की कोशिश में ऊंघने लगे. पहले सफर काटने का मुख्य जरिया पुस्तकें हुआ करती थीं. आजकल मोबाइल हैं. अधिकांश लोग मोबाइल पर व्यस्त हैं. पुस्तकें मनुष्य के बोध को समुन्नत करती थीं. मोबाइल पर जो साधन हैं, वे मनुष्य के स्वतंत्र चयन के अधिकार में हस्तक्षेप करने को उत्सुक रहते हैं. एक अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा मनुष्य कब विज्ञापन की भाषा बोलने लगता है, यह क्रिकेट का खेल देखनेवालों की आपसी बातचीत को सुन-देखकर समझा जा सकता है, जो मैच के स्कोर के साथ मोबाइल की खूबियां, उसमें प्रयुक्त तकनीक के कमाल पर भी लगतार चर्चा करते जाते हैं. ‘अपनी कमीज को पड़ोसी की कमीज से ज्यादा सफेद’ दिखाने की प्रतियोगिता ‘अपने मोबाइल को दूसरे के मोबाइल से ज्यादा एडवांस’ सिद्ध करने की प्रतियोगिता में ढल चुकी है. बहरहाल सफर में जो लोग निश्चिंत मन थे, उन्होंने रेलगाड़ी छूटने के थोड़ी देर बाद ही खुद को नींद के हवाले कर दिया था. बराबर से आती खर्राटों की तेज आवाज एकाग्रता भंग कर रही है. मैं उससे सहज हो लेना चाहता हूं. आखिर खर्राटे भी लोगों की सेहत तथा उनके मनोविज्ञान को समझने का एक जरिया है.

मैं सोचता हूं. ये राजधानियां रात में ही क्यों चलती हैं? क्यों अपना अधिकांश सफर अंधियारे में पूरा करने का मन बनाए रहती हैं? इसके लिए यदि यह जान लिया जाए कि कौन लोग हैं जो इन गाड़ियों में सफर करते हैं, तो उत्तर समझना एकदम आसान हो जाएगा. तब हम इस देश के अभिजात की मानसिकता को भली-भांति परख सकेंगे. सरकारी खर्चे पर आने-जाने वालों के अलावा राजधानियों में प्रायः वही लोग सफर करते हैं, जिनका वास्ता एक राजधानी से दूसरी राजधानी या एक मुख्य शहर से दूसरे मुख्य शहर से होता है. यानी जो विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीत आते-जाते हैं. ये शक्ति-केंद्र धार्मिक अथवा राजनीतिक सत्ता के केंद्र हो सकते हैं. राजधानियों के चरित्र में खास अंतर नहीं होता. कुछ सांस्कृतिक विशेषताओं और इस तथ्य को कि राजधानियों में वे लोग रहते हैं, जितना काम शासन-प्रशासन चलाना होता है, जो इस देश के लिए नीतियां बनाते हैं—को यदि भुला दिया जाए तो एक वर्ग और भी राजधानी में रहता है. वही असल में संस्कृति से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था सभी का संचालक होता है. राजधानियों में सफर करनेवाले लोग या तो इस वर्ग के सीधे सदस्य होते हैं, अथवा किसी न किसी प्रकार उससे जुड़े, लाभान्वित होने वाले लोग. तो जो वर्ग अर्थव्यवस्था का वास्तविक संचालक होता है, वह नहीं चाहता कि उससे जुड़े लोगों के अपने देश और देशवासियों से, यहां की मिट्टी, उसकी उर्वरा शक्ति से किसी प्रकार के संबंध बनें. यदि संबंध पीछे से चले आए हैं तो यह वर्ग चाहता है कि उसके निकट आने से पहले कर्मचारी अपने अतीत को बिसरा दें. अपने अतीत को साथ लेकर चलनेवाले, विगत से अपनापा रखनेवाले लोग इसके लिए किसी काम के नहीं होते. ‘सर्वधर्मान परितत्यं मामेकं शरणं ब्रजः—कहकर भक्त को आमंत्रित करने वाले ईश्वर की तरह यह वर्ग भी चाहता है कि लोग उसे अपना भगवान मानें और इसके पास आने से पहले लोग अपनी संस्कृति और अतीत को बिसराकर मुनाफे की उस आचार संहिता को अपना लें, जिसमें पूंजीपति का लाभ ही मूल-मंत्र होता है. परिणामस्वरूप कर्मचारी के विवेक का आकलनउसके प्रयासों के सामाजिक लाभों से नहीं, बल्कि मालिक के मुनाफे की कसौटी द्वारा तय किया जाता है.

अंधेरे का सफर ‘सबकुछ छोड़कर आने में मददगार बनता है. चूंकि यह वर्ग बेहद महत्त्वाकांक्षी भी होता है इसलिए अपनी प्रसार-नीति के तहत इसे भूमि और दूसरे संसाधनों यानी पानी, सस्ता श्रम, धातु-अयस्क आदि की जरूरत भी पड़ती है. जनाक्रोश से बचने के लिए पूंजी-स्वामी स्वयं कभी आगे नहीं आता. सरकार और समाज के प्रत्येक फैसले से वह पूर्णतः निर्लिप्त दिखाई पड़ता है. लेकिन पर्दे के पीछे का असली कर्ता-धर्ता वही होता है. अपनी योजनाओं को वह खरीदे गए राजनेताओं, बुद्धिजीवियांे, कर्मचारियों आदि के जरिए बनाता है. अब यदि आदमी उजाले में सफर करेगा तो वह रास्तों में पड़नेवाले जीवन की धड़कन को महसूस करेगा. उसकी भाव-प्रवणता संसाधनों के अधिग्रहण के समय पूंजीपति के हितों के विपरीत जा सकती है. कुछ धर्मों में मांस खाने की इजाजत इस शर्त पर दी जाती है कि जानवर की गर्दन एक झटके में कलम कर दी जाए. मनुष्य इस काम को यदि धीरे-धीरे, ज्यादा सोच-विचार कर करेगा तो निरीह जानवर की आंखों में समायी मौत उसको विचलित कर सकती है. दूसरे इससे जानवर को पीड़ा भी कम होती है. ‘राजधानी’ का सफर असल में ‘झटके’ का सफर है. आदमी को अपने आसपास को जानने-समझने का अवसर ही नहीं देता. इसलिए ‘राजधानी’ कही जानेवाली गाड़ियां इस देश के जीवन को समझने, सांस्कृतिक विविधताओं के आदान-प्रदान का वाहक बनने से ज्यादा व्यावसायिक उद्यम का हिस्सा बन जाती हैं. ‘राजधानियों’ के यात्रियों की आत्ममुग्धता, अपने आप में लिप्त रहने की कलाकारी, जिसमें तकनीक उनकी मददगार बनती है—से भी इसे समझा जा सकता है.

शहर की आहट आने लगी है. शुरुआत बागों से होती है. लखनऊ नवाबों की नगरी है. बाग उनके लिए आय और ताजा फल उपलब्ध कराने का माध्यम थे. इन बागों के रसीले फल जब बादशाह और उनकी बेगमों के हरम तक पहुंचते होंगे तो फलों की मिठास से अधिक खुशी उन्हें चापलूसी की मिठास में मिलती होगी. इसी से उन्हें और उनकी मनमानियों को अभयदान मिल जाता होगा. यही बाग नवाबों और जमींदारों की ऐशगाह भी रहें होंगे. जहां ऊंची से ऊंची चीख दम तोड़ लेती होगी. दिल्ली और उसके उपनगरों में ऐसे बाग नहीं दिखते. विकास की आंधी और आंतरिक उपनिवेशीकरण की पूंजीवादी जिद के कारण वे कभी का उजड़ चुके हैं. लखनऊ वाले अपनी पुरानी तहजीब के साथ इन बागों पर भी गर्व कर सकते हैं. पर ज्यादा दिनों तक नहीं…

बाग के किनारे-किनारे कुछ झाड़ियां दिखीं. फूलों से लदी हुईं. वसंत की आहट सुन मदन-रस से आतृप्त. बागवान को छोड़कर वे मनुष्य के लिए किसी काम की नहीं. फलदार वृक्षों से बचे खाद-पानी पर ये वैसे ही जिंदा रहती हैं, जैसे शहर में जूठन खाकर सड़क-छाप बच्चे, जिनपर कथित सभ्य लोग ‘आवारा’ का टैग चिपकाए रखते हैं. इन झाड़ियों के फूल भी उन ‘आवारा’ बच्चों की मुस्कान की भांति हैं, जिन्हें यह महानगर कभी अपना नहीं मानता. हालांकि वे उसके वजूद का अभिन्न हिस्सा होते हैं. जैसे वे ‘आवारा’ शहरवासियों के कचरे की सफाई कर उनकी बीमारियों को अपने ऊपर झेलते रहते हैं, उसी प्रकार ये झाड़ियां बाग में आने वाले हर अनावश्यक जीव को उससे दूर रखती हैं. कुपित पशुओं के सींग के वार अपने सीने पर सहती हैं. लेकिन बाग के पेड़ों की चर्चा के दौरान इन झाड़ियों को कहीं नहीं गिना जाता. आने वालों की उपेक्षा दृष्टि सहना ही इनकी नियति है.

लखनऊ के बारे में कहा जाता है कि इसे राम के भाई लक्ष्मण ने बसाया था. लेकिन रामायण के लक्ष्मण का भ्रातृ प्रेम तो दुनिया-भर में मशहूर है. न जाने कितनी कहानियां और गाथाएं उसके ऊपर लिखी गई हैं. बार-बार दावा किया जाता है कि लक्ष्मण अपने अस्तित्व की खोज के लिए भी राम की ओर देखने लगते थे. ऐसा भ्रातृ-वत्सल व्यक्ति अपने नाम से स्वतंत्र नगर बसाता? उन्हें यदि नगर बसाना ही होता तो उसका नाम ‘रामपुर’, ‘रामदुर्ग’ या ‘रामगढ़’ जैसा कोई नाम देते. तो क्या बड़े भाई को अयोध्या का सुख भोगते देख छोटे भाई का मन भी सत्ता-सुख के लिए ललचाने लगा था! सिवाय किंवदंतियों के लिए लखनऊ को ‘लक्ष्मणपुर’, ‘लाखनपुर’ अथवा ‘लखनावती’ से जोड़ने का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं है. यदि ध्वनि-साम्य के आधार पर नगर के इतिहास को खोजने की जिद हो तो लखनऊ को लवणासुर या ऐसे ही किसी मिलते-जुलते राक्षस-राज के नाम से भी जोड़ सकते हैं. परंतु ऐसा हो नहीं पाता. इससे विजेता संस्कृति की इतिहास की समझ का भी अंदाजा होता है. जो न केवल इतिहास के महत्त्व को समझती है, बल्कि उसका अपने हित में प्रयोग करना भी जानती है. इतिहास में बने रहने के लिए वह उसमें आवश्यक दखल भी देती है. विजेता संस्कृति के स्वार्थ विजेता पक्ष के लक्ष्मण से जुड़े थे, लवणासुर से नहीं. आज वही संस्कृतियां जीवित हैं, जिन्होंने अपने इतिहासबोध को बनाए रखा, बल्कि आवश्यकतानुसार उसको अपने स्वार्थ के अनुरूप मोड़ा भी.

भारतियों में इतिहास दृष्टि का अभाव रहा है. इसके समानांतर उनकी धर्म-दृष्टि प्रबल थी. कुछ कम या ज्यादा, प्रत्येक धर्म अपने मूल में सामंती संस्कार लिए होता है, इसलिए यहां का समाज ऊंच-नीच के अनेक खानों में बंटता चला गया. बाद में जब समाजों में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, तो धार्मिक चेतना के प्रभाव में बुरी तरह से बंट चुके समाज, राजनीतिक रास्ता का शिकार होते चले गए. चूंकि राजनीति शासन की भाषा बोलती है, वह लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार सोचने के लिए विवश कर सकती है, इसलिए धार्मिक चेतना के आधार पर संचालित लोगों को अपनी दासता में ढालते चले गए. इस कोशिश के चलते कभी शहर को रामायण से जोड़ा गया तो सत्ता परिवर्तन के साथ ही शहर का नाम बदलकर तत्कालीन शासकों की भाषा और रुचि के अनुकूल ढलता गया. कह सकते हैं कि कथित ‘लक्षमणपुर’ का ‘लखनऊ’ बनना ऐतिहासिक घटना न होकर, सांस्कृतिक त्रासदी है.

‘राजधानी’ यानी ‘निशाचारी’ रेलगाड़ियों की एक विशेषता यह भी है कि वे समय से चलती हैं. इसलिए गाड़ी ने जब लखनऊ स्टेशन से गलबहियां की तो आठ बजने में कुछ मिनट बाकी थे. बाहर निकले तो धूप कुछ ज्यादा ही चमकीली थी. संभव है यह केवल मेरी भ्रांति रही हो. राजधानी दिल्ली के उपनगरों की त्रासदी, जिनके लिए चटकीली धूप, शुद्ध हवा और स्वच्छ पानी बीते जमाने की बात हो चुकी है. प्रदूषण के मामले में लखनऊ देश की राजधानी और उसके उपनगरों के मुकाबले काफी पीछे है. दूसरा कारण शायद यह कि आपने यदि रात की स्याही को नजदीकी से भोगा हो तो दिन का उजियारा कुछ ज्यादा ही जादुई दिखाई पड़ता है. उस क्षण मुझे दूसरी बात ही सही लग रही थी. मेरे सहयात्री जहां भारी-भरकम खर्राटे लेने में मशरूफ थे, मैं अंधेरे में आंख बंद करके लेटा रहा था. ताकि अपने भीतर कुछ झांक सकूं. रात-भर जागने के कारण सुबह की धूप कुछ ज्यादा ही ताजा, कुछ ज्यादा ही ऊर्जावंत दिख रही थी. अपने मातृ प्रदेश की राजधानी में प्रवेश करते समय मैं जिस एहसास को अपने भीतर उभरते देखना चाहता था, ठीक वैसी ही अनुभूति मुझे हो रही थी.

जिस होटल में ठहराने की व्यवस्था की गई थी, वह स्टेशन के काफी करीब था. टहलते हुए वहां तक पहुंचा जा सकता था. पहुंचा भी. परंतु मन लखनऊ की सुबह की पड़ताल करने का था, सो जानबूझकर भीड़ का रास्ता चुना. लखनऊ की चिकन के अलावा जो चीज सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह है वहां की रेबड़ियां. सो जिधर से गुजरा उसके दोनों और रेबड़ियों और तिलगड्डों की दुकानें थीं. आवश्यकता न केवल अपना रास्ता स्वयं चुनती है, बल्कि दूसरों को भी उस रास्ते की ओर आने के लिए आमंत्रित करती है. लखनऊ यात्रा से लौटनेवाले लोगों को यादगार के तौर पर परिवार के लिए वहां की रेबड़ियां लेने का मन हो सकता है. इसी जरूरत ने उस बाजार को जन्म दिया था. रेबड़ियों की दुकानों के बीच-बीच में कुछ ठेले बिरयानी और नाश्ते की चीजों से लदे थे. वहां मजदूर, रिक्शाचालक किस्म के लोग गपशप करते हुए दिखाई पड़े. दिन भर की भागम-भाग और कमर-तोड़ स्पर्धा के बीच आदमियत के एहसास को बचाए रखने का यही समय होता है. जब वे लोग खुल कर हंस सकते हैं. अपने पलों को अपनी तरह जी सकते हैं. बाकी समय तो उन्हें मालिक का आदेश ही मानना होता है.

मैं एक चाय लेना चाहता था. होटल एकदम सामने था, फिर भी वहां जाने से पहले मैंने अपनी सुस्ती को अंगूठा दिखाने का फैसला किया. मैंने चायवाले को ‘अच्छी’ चाय बनाने का आग्रह किया. चाय पीकर चला तो निराश था. दरअसल चाय बनाना भी एक हुनर है. जबतक उसमें अपनेपन की गंध न हो, तब तक वह जुबान नहीं चढ़ती. चाय बेचने वाले के लिए चाय बनाना एक व्यवसाय है. और व्यवसाय मालिक के मुनाफे पर चलता है, जो अपनेपन की गंध के नाम पर अपने मुनाफे को कम नहीं करना चाहता. अब आप शायद उस गरीब चायवाले की व्यावसायिक दृष्टि को दोष देने लगें. लेकिन श्रीमान, उस गुमटी पर आठ रुपये की चाय पीकर जो निराशा हासिल हुई वैसी ही निराशा होटल की चाय पीने के बाद महसूस हुई जो शायद अस्सी रुपये या उससे भी महंगी थी. होटल की चाय इसलिए भी ज्यादा बेस्वाद नहीं लगी, क्यों की उसकी कीमत का भुगतान मुझे नहीं, संस्थान को करना था.

होटल खासा बड़ा था. घोषित रूप से ‘तीन तारे’ वाला. ‘स्वागत कक्ष’ पर नाम-पता आदि लिख देने के साथ ही मुझे ख्याल आया, उन लेखक बंधुओं से मिल लेने का, जिन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी प्रतिष्ठान ने बालसाहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए सम्मानित करने का फैसला किया था. इसलिए होटल पहुंच चुके साहित्यकारों के बारे में जाते ही पता चल गया. उनमें राजीव सक्सेना हमारे ही गृह जनपद में अधिकारी हैं. आदमी की आम कमजोरी. वह अवसर मिलते ही नीड़ की ओर लौटना चाहता है, अथवा उन वस्तुओं और प्राणियों से जुड़ना चाहता है, जो उसको नीड़ से निकटता की अनुभूति कराती हों. इस कमजोरी कोे मेरे बहनोई जंगपाल सिंह लोकोक्ति के माध्यम से स्पष्ट करते हैं. जब भी ऐसी स्थिति उत्पन्न हो, उनका सीधा कटाक्ष होता है—‘घुटने तो पेट को ही पचते हैं.’ यह शब्दों की ताकत है. जिस सत्य को बताने में बड़े-बड़े कलमबाजों को बडे़-बड़े वाक्य अथवा पैराग्राफ खर्च करने पड़ सकते हैं, उसे लोकोक्तियां सूत्र रूप में हमारे सामने ले आती हैं. शब्दों की इस ताकत को अच्छे और बुरे दोनों की किस्म के लोगों ने साधा है. पुरोहितों ने देवताओं का नख-शिख वर्णन को मंत्र का नाम दिया और उसे जादुई ताकत से संपन्न बताकर, लोगों को शताब्दी-दर-शताब्दी उल्लू बनाते रहे. भले ही व्यक्ति उनके भावार्थ से अपरिचित हो. यहां तक कि उन्हें देखा तक न हो और गले में ताबीज की तरह लटकाकर खुश होता हो.

कमरे में पहुंचकर बैग रखा और बगैर नहाए-धोए, शेव किए, राजीव सक्सेन से मिलने चला आया. उन्हीं के साथ साझा करते हुए चाय पी. पहली नजर में वे सहज-सरल इंसान लगे. कभी-कभार आत्ममुग्धता के शिकार भी. पर ऐसी आत्ममुग्धता तो हम सभी ढोते रहते हैं. राजीव विज्ञान की कहानियां लिखते हैं. पता चला कि करीब साढ़े पांच सौ विज्ञान कहानियां वे लिख चुके हैं. वह भी केवल दस वर्ष के विज्ञान लेखन काल में. ये कहानियां कथासम्राट प्रेमचंद की कहानियों की संख्या से लगभग दो गुनी हैं. सम्मान समारोह में उन्होंने अपनी विज्ञान फंतासी का पाठ किया था. मैं ‘विज्ञान कथा’ और ‘विज्ञान फंतासी’ को अलग-अलग करके देखता हूं. जो स्थितियां विज्ञान फंतासी में क्षम्य हो सकती हैं, उनसे विज्ञान कथा में बचा जाना चाहिए—ऐसा मेरा मानना है. बावजूद इसके अधिकांश लेखक ‘विज्ञान फंतासी’ और ‘विज्ञान कथा’ का अंतर नहीं समझ पाते. हालांकि कुछ पत्रिकाएं विज्ञान फंतासी को ‘विज्ञान गल्प’ अवश्य लिखती हैं, बाजवूद इसके तकनीक के स्तर पर दोनों के बीच जो अंतर है, वह कथा-प्रस्तुति के समय कहीं विलीन हो जाता है, परिणामस्वरूप ‘विज्ञान फंतासी’ को ‘विज्ञान कथा’ के रूप प्रस्तुत करने की गलती अकसर होती रहती है.

अच्छी विज्ञान कथा लिखने के लिए लेखक का विज्ञान प्रवीण होना आवश्यक नहीं है. एक साधारण पढ़ा-लिखा लेखक भी बेहतरीन विज्ञान लेखक बन सकता है, बशर्ते उसमें पर्याप्त विज्ञानबोध और इस क्षेत्र में होने वाले नवीनतम अनुसंधानों की सामान्य जानकारी हो. उन्नत तकनीक का वर्णन लेखक के अध्ययनशील और अपने आसपास की घटनाओं के प्रति जागरूक होने का प्रतीक हो सकता है, अच्छी विज्ञान कथा की कसौटी वह भी नहीं है. मेरी राय में अच्छे विज्ञान कथा लेखक की विशेषता उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान के प्रति संदेह भाव और उसकी सूक्ष्म अन्वीक्षण प्रवृत्ति हो सकती है. मैं पीटर अबेलार्ड के इन शब्दों को विज्ञानकथा लेखक के लिए आदर्श मानता हूं—‘संदेह से हम जांच-पड़ताल तक पहुंचते हैं, और जांच-पड़ताल हमें सत्य तक पहुंचाती है.’ दूसरे शब्दों में कहें तो जो आस्थावान हैं, जिसकी आस्था पौराणिक प्रतीकों में है, जिसकी दृष्टि ‘मिथक’ और ‘यथार्थ’ का भेद करने में अक्षम रहती है, वह अच्छा विज्ञान लेखक हो ही सकता. यह मेरी मान्यता है. हिंदी विज्ञान लेखकों की यही कमजोरी है. इसलिए वे आस्था और सत्य में अंतर नहीं कर पाते. चूंकि अधिकांश के लिए आस्था के सवाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं, इसलिए उनकी रचनाएं तकनीक, कल्पना और आस्था के मिश्रण से ‘चूं-चूं का मुरब्बा’ बनकर रह जाती हैं. उस हालात में वे बाजार का ‘हित-साधन’ तो कर सकती हैं, पाठक का नहीं. इसलिए पूरी विनम्रता के साथ मैं उन्हें साहित्य की श्रेणी से खारिज करना चाहता हूं.

इन्हीं बातों को लेकर होटल लौटने पर राजीव जी से बात हुई थी. अच्छा लगा कि वे संवाद को उत्सुक थे. उस बैठक में सुप्रतिष्ठित बालसाहित्यकार उषा यादव और संस्थान की ओर से सम्मानित होकर लौटीं उनकी लेखिका बेटी कामना सिंह भी थीं. बातचीत के दौर उषा यादव एक श्रेष्ठ श्रोता प्रतीत हो रही थीं, तो कामना सिंह की भूमिका बातचीत में सुधी हिस्सेदार और सजग मध्यस्थ की थी. जब भी बात-चीत में गर्माहट उभरती वे समन्वय की जलधारा से उसकी उष्णता को हर लेतीं. ऐसे अवसरों को सार्थक बनाने के लिए इस तरह के व्यक्तियों की उपस्थिति अत्यावश्यक है. वे प्रतिपक्षी वक्ताओं में धैर्य बनाए रखने, तथा एक-दूसरे के प्रति सौम्य बने रहने के लिए प्रेरित करते रहते हैं. यदि वे न हों तो प्रतिपक्षी वक्ता उठकर जा सकते हैं; और बातचीत का जो ध्येय है वह पीछे छूट सकता है.

आस्था-मंडित लेखकों की दुर्बलता है कि वे भारतीय परंपरा और संस्कृति को लेकर कुछ ज्यादा ही आत्ममुग्ध रहते हैं. जबकि विज्ञान लेखक के लिए इसे में कमजोरी मानता हूं. सृष्टि के उद्भव का प्रश्न जितना दार्शनिक है, उतना ही वैज्ञानिक भी. चूंकि इस सत्य को सीधे-सीधे दिखला पाना संभव नहीं है, इसलिए दार्शनिक और वैज्ञानिक दोनों ही अपनी बात को समझाने के लिए प्रतीकों और मिथकों का सहारा लेते हैं. मिथक यदि त्रिविमीय हों तो पाठक को तथ्य के बिंबांकन की सुविधा रहती है. ऐसे प्रतीकों का प्रभाव और भी असरकारी होता है. लेकिन रचना में मिथकों और प्रतीकों का योगदान रास्ते किनारे लगे दिशासूचक या मील के पत्थर जैसा होता है जो दूसरी को स्पष्ट करने के लिए नियत स्थान पर गढ़वा दिए जाता है. वे लक्ष्य न होकर केवल उसका संकेतक होते हैं. धार्मिक व्यक्ति चूंकि आस्थामंडित होता है, इसलिए वह मिथकों से आगे बढ़ ही नहीं पाता और उन्हीं को यात्रा मान लेने की चूक अकसर कर बैठता है. ‘शिव लिंग’, अपनी पूंछ को मुंह में दबाए सर्व की चक्राकार आकृति, शिव लिंग के सिर पर फन ताने नागराज असल में मिथक हैं. निराकार शिव ब्रह्मांड के प्रतीक और मिथक दोनों रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं. लेकिन जब कोई शिव का मानवीकरण अथवा दैवीकरण करता है, यह बताता है कि वे धरती पर अवतरित हुए थे और उन्होंने ही इस कोटिक कोटि किलोमीटर में व्याप्त ब्रह्मांड की रचना की थी, तब वह मिथक का वास्तवीकरण करने लगता है. ज्ञानार्जन की राह की यह सबसे बड़ी बाधा है. जनसाधारण के लिए यह उसकी आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन एक विज्ञान कथालेखक जब मिथक को वैज्ञानिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करता है तो मामला बहुत नाजुक हो जाता है. इससे न केवल मौलिक प्रतिभा का हृास होता है, बल्कि एक गलत तथ्य पाठक के समक्ष जाता है, जो जीवन-भर उसके सोच और व्यवहार पर प्रतिगामी असर डालता है. हो सकता है यह मेरा पूर्वाग्रह हो. हो सकता है जो राजीव समझाना चाहते थे, वह मैं न समझ सका हूं, लेकिन उस चर्चा के बाद मैं इस निष्कर्ष पहुंचा था कि यह अत्यंत ऊर्जावंत और बहु-लिख्खागो विज्ञान-कथाकार, मिथकों को ही वास्तविक तथ्य मानने की भूल कर बैठा है. इसलिए उसकी विज्ञान कथाओं में जहां जबरदस्त फंतासी होती है, आधुनिकतम तकनीक और विज्ञान की दुनिया का जिक्र भी किसी न किसी रूप में आता है, वहीं विज्ञानबोध के अभाव में वे कहानियां साहित्यत्व के उस शिखर को नहीं छू पातीं, जो किसी भी साहित्यकार का लक्ष्य होता है. वे एक अच्छे लेखक हैं, लेखक से साहित्यकार बनने की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ें, यह मेरी कामना है और अपेक्षा भी.

यह बात भी ध्यान में रखनेवाली है कि ऐसे प्रतीक और मिथक प्रायः सभी संस्कृतियों में रहे हैं. आस्था-मंडित समाज दावा करता है कि एकमात्र उसी का विचार श्रेष्ठतम है. लिंग और योनि को सृष्टि के उद्भव का प्रतीक प्रायः प्रत्येक संस्कृति में माना गया है. तुर्की में गोबेक्ला टेप नामक टीले के उत्खनन के दौरान लगभग आठ हजार वर्ष पुरानी प्रस्तर रचनाएं प्राप्त हुई हैं, जो एक मंदिरनुमा स्थान पर स्थापित हैं. दोनों ही मूर्तियां नग्नावस्था में, आमने-सामने चित्रित की गई हैं, जिसमें पुरुष के जननांग को उत्तेजित अवस्था में, स्त्री की ओर तने दर्शाया गया है. ये मूर्तिशिल्प हड़प्पा सभ्यता से प्राप्त मातृदेवी की प्रतिमा से लगभग तीन हजार वर्ष पुराने हैं. दरअसल जिन दिनों ये मूर्तिशिल्प ढाले गए उन दिनों जीवन बहुत कठिन था. जनसंख्या स्तर बनाए रखना बड़ी चुनौती थी. मनुष्य के लिए आत्मरक्षा का मामला ही इतना बड़ा था कि काम-संबंधों के लिए रुचि और समय का अभाव बना ही रहता था. काम-संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उन्हें संस्कृति का हिस्सा बनाया गया. वसंतोत्सव, अग्नि के चारों और चक्कर लगाते हुए यौनिक संकेत करना जैसी प्रथाएं प्राचीन सभी समाजों में रही हैं. यदि जनजातियों में इस तरह प्रथाएं पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से आज भी विद्यमान हैं तो इसका कारण है कि औद्योगिकीकरण से दूर रहने के कारण उनके लिए जीवन की चुनौतियां आज भी कमोबेश वैसी ही हैं. शिवलिंग के प्रतीक को इसी रूप में देखा जाना चाहिए. न कि उसको ब्रह्मांड की उत्पत्ति का आधार बनाकर अपने विवेक को जड़ बना लेने में कोई श्रेय है.

बहरहाल, हमारी लंबी चर्चा यदा-कदा उत्तेजक मगर शालीन बनी रही. वैसे भी एकाध बार तीखी बात कह देने के बाद मैं सतर्क हो चुका था और खुद को बेहतरीन श्रोता सिद्ध करने में लगा रहा. इसका लाभ भी हुआ, चर्चा के बीच आधुनिक अंग्रेजी साहित्य के बारे में अच्छी जानकारी मिली. जो अन्यत्र दुर्लभ थी. राजीव उन अनेक विज्ञान लेखकों में से हैं जो ‘यूएफओ’ को वास्तविक मानते हैं. जिन्हें भरोसा है कि दूसरे ग्रहों पर अब भी जीवन है. हालांकि बारे में उनकी लेखकीय आस्था चाहे जो कहती हो, वैज्ञानिक प्रामाणिकता अब भी संदेह के घेरे में है. ऐसे तथ्य को जो अभी केवल एक संभावना है, विज्ञान कथाकार संभावना ही माने रहे, यह उनका विज्ञानबोध है. विज्ञान साहित्य में रुचि विज्ञानबोध का प्रतीक भले न हो, लेकिन एक विज्ञान लेखक में विज्ञानबोध का अक्षुण्ण रहना, मौलिकता को बनाए रखना है. बहरहाल, बैठक समाप्त हुई तो हम पहले की तरह सामान्य थे. वैसे ही संबंध अगले दिन भी बने रहे.

राजीव को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से श्रेष्ठ विज्ञान लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया था. हमारी चर्चा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली तथा उसे जब-तब दर्शन की ओर मोड़ देने वाली कामना सिंह भी सम्मानित हुई थीं. समारोह की अध्यक्षता संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह ने की थी. उदय प्रताप जी कवि रह चुके हैं. एक समय में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में उनकी उपस्थिति उसकी सफलता की गारंटी मान ली जाती थी. मुझे वे सहृदय और सच्चे इसान लगे, सांप्रदायिकता से कोसों दूर. उनके प्